पं. युधिष्ठिर मीमांसक: संस्कृत व्याकरण के इतिहासकार और वैदिक स्वर-विज्ञान के उद्धारक
एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह विद्वान जिसने पाणिनि से पूर्व के वैयाकरणों को खोजा और 'महाभाष्य' को हिंदी जगत को सौंपा (The Historian of Sanskrit Grammar)
- 1. प्रस्तावना: व्याकरण के आधुनिक मुनि
- 2. जीवन परिचय: राजस्थान से बहालगढ़ तक
- 3. 'संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास': एक विश्वकोश
- 4. महाभाष्य का हिंदी अनुवाद और समीक्षा
- 5. वैदिक स्वर मीमांसा: लुप्त विज्ञान की खोज
- 6. निरुक्त और अन्य वैदिक कार्य
- 7. शोध पद्धति: प्रमाण और तर्क का संगम
- 8. निष्कर्ष: ऋषि ऋण से मुक्ति
आधुनिक युग में संस्कृत के सैकड़ों विद्वान हुए, लेकिन **पं. युधिष्ठिर मीमांसक** (Pandit Yudhishthira Mimamsaka) का स्थान अद्वितीय है। वे केवल संस्कृत के ज्ञाता नहीं थे, बल्कि वे **'व्याकरण के इतिहासकार'** (Historian of Grammar) थे।
प्रायः लोग जानते हैं कि पाणिनी ने 'अष्टाध्यायी' लिखी, लेकिन पाणिनी से पहले कौन से वैयाकरण थे? वेदों का सही उच्चारण (स्वर) कैसे किया जाता था? पतंजलि के महाभाष्य का गूढ़ अर्थ क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने में युधिष्ठिर मीमांसक ने अपना पूरा जीवन खपा दिया। वे महर्षि दयानंद सरस्वती की ऋषि-परंपरा के सच्चे संवाहक थे और **रामलाल कपूर ट्रस्ट (बहालगढ़)** के माध्यम से उन्होंने जो साहित्य रचा, वह आज शोधार्थियों के लिए 'प्रकाश स्तंभ' है।
| पूरा नाम | पं. युधिष्ठिर मीमांसक |
| काल | 22 सितंबर 1909 – 1994 (अनुमानित) |
| जन्म स्थान | राजस्थान |
| कर्मभूमि | रामलाल कपूर ट्रस्ट, बहालगढ़ (सोनीपत, हरियाणा) |
| गुरु | स्वामी ब्रह्मदत्त जिज्ञासु (पाणिनीय व्याकरण के पुनरुद्धारक) |
| महानतम कृति | संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास (3 भाग) |
| अन्य प्रमुख कृतियाँ | महाभाष्य (हिंदी अनुवाद), वैदिक स्वर मीमांसा, वैदिक छन्दोंमांसा |
| सम्मान | राष्ट्रपति सम्मान, डालमिया पुरस्कार |
2. जीवन परिचय: राजस्थान से बहालगढ़ तक
युधिष्ठिर मीमांसक का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा आर्य समाज की गुरुकुल प्रणाली में हुई। उनके जीवन को दिशा देने वाले गुरु थे **स्वामी ब्रह्मदत्त जिज्ञासु**। स्वामी ब्रह्मदत्त वे व्यक्ति थे जिन्होंने भारत में लुप्त हो रही **'आर्ष विधि'** (प्राचीन पद्धति) से व्याकरण पढ़ाने की परंपरा को पुनर्जीवित किया था।
तपस्या: युधिष्ठिर मीमांसक ने विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन विद्या की सेवा में लगा दिया। वे हरियाणा के सोनीपत जिले के **बहालगढ़** नामक स्थान पर स्थित 'रामलाल कपूर ट्रस्ट' में रहे। वहां उन्होंने एक तपस्वी की तरह जीवन बिताते हुए हजारों पृष्ठों का साहित्य रचा। वे आधुनिक सुख-सुविधाओं से दूर, केवल पुस्तकों और पांडुलिपियों के बीच रहते थे।
3. 'संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास': एक विश्वकोश
उनका सबसे महान और अमर ग्रंथ "संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास" (History of Sanskrit Grammar) है, जो तीन विशाल खंडों में प्रकाशित है।
इससे पहले व्याकरण का इतिहास बिखरा हुआ था। मीमांसक जी ने:
1. पाणिनी पूर्व वैयाकरण: पाणिनी से पहले के लगभग 85 वैयाकरणों (जैसे आपिशलि, शाकटायन, स्फोटायन) के बारे में प्रमाण सहित जानकारी दी।
2. इंद्र और बृहस्पति: उन्होंने सिद्ध किया कि व्याकरण की परंपरा इंद्र और बृहस्पति से शुरू हुई थी।
3. लुप्त ग्रंथ: उन्होंने उन सैकड़ों व्याकरण ग्रंथों का विवरण दिया जो अब लुप्त हो चुके हैं, लेकिन जिनके उद्धरण अन्य ग्रंथों में मिलते हैं।
यह ग्रंथ न केवल हिंदी में, बल्कि संस्कृत जगत में अपने आप में एक अद्वितीय शोध है।
4. महाभाष्य का हिंदी अनुवाद और समीक्षा
महर्षि पतंजलि का 'महाभाष्य' संस्कृत व्याकरण का सबसे कठिन और दार्शनिक ग्रंथ माना जाता है। कहा जाता है—"महाभाष्यं वा पाठनीयं, महाराज्यं वा पालनीयं" (या तो महाभाष्य पढ़ो या विशाल साम्राज्य चलाओ, दोनों समान रूप से कठिन हैं)।
युधिष्ठिर मीमांसक ने महाभाष्य का न केवल संपादन किया, बल्कि उसका **विस्तृत हिंदी अनुवाद** और **व्याख्या** भी लिखी।
उनकी व्याख्या की विशेषता यह है कि उन्होंने कैयट और नागेश जैसे मध्यकालीन टीकाकारों की गलतियों को सुधारा और पतंजलि के मूल आशय को स्पष्ट किया। उन्होंने महाभाष्य में आए ऐतिहासिक संकेतों (जैसे यवन आक्रमण) पर भी प्रकाश डाला।
5. वैदिक स्वर मीमांसा: लुप्त विज्ञान की खोज
वेदों में **'स्वर'** (Accent/Udatta, Anudatta, Swarita) का अत्यधिक महत्व है। स्वर बदलने से अर्थ बदल जाता है (जैसे 'इंद्रशत्रु' का उदाहरण)। मध्यकाल में यह विज्ञान लगभग लुप्त हो गया था।
युधिष्ठिर मीमांसक ने "वैदिक स्वर मीमांसा" और "वैदिक छन्दोंमांसा" लिखकर इस विज्ञान को पुनर्जीवित किया।
- उन्होंने पाणिनी के सूत्रों के आधार पर वेदों के हर मंत्र में स्वर लगाने की विधि समझाई।
- उन्होंने शतपथ ब्राह्मण और यजुर्वेद के लुप्त स्वर-चिह्नों को खोजने का प्रयास किया।
आज यदि कोई विद्वान वैदिक स्वरों को सही ढंग से समझना चाहता है, तो उसे मीमांसक जी के ग्रंथों का ही सहारा लेना पड़ता है।
6. निरुक्त और अन्य वैदिक कार्य
व्याकरण के अलावा, उन्होंने यास्क मुनि के **'निरुक्त'** (Vedic Etymology) पर भी बहुत कार्य किया। उन्होंने 'निरुक्त' का एक आलोचनात्मक संस्करण (Critical Edition) तैयार किया।
- दयानंद के भाष्य की रक्षा: उन्होंने महर्षि दयानंद के वेद भाष्य पर लगने वाले आक्षेपों का तार्किक और व्याकरणिक उत्तर दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि दयानंद का अर्थ पाणिनी और यास्क के नियमों के अनुसार है, जबकि सायण कई जगह नियमों का उल्लंघन करते हैं।
- शौत सूत्र: उन्होंने श्रौत सूत्रों (यज्ञ विधियों) पर भी कार्य किया और प्राचीन यज्ञशालाओं के नक्शे और माप को स्पष्ट किया।
7. शोध पद्धति: प्रमाण और तर्क का संगम
युधिष्ठिर मीमांसक की लेखन शैली एक **न्यायाधीश** (Judge) की तरह थी।
- प्रमाण (Evidence): वे अपनी बात कहने के लिए सैकड़ों ग्रंथों से प्रमाण देते थे।
- तर्क (Logic): वे अंधश्रद्धा को नहीं मानते थे। यदि कोई प्राचीन टीकाकार गलत है, तो वे निडर होकर उसकी गलती बताते थे (चाहे वह सायण हो या भट्टोजि दीक्षित)।
- सरलता: इतना गूढ़ विषय होते हुए भी, उनकी हिंदी भाषा अत्यंत सरल और प्रवाहपूर्ण थी।
8. निष्कर्ष: ऋषि ऋण से मुक्ति
पं. युधिष्ठिर मीमांसक ने अपने जीवन में इतना कार्य किया जितना कई संस्थाएं मिलकर भी नहीं कर सकतीं। वे आधुनिक भारत के **'शब्द-ब्रह्म'** के उपासक थे।
आज जब हम कंप्यूटर द्वारा संस्कृत विश्लेषण (Computational Linguistics) की बात करते हैं, तो मीमांसक जी द्वारा स्थापित 'व्याकरण की संरचना' और 'इतिहास' हमारे लिए आधार का काम करते हैं। उन्होंने भारत को अपनी **भाषाई विरासत** (Linguistic Heritage) पर गर्व करना सिखाया। बहालगढ़ का वह आश्रम जहाँ वे रहे, आज भी संस्कृत प्रेमियों के लिए तीर्थस्थल है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास (3 भाग) - युधिष्ठिर मीमांसक (रामलाल कपूर ट्रस्ट)।
- महाभाष्य (हिंदी व्याख्या सहित) - युधिष्ठिर मीमांसक।
- वैदिक स्वर मीमांसा - युधिष्ठिर मीमांसक।
- निरुक्त समुच्चय - सम्पादक युधिष्ठिर मीमांसक।
