डॉ. सूर्यकांत: वैदिक शब्दावली और तैत्तिरीय प्रातिशाख्य के महान शोधकर्ता
आधुनिक प्राच्यविद्या (Indology) के वह मूर्धन्य हस्ताक्षर, जिन्होंने अपने कालजयी 'व्यावहारिक वैदिक कोश' (Practical Vedic Dictionary) और 'तैत्तिरीय प्रातिशाख्य' पर किये गए गंभीर शोध के माध्यम से पाश्चात्य और भारतीय भाषाविज्ञान (Linguistics) के बीच एक ऐतिहासिक सेतु का निर्माण किया।
- 1. प्रस्तावना: वैदिक शब्द-मीमांसा और डॉ. सूर्यकांत का उदय
- 2. जीवन और अकादमिक पृष्ठभूमि: परम्परा और आधुनिकता का संगम
- 3. 'व्यावहारिक वैदिक कोश' (A Practical Vedic Dictionary): शताब्दी का महाग्रंथ
- 4. वैदिक शब्दावली की संरचना: व्युत्पत्ति, धातु और बहुआयामी अर्थ (Polysemy)
- 5. 'तैत्तिरीय प्रातिशाख्य' का परिचय: कृष्ण यजुर्वेद का नाद-विज्ञान
- 6. तैत्तिरीय प्रातिशाख्य में 'स्वर-प्रक्रिया' (Vedic Accentuation) और सन्धि नियम
- 7. पद-पाठ से संहिता-पाठ की वैज्ञानिक प्रक्रिया
- 8. अन्य प्रातिशाख्यों पर शोध (ऋक्तन्त्र एवं अथर्ववेद प्रातिशाख्य)
- 9. साहित्यिक सम्पादन और 'कालिदास ग्रंथावली'
- 10. निष्कर्ष: आधुनिक कोश-निर्माण और वैदिक भाषाशास्त्र के अमर हस्ताक्षर
1. प्रस्तावना: वैदिक शब्द-मीमांसा और डॉ. सूर्यकांत का उदय
वेद मानव जाति के प्राचीनतम और सबसे पवित्र ज्ञान-कोश हैं। किन्तु वेदों की भाषा (वैदिक संस्कृत) लौकिक या शास्त्रीय संस्कृत (Classical Sanskrit) से अत्यंत भिन्न और जटिल है। कालिदास या भवभूति की संस्कृत को समझने वाला विद्वान भी बिना 'निघंटु' और 'प्रातिशाख्य' की सहायता के वेदों का सही अर्थ और उच्चारण नहीं कर सकता।
बीसवीं शताब्दी में जहाँ मोनियर-विलियम्स (Monier-Williams) और मैकडोनेल (Macdonell) जैसे पाश्चात्य विद्वानों ने संस्कृत डिक्शनरी बनाईं, वहीं उनमें भारतीय 'आर्ष दृष्टि' और 'व्याकरणिक आत्मा' का अभाव झलकता था। इस ऐतिहासिक शून्यता को भरने का भगीरथ कार्य डॉ. सूर्यकांत (Dr. Suryakant) ने किया। उन्होंने 'वैदिक शब्दावली' (Vedic Lexicography) को न केवल वैज्ञानिक रूप से वर्गीकृत किया, बल्कि 'तैत्तिरीय प्रातिशाख्य' (Taittiriya Pratishakhya) जैसे अत्यंत क्लिष्ट ध्वनि-वैज्ञानिक ग्रंथों का प्रामाणिक विश्लेषण कर यह सिद्ध किया कि प्राचीन भारत का 'स्वन-विज्ञान' (Acoustic Phonetics) आधुनिक विश्व से सदियों आगे था।
| पूरा नाम | डॉ. सूर्यकांत (Dr. Suryakant / Suryakanta) |
| काल निर्धारण (Chronology) | 20वीं शताब्दी (लगभग 1901 में जन्म - 20वीं सदी के उत्तरार्ध तक सक्रिय) |
| अकादमिक उपाधियाँ | डी.लिट. (D.Litt. - पंजाब विश्वविद्यालय), डी.फिल. (D.Phil. - ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय) |
| मुख्य शोध क्षेत्र | वैदिक कोश-निर्माण (Lexicography), प्रातिशाख्य (Phonetics), और व्याकरण |
| विश्व-प्रसिद्ध कृति | A Practical Vedic Dictionary (व्यावहारिक वैदिक कोश) - ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित (1981) |
| प्रातिशाख्य-सम्बन्धी शोध | तैत्तिरीय प्रातिशाख्य का विश्लेषण, 'ऋक्तन्त्रम्' (सामवेद), 'अथर्ववेद प्रातिशाख्य' का सम्पादन |
| अन्य महत्त्वपूर्ण सम्पादन | कालिदास ग्रंथावली (कुमारसंभवम् आदि) - साहित्य अकादेमी के लिए |
2. जीवन और अकादमिक पृष्ठभूमि: परम्परा और आधुनिकता का संगम
डॉ. सूर्यकांत का व्यक्तित्व प्राच्य और पाश्चात्य विद्याओं का एक अद्भुत संगम था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भारतीय गुरुकुल और पारंपरिक 'स्वाध्याय' पद्धति से प्राप्त की, जहाँ उन्होंने पाणिनीय व्याकरण (अष्टाध्यायी, महाभाष्य) और सायण-भाष्य का गहन अध्ययन किया।
अपनी विद्वत्ता को वैश्विक स्तर पर प्रमाणित करने के लिए उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय (Oxford University) से डी.फिल. (D.Phil.) की उपाधि प्राप्त की। भारत लौटकर उन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों (जैसे पंजाब विश्वविद्यालय) और उच्च शोध संस्थानों में एक आचार्य और भाषाविद् के रूप में कार्य किया। उनके पास न केवल प्राचीन 'निरुक्त' की दृष्टि थी, बल्कि आधुनिक 'तुलनात्मक भाषाशास्त्र' (Comparative Philology) का कठोर वैज्ञानिक अनुशासन भी था, जिसने उनके ग्रंथों को प्रामाणिकता के शिखर पर पहुँचा दिया।
3. 'व्यावहारिक वैदिक कोश' (A Practical Vedic Dictionary): शताब्दी का महाग्रंथ
लौकिक संस्कृत (Classical Sanskrit) और वैदिक संस्कृत (Vedic Sanskrit) में बहुत अंतर है। वेदों में कई ऐसे शब्द हैं जो केवल एक बार प्रयोग हुए हैं (जिन्हें Hapax Legomenon कहा जाता है)। इसके अतिरिक्त, वैदिक धातुओं (Roots) के अर्थ समय के साथ बदल गए।
डॉ. सूर्यकांत का "व्यावहारिक वैदिक कोश" (A Practical Vedic Dictionary - 1981) 20वीं सदी के सबसे महान भाषा-वैज्ञानिक प्रयासों में से एक है।
डॉ. सूर्यकांत से पूर्व, यदि किसी भारतीय छात्र को वेदों का शोध करना होता था, तो उसे रूडोल्फ रॉथ (Rudolf Roth) और ओटो बोथलिंक (Otto Böhtlingk) के 'सेंट पीटर्सबर्ग डिक्शनरी' (जर्मन भाषा) या मोनियर-विलियम्स पर निर्भर रहना पड़ता था।
डॉ. सूर्यकांत ने अनुभव किया कि पाश्चात्य कोशकारों ने कई स्थानों पर भारतीय 'यौगिक' (Derivative) परम्परा को दरकिनार कर दिया था। अतः उन्होंने एक ऐसा कोश तैयार किया जिसमें चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद), ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों की पूरी 'वैदिक शब्दावली' (Vedic Vocabulary) को वर्णमाला के क्रम में सजाया गया।
4. वैदिक शब्दावली की संरचना: व्युत्पत्ति, धातु और बहुआयामी अर्थ (Polysemy)
डॉ. सूर्यकांत का यह कोश केवल शब्दों के अर्थ नहीं बताता, बल्कि वह शब्दों का 'डीएनए' (DNA) खोलकर रख देता है।
- धातु और प्रत्यय (Roots & Suffixes): प्रत्येक वैदिक शब्द किस धातु से बना है, उसमें कौन सा प्रत्यय (उणादि आदि) लगा है, इसका पूरा पाणिनीय व्याकरणिक विवरण कोश में दिया गया है।
- बहुआयामी अर्थ (Polysemy): वैदिक शब्द 'रूढ़' नहीं होते। उदाहरण के लिए, शब्द 'गो' (Go) का अर्थ लौकिक संस्कृत में केवल 'गाय' होता है, परन्तु डॉ. सूर्यकांत ने अपने कोश में निरुक्त का सन्दर्भ देते हुए बताया कि वेदों में 'गो' का अर्थ 'सूर्य की किरण', 'इन्द्रियाँ', 'पृथ्वी', और 'वाणी' भी है, जो प्रसंग के अनुसार बदलता है।
- द्विभाषी दृष्टिकोण: उन्होंने शब्दों के अर्थ हिंदी और अंग्रेजी दोनों में दिए, जिससे यह ग्रन्थ भारतीय छात्रों और विदेशी इंडोलॉजिस्ट्स दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी बन गया।
5. 'तैत्तिरीय प्रातिशाख्य' का परिचय: कृष्ण यजुर्वेद का नाद-विज्ञान
वैदिक मन्त्रों के सस्वर और शुद्ध उच्चारण को सुरक्षित रखने के लिए प्रत्येक वेद-शाखा के अपने-अपने 'प्रातिशाख्य' (Phonetic Manuals) रचे गए थे। 'तैत्तिरीय प्रातिशाख्य' (Taittiriya Pratishakhya) कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण और जटिल ध्वनि-शास्त्रीय ग्रन्थ है।
डॉ. सूर्यकांत ने तैत्तिरीय प्रातिशाख्य और उस पर रची गई प्राचीन टीकाओं (जैसे 'त्रिभाष्यरत्न' और 'पदक्रमसदन') का अत्यंत गहरा भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि तैत्तिरीय प्रातिशाख्य के 24 अध्यायों (प्रपाठकों) में मानव मुख के 'वाक्-यंत्र' (Vocal Tract) का इतना सटीक शारीरिक (Anatomical) विवरण है, जो आधुनिक 'Articulatory Phonetics' को भी आश्चर्यचकित कर देता है।
6. तैत्तिरीय प्रातिशाख्य में 'स्वर-प्रक्रिया' (Vedic Accentuation) और सन्धि नियम
वेदों में अर्थ का निर्धारण केवल 'शब्द' से नहीं, बल्कि 'स्वर' (Accent) से होता है। यदि स्वर गलत लगा दिया जाए, तो शब्द का अर्थ पूरी तरह बदल जाता है (जैसे 'इन्द्रशत्रु' शब्द)।
डॉ. सूर्यकांत ने अपने शोध में तैत्तिरीय प्रातिशाख्य के 'स्वर-विधान' को डिकोड किया:
1. उदात्त, अनुदात्त और स्वरित: उन्होंने बताया कि कैसे उच्च स्वर (उदात्त), नीच स्वर (अनुदात्त) और मिश्रित स्वर (स्वरित) के उच्चारण में गले की स्वर-तन्त्रियों (Vocal cords) का तनाव बदलता है।
2. यम और प्लुत: तैत्तिरीय प्रातिशाख्य में 'यम' (Twin consonants) और 'प्लुत' (3 मात्रा वाले लम्बे स्वर) के जो नियम दिए गए हैं, डॉ. सूर्यकांत ने उन्हें आधुनिक ध्वनि-विज्ञान के 'Pitch' और 'Intonation' के समकक्ष रखकर समझाया।
3. नासिक्यीकरण (Nasalization): अनुस्वार और अनुनासिक ध्वनियों (जैसे अँ, ऑं) का उच्चारण मुख और नासिका से किस अनुपात में हवा निकालकर किया जाए, इसका गणितीय विश्लेषण उन्होंने प्रस्तुत किया।
7. पद-पाठ से संहिता-पाठ की वैज्ञानिक प्रक्रिया
वेद के मन्त्रों को याद रखने के लिए ऋषियों ने कई 'पाठ-विकृतियों' (Recitation patterns) का निर्माण किया था— जैसे पद-पाठ, क्रम-पाठ, जटा-पाठ और घन-पाठ।
तैत्तिरीय प्रातिशाख्य यह नियम तय करता है कि जब 'पद-पाठ' (अलग-अलग शब्द) आपस में जुड़कर 'संहिता-पाठ' (Continuous sentence) बनते हैं, तो उनमें क्या-क्या सन्धि-परिवर्तन (Euphonic combination) होते हैं। डॉ. सूर्यकांत ने इन नियमों को आधुनिक Morpheme और Phoneme थ्योरी से जोड़कर सिद्ध किया कि प्राचीन भारतीयों को शब्दों के आपस में टकराने से उत्पन्न होने वाले ध्वनि-विकारों (Sandhi) का पूर्णतः वैज्ञानिक ज्ञान था। यह उनके शोध का सबसे बड़ा अकादमिक निष्कर्ष था।
8. अन्य प्रातिशाख्यों पर शोध (ऋक्तन्त्र एवं अथर्ववेद प्रातिशाख्य)
डॉ. सूर्यकांत का प्रातिशाख्य-ज्ञान केवल यजुर्वेद तक सीमित नहीं था। उन्होंने सम्पूर्ण प्रातिशाख्य वाङ्मय का उद्धार किया:
- ऋक्तन्त्रम् (Rktantram - 1933/1970): यह सामवेद का एक दुर्लभ प्रातिशाख्य है। डॉ. सूर्यकांत ने इसका आलोचनात्मक संस्करण (Critical Edition) अंग्रेज़ी अनुवाद और विस्तृत भूमिका के साथ प्रकाशित किया। उन्होंने बताया कि सामवेद के गायन (Melody) में स्वरों को कैसे खींचा जाता है (कर्षण) और कैसे परिवर्तित किया जाता है।
- अथर्ववेद प्रातिशाख्य (Atharvaveda Pratisakhya - 1939): उन्होंने 1939 में लाहौर से इस लुप्तप्राय ग्रन्थ का प्रामाणिक संस्करण सम्पादित किया, जिसने अथर्ववेदीय ध्वनियों और व्याकरण की गुत्थियों को सुलझाया।
9. साहित्यिक सम्पादन और 'कालिदास ग्रंथावली'
वैदिक भाषाविज्ञान के इस हिमालय जैसे गुरुतर कार्य के साथ-साथ, डॉ. सूर्यकांत ने शास्त्रीय संस्कृत (Classical Sanskrit) साहित्य की भी महती सेवा की।
स्वतंत्रता के पश्चात् जब भारत की 'साहित्य अकादेमी' (Sahitya Akademi) ने महाकवि कालिदास की कृतियों का प्रामाणिक और समालोचनात्मक संस्करण (Critical Editions) तैयार करने की विश्व-स्तरीय परियोजना आरम्भ की, तो इस सम्पादन मण्डल में डॉ. सूर्यकांत को प्रमुखता से शामिल किया गया। उनके द्वारा सम्पादित कालिदास का "कुमारसंभवम्" (Kumarasambhavam) संस्कृत साहित्य-जगत में अपनी पाठ-शुद्धता (Textual purity) और पाठांतरों (Variant readings) की वैज्ञानिक छँटाई के लिए आज भी एक आदर्श (Standard) माना जाता है। इसके अतिरिक्त 'Kshemendra Studies' के माध्यम से उन्होंने कश्मीरी विद्वान क्षेमेन्द्र के साहित्य पर भी गहरा प्रकाश डाला।
10. निष्कर्ष: आधुनिक कोश-निर्माण और वैदिक भाषाशास्त्र के अमर हस्ताक्षर
डॉ. सूर्यकांत का सम्पूर्ण जीवन और उनका साहित्य इस बात का प्रज्वलित प्रमाण है कि जब एक विद्वान के भीतर 'भारतीय प्रज्ञा' और 'पाश्चात्य शोध-प्रणाली' का मिलन होता है, तो 'व्यावहारिक वैदिक कोश' जैसे महाग्रंथ जन्म लेते हैं।
आज भारत और विदेशों में संस्कृत और इंडोलॉजी (Indology) का जो भी छात्र वेदों के मन्त्रों का अर्थ खोजता है या तैत्तिरीय और सामवेदीय प्रातिशाख्यों के ध्वनि-विज्ञान पर Ph.D. करता है, वह जाने-अनजाने में डॉ. सूर्यकांत के बौद्धिक ऋण से उऋण नहीं हो सकता।
उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वेद केवल रटने की वस्तु नहीं हैं, अपितु वे 'ध्वनि, अर्थ और विज्ञान' के सर्वोच्च और सबसे परिष्कृत गणितीय ढांचे पर खड़े हैं। महाकवि कालिदास के सम्पादन से लेकर वेदों के क्लिष्टतम प्रातिशाख्यों तक की उनकी यह अकादमिक यात्रा, उन्हें आधुनिक भारत के सबसे महान 'शब्द-ऋषियों' (Lexicographers and Philologists) की पंक्ति में सदा के लिए अमर कर देती है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- A Practical Vedic Dictionary (व्यावहारिक वैदिक कोश) - डॉ. सूर्यकांत (Oxford University Press, 1981)।
- ऋक्तन्त्रम् (A Pratisakhya of the Samaveda) - सम्पादक: डॉ. सूर्यकांत (1970 पुनर्मुद्रण)।
- Atharvaveda Pratisakhya - सम्पादक: डॉ. सूर्यकांत (Lahore, 1939)।
- कुमारसंभवम् (कालिदास) - समालोचनात्मक संस्करण, सम्पादक: डॉ. सूर्यकांत (साहित्य अकादेमी)।
- Kshemendra Studies - Dr. Suryakant.
- वैदिक ध्वनि-विज्ञान (Vedic Phonetics) पर विभिन्न अकादमिक शोध-पत्र एवं समीक्षाएँ।
