प्रो. दयानंद भार्गव: वैदिक दर्शन और नीतिशास्त्र के समन्वयवादी शोधकर्ता
राष्ट्रपति सम्मान से अलंकृत वह आधुनिक विद्यामार्तण्ड, जिन्होंने अपनी प्रज्ञा से 'वैदिक दर्शन' (आस्तिक परम्परा) और 'जैन नीतिशास्त्र' (श्रमण परम्परा) के मध्य एक ऐतिहासिक दार्शनिक सेतु का निर्माण किया, और पंडित मधुसूदन ओझा के 'वैदिक विज्ञान' को विश्व पटल पर पुनर्स्थापित किया।
- 1. प्रस्तावना: भारतीय दर्शनशास्त्र में समन्वय की आवश्यकता
- 2. जीवन और अकादमिक पृष्ठभूमि: दिल्ली से जोधपुर और जैन विश्व भारती तक
- 3. मास्टरपीस: 'जैन नीतिशास्त्र' (Jaina Ethics) का वैश्विक मानकीकरण
- 4. अनेकांतवाद (Anekantavada) और अहिंसा का आधुनिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
- 5. वैदिक विज्ञान: पंडित मधुसूदन ओझा के गूढ़ साहित्य का उद्धार
- 6. सृष्टि-विज्ञान (Cosmology) और 'ब्रह्मविज्ञान' की आधुनिक व्याख्या
- 7. तुलनात्मक दर्शन: आस्तिक (वैदिक) और नास्तिक (श्रमण) परम्पराओं का समन्वय
- 8. नीतिशास्त्र (Ethics) बनाम ज्ञानमीमांसा (Epistemology)
- 9. शिक्षाविद् के रूप में योगदान: जे.एन.वी.यू. और जे.वी.बी. के कुलपति
- 10. निष्कर्ष: इक्कीसवीं सदी में भार्गव जी की प्रासंगिकता और बौद्धिक विरासत
1. प्रस्तावना: भारतीय दर्शनशास्त्र में समन्वय की आवश्यकता
भारतीय दर्शन (Indian Philosophy) मुख्य रूप से दो विशाल धाराओं में प्रवाहित हुआ है— पहली है 'वैदिक या आस्तिक परम्परा' (जो वेदों को प्रमाण मानती है, जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत), और दूसरी है 'श्रमण या नास्तिक परम्परा' (जो वेदों की प्रामाणिकता को नकारती है, जैसे जैन, बौद्ध और चार्वाक)। सदियों से ये दोनों परम्पराएं एक-दूसरे की घोर आलोचक रही हैं।
आधुनिक अकादमिक जगत में इन दोनों परम्पराओं का 'तुलनात्मक' और 'समन्वयवादी' अध्ययन अत्यंत विरल था। इसी विरलता को समाप्त करने का ऐतिहासिक भगीरथ कार्य प्रो. दयानंद भार्गव (Prof. Dayanand Bhargava) ने किया। एक ओर जहाँ उन्होंने 'जैन नीतिशास्त्र' (Jaina Ethics) पर ऐसा प्रामाणिक ग्रन्थ लिखा जिसे ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज के विद्वानों ने भी सराहा, वहीं दूसरी ओर उन्होंने जयपुर के प्रकांड विद्वान पं. मधुसूदन ओझा के 'वैदिक विज्ञान' (Science of the Vedas) को अंग्रेजी और आधुनिक हिंदी में अनूदित कर वेदों के आधिभौतिक (Scientific) रहस्यों को उजागर किया। उनका सम्पूर्ण जीवन एक 'दार्शनिक समन्वय' की प्रयोगशाला रहा है।
| पूरा नाम | प्रोफेसर डॉ. दयानंद भार्गव (Prof. Dayanand Bhargava) |
| जन्म / काल | 1937 ई. (दिल्ली) - आधुनिक भारतीय दर्शनशास्त्र के स्तंभ |
| अकादमिक उपाधियाँ | एम.ए., पीएच.डी. (जैन नीतिशास्त्र में), विद्यावारिधि |
| प्रमुख धारित पद | विभागाध्यक्ष (संस्कृत विभाग, जयनारायण व्यास वि.वि., जोधपुर), पूर्व कुलपति (जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनूं) |
| महानतम कृतियाँ | Jaina Ethics (1968), Jaina Tarka Bhasha (Translation), Glimpses of Indian Philosophy |
| वैदिक शोध कार्य | पंडित मधुसूदन ओझा कृत 'इन्द्रविजय', 'ब्रह्मविज्ञान' और 'देवता-विमर्श' का संपादन और व्याख्या |
| राष्ट्रीय सम्मान | राष्ट्रपति सम्मान (Certificate of Honour) - भारत के राष्ट्रपति द्वारा संस्कृत और दर्शन में उत्कृष्ट योगदान हेतु |
2. जीवन और अकादमिक पृष्ठभूमि: दिल्ली से जोधपुर और जैन विश्व भारती तक
प्रो. दयानंद भार्गव का जन्म 1937 में दिल्ली के एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) से पूर्ण हुई, जहाँ उन्होंने संस्कृत और दर्शनशास्त्र में गहरी पैठ बनाई।
उन्होंने अपना अकादमिक जीवन अध्यापन से आरम्भ किया और अंततः जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU), जोधपुर में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के रूप में दशकों तक अपनी सेवाएँ दीं। उनकी मेधा, निष्पक्ष दृष्टि और जैन दर्शन के प्रति उनकी गहरी समझ को देखते हुए उन्हें 'जैन विश्व भारती संस्थान' (Jain Vishva Bharati Institute, Ladnun - Deemed University) का कुलपति (Vice-Chancellor) नियुक्त किया गया। एक 'वैदिक/सनातन' पृष्ठभूमि वाले विद्वान का जैन विश्वविद्यालय का कुलपति बनना, उनकी उस असीम विद्वत्ता का प्रमाण था जो साम्प्रदायिक सीमाओं से बहुत ऊपर उठ चुकी थी।
3. मास्टरपीस: 'जैन नीतिशास्त्र' (Jaina Ethics) का वैश्विक मानकीकरण
1968 में जब प्रो. भार्गव की पुस्तक "Jaina Ethics" (जैन नीतिशास्त्र) प्रकाशित हुई, तो इसने भारतीय और पाश्चात्य अकादमिक जगत में तहलका मचा दिया। उस समय तक जैन धर्म को पश्चिमी विद्वान अक्सर बौद्ध धर्म की एक शाखा या केवल 'कठोर तपस्या' (Extreme Asceticism) का धर्म मान लेते थे।
प्रो. भार्गव ने इस ग्रन्थ में जैन आचार-मीमांसा को अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि जैन नीतिशास्त्र कोई अव्यवहारिक या केवल संन्यासियों का शास्त्र नहीं है। इसे उन्होंने तीन स्तरों पर वर्गीकृत किया:
1. श्रावक धर्म (Layman's Ethics): सामान्य गृहस्थ के लिए 'अणुव्रत' (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का सीमित पालन)।
2. श्रमण धर्म (Ascetic's Ethics): संन्यासियों के लिए 'महाव्रत' (इन्हीं नियमों का पूर्णतः कठोरता से पालन)।
3. आत्मिक विकास के गुणस्थान (Stages of Spiritual Development): उन्होंने जैन 'गुणस्थान' (14 अवस्थाएँ) की तुलना आधुनिक मनोविज्ञान (Modern Psychology) और पतंजलि के अष्टांग योग की भूमिकाओं से की।
4. अनेकांतवाद (Anekantavada) और अहिंसा का आधुनिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
आज के संघर्षरत विश्व (Wars, Religious conflicts) के लिए प्रो. भार्गव ने जैन धर्म के 'अनेकांतवाद' (Theory of Non-absolutism) और 'स्याद्वाद' को सबसे बड़ी दार्शनिक चिकित्सा बताया।
अपनी पुस्तक और शोध-पत्रों में उन्होंने व्याख्या की कि 'अहिंसा' केवल शारीरिक स्तर पर किसी को न मारना नहीं है। वैचारिक अहिंसा (Intellectual Non-violence) ही 'अनेकांतवाद' है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि "मेरा सत्य भी सही हो सकता है, और आपका सत्य भी दूसरे दृष्टिकोण से सही हो सकता है," तो वैचारिक टकराव समाप्त हो जाता है। उन्होंने इस जैन सिद्धांत की तुलना वैदिक दर्शन के "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं) से करते हुए दोनों के बीच अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया।
5. वैदिक विज्ञान: पंडित मधुसूदन ओझा के गूढ़ साहित्य का उद्धार
जहाँ एक ओर प्रो. भार्गव श्रमण परम्परा के विश्व-स्तरीय विशेषज्ञ थे, वहीं दूसरी ओर उनकी आत्मा वैदिक श्रुति में रमती थी। 19वीं-20वीं सदी के जयपुर के राज-पंडित मधुसूदन ओझा (Pt. Madhusudan Ojha) एक ऐसे दैवीय विद्वान थे जिन्होंने वेदों की व्याख्या 'विज्ञान' (Science), 'भूगोल', 'खगोलशास्त्र' (Astronomy) और 'सृष्टि-विज्ञान' (Cosmology) के रूप में की थी। किन्तु ओझा जी की संस्कृत इतनी गूढ़ थी कि सामान्य विद्वान उसे समझ नहीं पाते थे।
प्रो. दयानंद भार्गव ने ओझा जी के ग्रंथों (जैसे इन्द्रविजय, देव-विमर्श, ब्रह्मविज्ञान) का हिंदी और अंग्रेजी में भाष्य और सम्पादन किया। उन्होंने ओझा जी की उस 'विज्ञान-दृष्टि' को विश्व पटल पर रखा जो यह मानती थी कि वैदिक 'देवता' कोई स्वर्ग में बैठे व्यक्ति नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड की 'ऊर्जा और प्राकृतिक शक्तियों' (Cosmic Energies and Natural Forces) के पारिभाषिक नाम हैं।
6. सृष्टि-विज्ञान (Cosmology) और 'ब्रह्मविज्ञान' की आधुनिक व्याख्या
पंडित मधुसूदन ओझा के 'ब्रह्मविज्ञान' का भाष्य करते हुए प्रो. भार्गव ने आधुनिक भौतिकी (Quantum Physics/Big Bang Theory) और नासदीय सूक्त के बीच की कड़ियों को जोड़ा।
- त्रैतवाद की नवीन व्याख्या: उन्होंने ओझा जी के सिद्धांत को स्पष्ट किया कि यह ब्रह्माण्ड 'मन, प्राण और वाक्' (Mind, Vital Energy, and Matter) का खेल है। जो बात आज आधुनिक विज्ञान 'Energy converting into Matter' (E=mc²) के रूप में कहता है, वही बात वेदों में 'प्राण' के 'वाक्' (भौतिक पदार्थ) में संघनित होने के रूप में कही गई है।
- इन्द्र और वृत्र का युद्ध: प्रो. भार्गव ने ओझा जी के 'इन्द्रविजय' का अनुवाद कर यह स्पष्ट किया कि 'इन्द्र' (सूर्य की ऊर्जा/प्रकाश) और 'वृत्र' (अंधकार/आवरण) का युद्ध कोई ऐतिहासिक कबीलाई युद्ध नहीं है, बल्कि यह वर्षा-विज्ञान (Meteorology) और सौर-मंडल की गति का एक आलंकारिक (Allegorical) वैज्ञानिक वर्णन है।
7. तुलनात्मक दर्शन: आस्तिक (वैदिक) और नास्तिक (श्रमण) परम्पराओं का समन्वय
प्रो. दयानंद भार्गव का सबसे बड़ा अवदान उनका 'तुलनात्मक दृष्टिकोण' (Comparative Approach) है। भारतीय दर्शन की प्रायः यह विडंबना रही है कि वेदांती जैनों का खंडन करते हैं, और जैन वेदांतियों का।
भार्गव जी ने अपनी पुस्तक "Glimpses of Indian Philosophy" में सिद्ध किया कि ये दोनों धाराएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक (Complementary) हैं। जहाँ वैदिक दर्शन 'ब्रह्म' (Whole/Macro) से शुरू होकर व्यक्ति (Micro) तक आता है, वहीं जैन दर्शन 'व्यक्ति' (जीव/आत्मा) की तपस्या से शुरू होकर कैवल्य (Ultimate state) तक पहुँचता है। मंजिल दोनों की एक ही है— 'दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति' (Ultimate liberation from suffering)।
8. नीतिशास्त्र (Ethics) बनाम ज्ञानमीमांसा (Epistemology)
पश्चिमी दर्शन मुख्य रूप से 'ज्ञानमीमांसा' (हम कैसे जानते हैं?) पर जोर देता है। प्रो. भार्गव ने स्थापित किया कि भारतीय दर्शन का मूल केंद्र 'ज्ञानमीमांसा' नहीं, बल्कि 'नीतिशास्त्र' (Ethics) और 'मोक्षशास्त्र' (Soteriology) है।
उन्होंने बताया कि वेद का 'ऋत' (सृष्टि का नैतिक नियम), बौद्धों का 'शील', पतंजलि का 'यम-नियम' और जैनों का 'अणुव्रत'— ये सब वास्तव में एक ही सत्य के विभिन्न नाम हैं। जब तक व्यक्ति का 'नीतिशास्त्र' (आचरण) शुद्ध नहीं होगा, तब तक उसकी 'ज्ञानमीमांसा' (तर्क) उसे शांति नहीं दे सकती। भारतीय दर्शन में 'तर्क' (Logic) केवल मस्तिष्क का व्यायाम नहीं है, वह मोक्ष प्राप्ति का साधन है।
9. शिक्षाविद् के रूप में योगदान: जे.एन.वी.यू. और जे.वी.बी. के कुलपति
प्रो. भार्गव ने एक प्रशासक और शिक्षाविद् के रूप में संस्कृत और प्राकृत भाषाओं की महती सेवा की। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU), जोधपुर में संस्कृत विभाग को उन्होंने शोध का एक उत्कृष्ट केंद्र बनाया।
जब वे जैन विश्व भारती (JVB, Ladnun) के कुलपति बने, तो उन्होंने 'जीवन विज्ञान' (Science of Living) और 'प्रेक्षा ध्यान' (Preksha Meditation) को अकादमिक पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया। उन्होंने आधुनिक छात्रों को यह सिखाया कि कैसे प्राचीन जैन ध्यान-पद्धतियों का उपयोग आधुनिक मानसिक तनाव (Stress Management) और शारीरिक व्याधियों को दूर करने के लिए किया जा सकता है। उनके निर्देशन में सैकड़ों शोधार्थियों (Ph.D. scholars) ने भारतीय दर्शन के अनछुए पहलुओं पर कार्य किया।
10. निष्कर्ष: इक्कीसवीं सदी में भार्गव जी की प्रासंगिकता और बौद्धिक विरासत
प्रो. दयानंद भार्गव का जीवन इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि एक सच्चा विद्वान कभी किसी एक परम्परा के 'हठ' (Dogma) में नहीं बँधता।
आज जब समाज धार्मिक और वैचारिक रूप से खंडित हो रहा है, प्रो. भार्गव द्वारा प्रतिपादित 'वैदिक विज्ञान' का तर्क और 'जैन अनेकांतवाद' की सहिष्णुता, दोनों ही हमारे लिए संजीवनी हैं। भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें दिया गया 'सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर' (Certificate of Honour) केवल उनके पाण्डित्य का सम्मान नहीं था, बल्कि उस 'समन्वयवादी दृष्टि' का सम्मान था जिसने सिद्ध किया कि चाहे वेद के ऋषि हों या जैन परम्परा के तीर्थंकर, सभी ने मानव मात्र के कल्याण और पूर्णता (Perfection) का ही मार्ग प्रशस्त किया है।
उनका साहित्य (विशेषकर 'Jaina Ethics' और ओझा जी के विज्ञान का भाष्य) भारतीय दर्शन के छात्रों, शोधार्थियों और साधकों के लिए सदैव एक अमर प्रकाश-स्तम्भ (Lighthouse) बना रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Jaina Ethics - Dr. Dayanand Bhargava (Motilal Banarsidass, 1968)।
- जैन तर्क भाषा (यशोविजय) - प्रो. दयानंद भार्गव द्वारा अंग्रेजी अनुवाद एवं भाष्य।
- पंडित मधुसूदन ओझा के ग्रंथों का सम्पादन (इन्द्रविजय, देव-विमर्श, ब्रह्मविज्ञान)।
- Glimpses of Indian Philosophy and Sanskrit Literature.
- वैदिक और जैन दर्शन पर उनके द्वारा प्रस्तुत अकादमिक शोध-पत्र और व्याख्यान।
- राष्ट्रपति सम्मान अभिलेखागार (भारत सरकार)।
