Kṛpaṇena Samo Dātā Shloka Meaning: कंजूस की दानवीरता पर एक व्यंग्य

Sooraj Krishna Shastri
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॥ सूक्ति सुधा ॥

कृपणता पर एक अनूठा व्यंग्य

कृपणेन समो दाता न भूतो न भविष्यति ।
अस्पृशन्नेव वित्तानि यः परेभ्यः प्रयच्छति ॥
Kṛpaṇena samo dātā na bhūto na bhaviṣyati |
Aspṛśanneva vittāni yaḥ parebhyaḥ prayacchati ||

हिन्दी अनुवाद

"कंजूस (कृपण) मनुष्य के समान बड़ा दानी न तो कोई भूतकाल में हुआ है और न ही भविष्य में होगा। क्योंकि वह अपने धन को स्वयं बिना छुए ही (बिना उपभोग किए) ज्यों का त्यों दूसरों को सौंप कर चला जाता है।"

विस्तृत शब्दार्थ

कृपणेन (Kṛpaṇena)कंजूस के द्वारा (By the miser)
समो दातासमान दानी (Equal donor)
न भूतोन हुआ है (Neither happened)
न भविष्यतिन होगा (Nor will be)
अस्पृशन् (Aspṛśan)बिना स्पर्श किए (Without touching)
वित्तानि (Vittāni)धन-सम्पत्ति को (Wealth)
परेभ्यः (Parebhyaḥ)दूसरों के लिए (To others)
प्रयच्छतिप्रदान करता है (Gives/Surrenders)

व्याकरण विश्लेषण

1. कृपणेन: 'कृपण' शब्द में तृतीया विभक्ति, एकवचन है (तुलना के अर्थ में)।

2. अस्पृशन्नेव: अस्पृशन् + एव। 'स्पृश्' धातु में 'शतृ' प्रत्यय लगा है, जिसका अर्थ है 'बिना छूते हुए' ।

3. भविष्यति: 'भू' धातु, लृट् लकार (भविष्य काल), प्रथम पुरुष, एकवचन।

दार्शनिक एवं आधुनिक सन्दर्भ

इस श्लोक में व्याजोक्ति अलंकार (व्यंग्य) का प्रयोग किया गया है। शास्त्र कहते हैं कि धन की तीन गतियाँ होती हैं: दान, भोग और नाश।
कंजूस व्यक्ति न तो दान करता है और न ही भोग करता है, इसलिए उसका धन अंततः 'नाश' की ओर जाता है या दूसरों के हाथ में चला जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जो धन समाज के काम न आए या स्वयं के जीवन स्तर को न सुधार सके, वह बोझ मात्र है।

संवादात्मक कथा: कंजूस और उसका सोना

एक कंजूस व्यक्ति ने अपना सारा धन बेचकर सोने का एक बड़ा टुकड़ा खरीदा और उसे बगीचे में एक गड्ढे में गाड़ दिया। वह रोज उसे देखने जाता। एक दिन एक चोर ने उसे देख लिया और सोना चुरा लिया।

जब कंजूस रोने लगा, तो उसके पड़ोसी ने पूछा— "तुम क्यों रो रहे हो?" सारी बात जानकर पड़ोसी ने एक पत्थर गड्ढे में डाल दिया और कहा— "अब रोज इस पत्थर को देखने आना, क्योंकि जब तुम सोने का उपयोग ही नहीं कर रहे थे, तो पत्थर और सोने में क्या अंतर?"

शिक्षा: धन की सार्थकता उसके सदुपयोग में है, केवल संग्रह में नहीं।

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