Ghar Kab Aaogi Beti? एक भावुक कहानी जो हर बेटी के दिल को छू लेगी!

Sooraj Krishna Shastri
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घर कब आओगी, बेटी?

"पिता का इंतज़ार और बेटी की मजबूरियाँ"

फोन की घंटी बजी और उधर से पापा की वही स्नेह भरी आवाज़ आई, जो हर बार बस एक ही सवाल पूछती थी—

पापा: "घर कब आओगी, बेटी?"

अवंतिका ने एक ही साँस में जवाब दिया— "अभी तो गर्मियों की छुट्टियाँ लगने में दो-ढाई महीने हैं पापा, अभी से कैसे बताऊँ? गर्मियों में स्नेहा की एक्स्ट्रा क्लासेज भी तो हैं, और फिर उसकी म्यूज़िक क्लास..."

पापा, जो शायद बहुत उम्मीद से फ़ोन किए थे, बेटी की व्यस्तता सुनकर चुप हो गए। बस इतना ही कहा, "हम्म, समझ सकता हूँ" और फ़ोन माँ को पकड़ा दिया। माँ ने फोन लेते ही कहा, "पता नहीं क्या हो गया है तेरे पापा को। कल सुबह से ही रट लगाए हैं कि कब छुट्टियाँ होंगी और कब अवंतू घर आएगी?" बोलते-बोलते माँ का गला भर आया।

🕰️ तीन साल का फासला

तीन साल बीत चुके थे अवंतिका को अपने मायके गए हुए। हर साल कोई न कोई ऐसा कारण निकल आता कि वह दस दिन के लिए भी घर नहीं जा पाती। हाँ, माँ-पापा ज़रूर ससुराल आकर उससे मिल लेते थे, पर वह अपने 'घर' न जा पाई थी।

माँ ने ज़ोर देकर कहा, "हो सके तो इस बार घर आजा। पापा को बहुत अच्छा लगेगा।"

अवंतिका ने बेबसी से कहा, "माँ, तुम तो समझती हो ना? आख़िर तुम भी कभी इस दुविधा में रही होगी।" माँ ने एक लंबी साँस छोड़ी और हामी भर दी। फोन कट गया, लेकिन अवंतिका के मन में उथल-पुथल मच गई।

रात का मंथन

रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे अवंतिका की आँखों से नींद गायब थी। वह सोच रही थी— "क्यों हर बार मम्मी-पापा मेरी मजबूरियाँ समझ जाते हैं? काश! वे कहते कि हमें कुछ नहीं सुनना, तुम्हें घर आना ही होगा। काश! वे अपनी बेटी पर थोड़ा हक़ जताते। वे कभी ज़िद्द क्यों नहीं करते?"

इन्हीं ख्यालों में कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। सुबह छह बजे अलार्म बजा। रोज़ की भागदौड़ शुरू हुई। स्नेहा स्कूल गई, मयंक ऑफिस।

सुबह का संदेश

काम निपटाकर अवंतिका ने जैसे ही मोबाइल उठाया, पापा का एक मैसेज फ्लैश हुआ। रात के 12:30 बजे का मैसेज था।

"तेरी हर ज़िम्मेदारी का एहसास है मुझे बेटी, पर इस बार अपने बूढ़े पिता की ज़िद्द ही समझ ले इसे। इस बार तेरी एक न सुनूँगा। इस बार तुझे घर आना ही होगा।"

अवंतिका की आँखें नम हो गईं। आज पापा ने बिना कहे ही उसके दिल की बात सुन ली थी। उसने कांपते हाथों से रिप्लाई किया—

"पापा, काश! हर बार आप ऐसी ही ज़िद्द करते और मैं आपकी ज़िद्द के आगे हार मानकर घर आ जाती। काश! हर बार आप इतना ही हक़ जताते तो मैं हर बार लौटती उस आँगन में, जहाँ मेरा बचपन मेरा इंतज़ार करता है।"

तभी फोन बजा। पापा का ही फोन था। दोनों तरफ खामोशी थी, गले भरे हुए थे। पापा ने बस प्यार से इतना ही कहा—

पापा: "बेटी, इस बार तुझे लेने मैं ख़ुद आऊँगा।"

💌 एक छोटा सा अनुरोध

शायद आपकी और मेरी कहानी भी अवंतिका से मेल खाती है।

आइये, इस बार अपने बचपन का कुछ हिस्सा मम्मी-पापा को लौटा दें।
आइये, इस बार गर्मियों की छुट्टियाँ अपने मायके में ही बिता दें।

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