कुलगुरु कृपाचार्य: हस्तिनापुर के राजगुरु, महान धनुर्धर और अजर-अमर चिरंजीवी
(The Eternal Sage & Royal Priest of Hastinapur)
कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:॥" अर्थ: अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम—ये सात चिरंजीवी (अमर) हैं।
महाभारत के महान योद्धाओं में कुलगुरु कृपाचार्य (Kripacharya) का स्थान अत्यंत आदरणीय है। वे न केवल कौरवों और पांडवों के प्रथम गुरु थे, बल्कि हस्तिनापुर के तीन पीढ़ियों के साक्षी भी रहे। कृपाचार्य का जन्म सामान्य रीति से नहीं हुआ था, और उनका पूरा जीवन ही रहस्यों और कठिन तपस्या से भरा रहा। वे एक 'ब्रह्मर्षि' थे जिन्होंने शस्त्र और शास्त्र दोनों में महारत हासिल की थी। आज भी उन्हें उन आठ महापुरुषों में गिना जाता है जो कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर जीवित रहेंगे।
| पिता | महर्षि शरद्वान (गौतम वंश) |
| माता | जानपदी (अप्सरा) |
| बहन | कृपी (द्रोणाचार्य की पत्नी) |
| प्रमुख शिष्य | कौरव, पांडव, परीक्षित |
| निवास | हस्तिनापुर (राजकीय गुरु के रूप में) |
| विशेष पहचान | चिरंजीवी और आगामी मन्वंतर के सप्तर्षि |
1. वंश और परिवार: गौतम ऋषि से संबंध
कृपाचार्य का संबंध महान गौतम ऋषि के वंश से है। उनके पिता शरद्वान धनुर्वेद के बहुत बड़े ज्ञाता थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शरद्वान की तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने जानपदी नामक अप्सरा भेजी। उसके प्रभाव से शरद्वान का वीर्य सरकंडों (Sarkanda/Reeds) के एक झुरमुट पर गिरा, जिससे दो जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ—एक बालक और एक बालिका।
महाराज शांतनु (भीष्म के पिता) ने जब इन अनाथ बच्चों को देखा, तो उन पर दया (कृपा) करके उनका पालन-पोषण किया। इसी 'कृपा' के कारण बालक का नाम कृप और बालिका का नाम कृपी पड़ा। बाद में कृपी का विवाह गुरु द्रोणाचार्य से हुआ।
2. हस्तिनापुर के राजगुरु: प्रारंभिक शिक्षा
कृपाचार्य ने अपने पिता शरद्वान से धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की। वे इतने निपुण हुए कि स्वयं भीष्म पितामह ने उन्हें पांडवों और कौरवों की प्रारंभिक शिक्षा का दायित्व सौंपा। द्रोणाचार्य के हस्तिनापुर आने से पहले कृपाचार्य ही राजकुमारों के मुख्य अस्त्र-गुरु थे।
- तटस्थता: वे सदैव न्याय के पक्ष में रहे, यद्यपि वे हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति वचनबद्ध थे।
- धनुर्वेद: वे 'अस्त्र-विद्या' के उन गिने-चुने आचार्यों में से थे जिन्हें दिव्य अस्त्रों का आह्वान और उपसंहार दोनों पता था।
3. महाभारत युद्ध और कृपाचार्य की भूमिका
महाभारत के युद्ध में कृपाचार्य ने कौरवों की ओर से युद्ध किया। वे उन 18 महारथियों में से एक थे जो युद्ध के अंत तक जीवित बचे।
- रणकौशल: उन्होंने पांडव सेना के कई वीर योद्धाओं को परास्त किया।
- नैतिकता: युद्ध के दौरान भी उन्होंने मर्यादाओं का पालन किया। अश्वत्थामा द्वारा किए गए 'सौप्तिक पर्व' (रात में शिविर पर हमला) के वे मूक साक्षी रहे, जिसका उन्हें पश्चाताप भी हुआ।
- युद्ध के बाद: युद्ध समाप्ति के बाद, उन्होंने युधिष्ठिर का साथ दिया और परीक्षित (अभिमन्यु के पुत्र) को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी।
4. चिरंजीवी होने का वरदान और भविष्य
कृपाचार्य को भगवान शिव और ब्रह्मा जी की कृपा से चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त है। उन्हें मृत्यु का भय नहीं है।
पौराणिक भविष्यवाणियों के अनुसार, जब वर्तमान मन्वंतर (वैवस्वत मन्वंतर) समाप्त होगा और अगला मन्वंतर (सावर्णि मन्वंतर) प्रारंभ होगा, तब महर्षि कृपाचार्य **सप्तर्षियों** (Seven Great Sages) में से एक होंगे। वे ज्ञान को एक युग से दूसरे युग तक ले जाने वाले सेतु के समान हैं।
5. निष्कर्ष
कुलगुरु कृपाचार्य का चरित्र धैर्य और निष्ठा का संगम है। वे द्रोणाचार्य की तरह उग्र नहीं थे, बल्कि शांत और स्थिर बुद्धि वाले ऋषि थे। उन्होंने कभी भी पद या प्रतिशोध की कामना नहीं की, बल्कि जो कर्तव्य उनके सामने आया, उसे पूरी ईमानदारी से निभाया। वे आज भी हमारे बीच अदृश्य रूप में विद्यमान माने जाते हैं, जो धर्म और ज्ञान के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध हैं।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- महाभारत (आदि पर्व - कृपाचार्य की उत्पत्ति प्रसंग)।
- वाल्मीकि रामायण (चिरंजीवी वर्णन)।
- विष्णु पुराण (मन्वंतर और सप्तर्षि वर्णन)।
- पुराण कोश - महर्षि शरद्वान के वंशज।
