वैदिक विद्वान गार्ग्य: सामवेद के 'पदपाठकार' और निरुक्त के आचार्य
वैदिक वाङ्मय के इतिहास में 'गार्ग्य' नाम के एक महान व्याकरणवेत्ता और वैदिक आचार्य हुए हैं। इनका योगदान वेदों को सुरक्षित रखने और उनके मंत्रों का सही उच्चारण सुनिश्चित करने में अद्वितीय है। इन्हें मुख्य रूप से सामवेद के संरक्षण के लिए जाना जाता है।
| मुख्य योगदान | सामवेद का पदपाठ (Padapatha) |
| क्षेत्र | व्याकरण (Grammar), निरुक्त (Etymology) |
| उल्लेख | ऋग्वेद प्रातिशाख्य, निरुक्त (यास्क मुनि द्वारा) |
| दार्शनिक मत | शब्दों की व्युत्पत्ति पर विशेष सिद्धांत |
1. सामवेद के पदपाठकार (Padapathakara)
वेदों के मंत्र मूल रूप में 'संहिता' (जुड़े हुए शब्दों) में होते हैं। मंत्रों के अर्थ को समझने और उनमें कोई मिलावट न हो, इसके लिए ऋषियों ने प्रत्येक शब्द को अलग-अलग करके 'पदपाठ' (Word-for-word splitting) तैयार किया।
- महान कार्य: विद्वानों का मत है कि सामवेद की कौथुम शाखा का 'पदपाठ' महर्षि गार्ग्य द्वारा ही तैयार किया गया था।
- महत्व: सामवेद संगीत प्रधान है, इसलिए इसके शब्दों को अलग करना अत्यंत कठिन कार्य था। गार्ग्य ऋषि ने इसे व्यवस्थित किया, जिससे आज भी सामवेद शुद्ध रूप में उपलब्ध है।
2. निरुक्त और व्याकरण में गार्ग्य का मत
महर्षि यास्क (Yaska) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'निरुक्त' (वैदिक शब्दों का शब्दकोश/व्युत्पत्ति शास्त्र) में आचार्य गार्ग्य के मतों का कई बार उल्लेख किया है। उस समय विद्वानों में एक बहस थी कि क्या "सभी नाम (Nouns) धातुओं (Verbs/Actions) से ही बनते हैं?"
- शाकटायन का मत: सभी शब्द क्रिया (Action) से बनते हैं।
- गार्ग्य का मत: गार्ग्य ने इसका विरोध किया था। उनका मानना था कि कुछ शब्द 'रूढ़' (Fixed Names) होते हैं और हर शब्द को जबरदस्ती क्रिया से नहीं जोड़ना चाहिए। यह व्याकरण के इतिहास में एक बहुत बड़ा तार्किक दृष्टिकोण था।
3. ऋग्वेद प्रातिशाख्य में उल्लेख
शौनक ऋषि द्वारा रचित 'ऋग्वेद प्रातिशाख्य' (उच्चारण और संधि के नियमों का ग्रंथ) में भी गार्ग्य को एक प्रमाणिक आचार्य के रूप में उद्धृत किया गया है। वहाँ स्वरों के उच्चारण और 'संधि' (Sandhi) के नियमों पर गार्ग्य के विशिष्ट नियम बताए गए हैं।
निष्कर्षतः, ये गार्ग्य केवल ज्योतिषी या पुरोहित नहीं थे, बल्कि ये प्राचीन भारत के एक महान भाषाविद् (Linguist) और वेद-संरक्षक थे।
