माँ चिंतपूर्णी देवी धाम
51 शक्तिपीठों में से एक: चिंता हरने वाली माता छिन्नमस्ता की दिव्य गाथा
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित माँ चिंतपूर्णी देवी का मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर सोला सिग्ही श्रेणी की पहाड़ियों पर विराजमान है।
- यह मंदिर होशियारपुर-धर्मशाला रोड पर स्थित भरवाई (Bharwain) गाँव से मात्र 3 कि.मी. की दूरी पर है।
- निजी वाहनों द्वारा चिंतपूर्णी बस स्टैंड तक जाया जा सकता है, जो मंदिर से 1.5 कि.मी. दूर है।
- चढ़ाई का आधा रास्ता सीधा है और शेष रास्ता सीढ़ीदार है।
यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है और मुख्य 7 देवियों में गिना जाता है। नवरात्रि और सावन के महीनों में यहाँ लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं।
पौराणिक कथा: सती और छिन्नमस्ता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित किया था, तब माता का मस्तक (माथा) इसी स्थान पर गिरा था।
पंडित माई दास जी का संबंध:
माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना सारस्वत ब्राह्मण पंडित माई दास ने की थी। आज भी उनके वंशज ही मंदिर में पूजा-अर्चना का कार्य संभालते हैं।
🩸 छिन्नमस्ता रूप का रहस्य
मार्कंडेय पुराण के अनुसार, जब देवी चंडी ने राक्षसों को युद्ध में हराया, तो उनकी सहचरी योगिनियाँ (जया और विजया) रक्त की प्यास से व्याकुल हो गईं। उनकी प्यास बुझाने के लिए माता ने अपना ही सिर काट दिया और अपनी गर्दन से निकली रक्त की धारा अपनी सखियों को पिलाई। इसीलिए माता का यह रूप 'छिन्नमस्ता' (कटा हुआ सिर) कहलाता है।
रहस्य: चार शिव मंदिरों का सुरक्षा घेरा
चिंतपूर्णी चालीसा और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, माता चिंतपूर्णी का धाम चारों दिशाओं से रुद्र महादेव (भगवान शिव) द्वारा सुरक्षित है। मान्यता है कि जो भक्त इन चारों शिवालयों के दर्शन के बाद माता के दर्शन करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।
1. शिव बाड़ी (दक्षिण दिशा)
यह मंदिर गग्रेट (Gagret) के पास स्थित है और बहुत प्रसिद्ध है। इसे माता का दक्षिण द्वार रक्षक माना जाता है।
2. कालेश्वर महादेव (पूर्व दिशा)
यह धाम अम्ब (Amb) क्षेत्र में पड़ता है। पौराणिक काल में सतलुज नदी के बनने के समय यह लुप्त हो गया था, जिसे बाद में खोजा गया।
3. नारायण महादेव (पश्चिम दिशा)
ज्वाला जी रोड पर डेरा चौक से हरिपुर रोड पर 20 कि.मी. की दूरी पर यह मंदिर स्थित है। इसे स्थानीय लोग 'कासब मंदिर' के नाम से जानते हैं, जो वास्तव में नारायण देव ही हैं।
4. मचकूंद महादेव (उत्तर दिशा)
ज्वाला जी रोड पर 'डल्यिरा चौक' से बाएं होकर आगे 1 कि.मी. पर एक पुली आती है। वहाँ से बाएं हाथ की ओर 5 कि.मी. जाने पर यह प्राचीन मंदिर स्थित है।
मंदिर का स्वरूप और मान्यताएँ
गर्भगृह में माता पिंडी रूप में दर्शन देती हैं। यह मंदिर एक प्राचीन बरगद के वृक्ष के नीचे बना हुआ है। मंदिर के चारों तरफ सोने का सुंदर आवरण लगा हुआ है।
कहा जाता है कि यहाँ माता के चरण भी गिरे थे। यहाँ दर्शन करने मात्र से चिंताओं का अंत होता है और असंभव कार्य भी पलक झपकते ही पूर्ण हो जाते हैं।

