पिता का आशीर्वाद
"धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जाएगी"
यह बेंगलुरु (कर्नाटक) के एक व्यापारी की सत्य घटना है। जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिन रहे एक पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धर्मपाल को अपने पास बुलाया। पिता ने जीवन भर सच्चाई और ईमानदारी से व्यापार किया था, लेकिन उनके पास पुत्र को विरासत में देने के लिए अधिक धन-संपत्ति नहीं थी।
पिता ने पुत्र के सिर पर हाथ रखा और अपने जीवन की सारी कमाई—अपना पुण्य और आशीर्वाद—उसे देते हुए कहा:
बेटे ने श्रद्धा से पिता के चरण स्पर्श किए और पिता ने संतोष के साथ प्राण त्याग दिए।
सफलता और विश्वास
पिता के जाने के बाद धर्मपाल ने एक छोटी सी ठेला-गाड़ी से व्यापार शुरू किया। पिता के वचन सत्य होने लगे। धीरे-धीरे एक दुकान हुई, फिर बड़ी दुकान, और देखते ही देखते वह नगर के सबसे संपन्न सेठों में गिना जाने लगा।
धर्मपाल का अटूट विश्वास था कि यह सब उसकी मेहनत नहीं, बल्कि उसके पिता की ईमानदारी और आशीर्वाद का फल है। लोग उसे अब 'बाप का आशीर्वाद' नाम से ही पुकारने लगे थे।
नुकसान की परीक्षा: जंजीबार की यात्रा
एक दिन धर्मपाल को विचार आया कि "मुझे हमेशा लाभ ही होता है, क्या पिता का आशीर्वाद हर स्थिति में काम करेगा? मुझे एक बार नुकसान का अनुभव भी करना चाहिए।"
उसने अपने मित्र से ऐसा व्यापार पूछा जिसमें निश्चित नुकसान हो। मित्र ने ईर्ष्यावश सलाह दी:
"तुम भारत से लौंग (Cloves) खरीदो और उसे जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार (Zanzibar) जाकर बेचो।"
जंजीबार 'लौंग का देश' है। वहाँ लौंग कौड़ियों के दाम मिलती है। वहाँ लौंग बेचना मतलब 'उल्टे बांस बरेली' वाली बात थी। साफ नुकसान दिख रहा था। फिर भी, धर्मपाल ने जहाज भरा और जंजीबार के लिए निकल पड़ा—यह परखने कि पिता का आशीर्वाद यहाँ काम करता है या नहीं।
सुल्तान, रेत और चमत्कार
जंजीबार के तट पर उतरकर धर्मपाल शहर की ओर जा रहा था, तभी उसे सामने से वहाँ के सुल्तान अपने सैनिकों के साथ आते दिखे। सैनिक हाथों में तलवारों की जगह बड़ी-बड़ी छलनियाँ लिए हुए थे और रेत छान रहे थे।
पूछने पर सुल्तान ने बताया कि सुबह उनकी एक अनमोल अंगूठी यहाँ गिर गई थी, जो एक फकीर का आशीर्वाद थी। सुल्तान उस अंगूठी को अपनी सल्तनत से भी ज्यादा कीमती मानते थे।
बातों ही बातों में सुल्तान ने धर्मपाल से पूछा- "सेठ! तुम इस बार क्या माल लेकर आए हो?"
धर्मपाल ने कहा- "लौंग!"
सुल्तान हँस पड़े और बोले- "यहाँ तो लौंग मिट्टी के भाव मिलती है। तुम्हें यहाँ किसने भेजा? तुम्हारा भारी नुकसान होगा। तुम्हारे पिता का आशीर्वाद यहाँ काम नहीं करेगा।"
धर्मपाल ने विनम्रता से कहा- "सुल्तान! मेरे पिता ने कहा था कि मेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी। मैं बस यही देखना चाहता हूँ।"
ऐसा कहते हुए धर्मपाल नीचे झुका और जमीन से एक मुट्ठी रेत भरी। जैसे ही उसने सुल्तान के सामने अपनी मुट्ठी खोली और रेत नीचे गिराई...
चमत्कार!
रेत तो गिर गई, लेकिन उसकी हथेली पर सुल्तान की वही हीरेजड़ित अंगूठी चमक रही थी।
पिता का वचन सत्य हुआ
सुल्तान की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने कहा- "वाह! खुदा की करामात देखो। तुमने अपने पिता के आशीर्वाद को सच कर दिखाया।"
सुल्तान ने खुश होकर धर्मपाल को मुँह माँगा इनाम देने को कहा। धर्मपाल ने केवल सुल्तान की लंबी उम्र और प्रजा की खुशहाली माँगी। इस निस्वार्थ भाव से प्रभावित होकर सुल्तान ने धर्मपाल का सारा लौंग मुँह माँगी कीमत (सोने के भाव) पर खरीद लिया।
जहाँ निश्चित नुकसान था, वहाँ भी पिता के आशीर्वाद ने धूल (रेत) से सोना (धन) पैदा कर दिया।
शिक्षा
"पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं है।"
बालक के मन को जानने वाली 'माँ' और भविष्य को संवारने वाले 'पिता' ही दुनिया के दो महान ज्योतिषी हैं।
अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है। 🙏

