श्री मध्वाचार्य: द्वैत वेदांत के प्रवर्तक, वायु के अवतार और तत्ववाद के महाचार्य | Madhvacharya

Sooraj Krishna Shastri
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श्री मध्वाचार्य: द्वैत वेदांत (तत्ववाद) के प्रवर्तक और यथार्थवाद के सूर्य

श्री मध्वाचार्य: द्वैत वेदांत (तत्ववाद) के प्रवर्तक, वायु के अवतार और यथार्थवाद के सूर्य

एक विस्तृत दार्शनिक और ऐतिहासिक महागाथा: जिन्होंने "जगत् मिथ्या" के सिद्धांत को चुनौती देकर "जगत् सत्य" की स्थापना की (The Champion of Realism)

भारतीय दर्शन के आकाश में तीन सूर्य माने जाते हैं—शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य। जहाँ शंकराचार्य ने 'अद्वैत' (Monism) की स्थापना की और रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' (Qualified Non-dualism) का मार्ग दिखाया, वहीं 13वीं शताब्दी में मध्वाचार्य ने एक क्रांतिकारी दर्शन प्रस्तुत किया जिसे 'द्वैत वेदांत' (Dualism) या 'तत्ववाद' कहा जाता है।

मध्वाचार्य (1238–1317 ई.) का आगमन उस समय हुआ जब मायावाद (Illusionism) का बोलबाला था। उन्होंने अपनी वज्र जैसी तार्किक शक्ति से यह स्थापित किया कि यह संसार सपना नहीं है, यह सत्य है। जीव (आत्मा) और ईश्वर (परमात्मा) कभी एक नहीं हो सकते; वे शाश्वत रूप से दो हैं और भिन्न हैं। वेदों की उनकी व्याख्या इतनी वैज्ञानिक और यथार्थवादी (Realistic) है कि आधुनिक विचारक भी उनके तर्कों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं।

📌 श्री मध्वाचार्य: एक दृष्टि में
जन्म नाम वासुदेव (Vasudeva)
संन्यास नाम पूर्णप्रज्ञ (Purnaprajna), आनंदतीर्थ (Anandatirtha)
काल 1238 ई. – 1317 ई. (79 वर्ष)
जन्म स्थान पाजक क्षेत्र (उडुपी के निकट), कर्नाटक
दर्शन द्वैत वेदांत (Dualism) / तत्ववाद
अवतार मुख्यप्राण (वायु) के तीसरे अवतार (हनुमान और भीम के बाद)
प्रमुख कृति सर्वमूल ग्रंथ (37 ग्रंथ), महाभारत तात्पर्य निर्णय, ब्रह्मसूत्र भाष्य
स्थापना उडुपी श्री कृष्ण मठ और अष्ट मठ (Ashta Mathas)

2. जीवन परिचय: पाजक से उडुपी तक की यात्रा

मध्वाचार्य का जन्म दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में उडुपी के पास पाजक (Pajaka) नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम मध्यगेह भट्ट और माता का नाम वेदवती था। उनका बचपन का नाम वासुदेव था।

बचपन के चमत्कार: बचपन से ही उनमें अलौकिक शक्ति और बुद्धि थी। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने एक विशाल चट्टान को एक हाथ से उठाकर रख दिया था, जिसे आज भी 'वासुदेव तीर्थ' के पास देखा जा सकता है। उनमें भीमसेन जैसा शारीरिक बल और बृहस्पति जैसी मेधा थी।

संन्यास: मात्र 16 वर्ष की आयु में, माता-पिता की अनिच्छा के बावजूद, उन्होंने गुरु अच्युतप्रेक्ष से संन्यास की दीक्षा ली। गुरु ने उन्हें 'पूर्णप्रज्ञ' नाम दिया। बाद में, जब उन्होंने प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्र) पर विजय प्राप्त की, तो उन्हें 'आनंदतीर्थ' और 'मध्वाचार्य' कहा जाने लगा।

3. वायु के तीसरे अवतार: हनुमान, भीम और मध्व

द्वैत परंपरा और 'बलित्था सूक्त' (ऋग्वेद) के आधार पर मध्वाचार्य को वायु देव का तीसरा अवतार माना जाता है।

त्रय-अवतार सिद्धांत
  • प्रथम अवतार: हनुमान - त्रेता युग में भगवान राम की सेवा की (कायिक सेवा)।
  • द्वितीय अवतार: भीमसेन - द्वापर युग में भगवान कृष्ण की सेवा की और दुष्टों का संहार किया।
  • तृतीय अवतार: मध्वाचार्य - कलयुग में वेद व्यास (कृष्ण) की सेवा की और भाष्य लिखकर अज्ञान (मायावाद) का संहार किया।

मध्वाचार्य ने स्वयं अपने ग्रंथ 'विष्णु-तत्व-विनिर्णय' में इसका संकेत दिया है। उनकी शारीरिक शक्ति और वाद-विवाद में अजेय रहने की क्षमता को इसी दैवीय शक्ति का प्रमाण माना जाता है।

4. द्वैत वेदांत (तत्ववाद): पंचभेद का सिद्धांत

मध्वाचार्य के दर्शन का मूल आधार 'भेद' (Difference) है। वे कहते हैं कि भेद 'औपाधिक' (temporary) नहीं, बल्कि 'स्वाभाविक' (eternal) है। उनका सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत 'पंचभेद' है।

पंच-भेद (Five Eternal Differences)

संसार में पांच प्रकार के भेद कभी नहीं मिटते, न मुक्ति से पहले, न मुक्ति के बाद:
1. जीवेश्वर भेद: जीव (आत्मा) और ईश्वर (विष्णु) हमेशा अलग हैं।
2. जडेश्वर भेद: जड़ जगत (Matter) और ईश्वर अलग हैं।
3. जीव-जीव भेद: एक आत्मा दूसरी आत्मा से सदैव भिन्न है। कोई भी दो आत्माएं समान नहीं हैं।
4. जड़-जीव भेद: जड़ पदार्थ और आत्मा अलग हैं।
5. जड़-जड़ भेद: एक जड़ वस्तु दूसरी जड़ वस्तु से अलग है।

हरि सर्वोत्तम: मध्वाचार्य के अनुसार, केवल भगवान विष्णु (हरि) ही 'स्वतंत्र' (Independent Reality) हैं। शेष संपूर्ण जगत और जीव 'परतंत्र' (Dependent Reality) हैं। जीव ईश्वर का प्रतिबिंब (Reflection) है और ईश्वर बिम्ब (Original) है (बिम्ब-प्रतिबिम्ब वाद)।

5. सर्वमूल ग्रंथ: प्रस्थानत्रयी पर द्वैत भाष्य

मध्वाचार्य ने 37 ग्रंथों की रचना की जिन्हें सामूहिक रूप से 'सर्वमूल ग्रंथ' कहा जाता है।

  • भाष्य ग्रंथ: उन्होंने ब्रह्मसूत्र, गीता और प्रमुख उपनिषदों पर भाष्य लिखे। उनका 'ऋग्वेद भाष्य' (पहले 40 सूक्तों पर) वेदों की वैष्णव व्याख्या का एक अद्वितीय उदाहरण है।
  • प्रकरण ग्रंथ: 'अनुव्याख्यान' (ब्रह्मसूत्र का दार्शनिक विश्लेषण) उनकी सबसे क्लिष्ट और विद्वतापूर्ण रचना मानी जाती है।
  • महाभारत तात्पर्य निर्णय: इसमें उन्होंने महाभारत के गुप्त अर्थों को उजागर किया और सिद्ध किया कि महाभारत केवल इतिहास नहीं, बल्कि वेदों का सार है।
  • तंत्रसार संग्रह: मूर्ति पूजा और मंदिर निर्माण की विधियाँ।

6. शंकर, रामानुज और मध्व: एक महा-तुलना

वेदांत के इन तीन आचार्यों के मतों का अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है।

विषय शंकराचार्य (अद्वैत) रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत) मध्वाचार्य (द्वैत)
ईश्वर और जीव एक ही हैं (अहं ब्रह्मास्मि)। अंश और अंशी (शरीर-शरीरी भाव)। पूर्णतः भिन्न (स्वामी और सेवक)।
जगत (World) मिथ्या (Illusion/Maya)। सत्य (ईश्वर का शरीर)। पूर्ण सत्य (ईश्वर से अलग)।
मुक्ति (Moksha) ब्रह्म में लीन हो जाना। वैकुण्ठ में ईश्वर की सेवा। स्वरूपानंद की प्राप्ति (भेद बना रहता है)।
तारतम्य (Gradation) सभी आत्माएं ब्रह्म हैं (समान)। सभी मुक्त आत्माएं समान हैं। मुक्ति में भी आत्माओं में ऊंच-नीच (तारतम्य) रहता है।

आनंद-तारतम्य: मध्वाचार्य का एक विशिष्ट और विवादास्पद सिद्धांत है कि मुक्ति (मोक्ष) मिलने के बाद भी आत्माओं के आनंद में अंतर रहता है। जैसे छोटे और बड़े पात्र में पानी भरने की क्षमता अलग होती है, वैसे ही हर आत्मा की आनंद ग्रहण करने की क्षमता अलग होती है।

7. उडुपी श्री कृष्ण और अष्टमठ परंपरा

मध्वाचार्य का सबसे जीवंत स्मारक उडुपी (कर्नाटक) का श्री कृष्ण मंदिर है।

गोपी चंदन और कृष्ण मूर्ति

कहा जाता है कि एक बार मध्वाचार्य ने समुद्र तट पर द्वारका से आ रहे एक जहाज को डूबने से बचाया। जहाज के कप्तान ने उन्हें उपहार देना चाहा। मध्वाचार्य ने केवल 'गोपी चंदन' (मिट्टी) का एक बड़ा ढेला मांगा। जब वह ढेला टूटा, तो उसके अंदर से भगवान बालकृष्ण की एक अति सुंदर मूर्ति निकली, जिसे स्वयं रुक्मिणी जी पूजती थीं। मध्वाचार्य ने उस मूर्ति को उडुपी में स्थापित किया।

अष्ट मठ (Ashta Mathas): भगवान कृष्ण की पूजा निरंतर चलती रहे, इसके लिए उन्होंने अपने 8 शिष्य तैयार किए और 8 मठ स्थापित किए (जैसे पेजावर, अदमरु, पुत्तिगे आदि)। यहाँ हर दो साल में पूजा का अधिकार एक मठ से दूसरे मठ को जाता है, जिसे 'पर्याय' (Paryaya) महोत्सव कहते हैं।

8. निष्कर्ष: भक्ति और तर्क का अद्वितीय संगम

श्री मध्वाचार्य ने भारत को एक ऐसा दर्शन दिया जो तर्क (Logic) पर आधारित यथार्थवाद (Realism) है। उन्होंने दिखाया कि ईश्वर से प्रेम करने के लिए उसे 'स्वयं' मानने की आवश्यकता नहीं है; बल्कि उसे 'स्वामी' मानकर सेवा करने में ही सच्चा आनंद है।

प्रभाव:
- हरिदास साहित्य: पुरंदरदास और कनकदास जैसे महान संतों ने मध्व दर्शन को जन-जन तक पहुँचाया (कर्नाटक संगीत)।
- गौड़ीय वैष्णववाद: चैतन्य महाप्रभु भी मध्व संप्रदाय से दीक्षित माने जाते हैं (माध्व-गौड़ीय संप्रदाय)। इस्कॉन (ISKCON) भी अपनी गुरु परंपरा मध्वाचार्य से ही जोड़ता है।

मध्वाचार्य एक महामानव थे—शारीरिक रूप से बलिष्ठ और बौद्धिक रूप से अजेय। उनका जीवन संदेश है: "सत्य को जानो, जगत को स्वीकार करो, और हरि की सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बनाओ।"


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • सर्वमूल ग्रंथ - मध्वाचार्य (अखिल भारत माधव महामंडल)।
  • मध्व-विजय - नारायण पंडितचार्य (मध्वाचार्य की सबसे प्रामाणिक जीवनी)।
  • History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Vol IV - Dvaita).
  • The Philosophy of Madhvacharya - Dr. B.N.K. Sharma.

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