श्री रामानुजाचार्य: विशिष्टाद्वैत के प्रवर्तक, श्रीभाष्यकार और मानवता के मसीहा
एक विस्तृत दार्शनिक और ऐतिहासिक महागाथा: भक्ति को दार्शनिक आधार और समाज को समानता का अधिकार देने वाले युगपुरुष (The Architect of Vishishtadvaita)
- 1. प्रस्तावना: भक्ति और ज्ञान का सेतु
- 2. जीवन परिचय: श्रीपेरुम्बुदुर से श्रीरंगम तक
- 3. जीवन के मोड़: गुरु से मतभेद और यमुनाचार्य का संदेश
- 4. विशिष्टाद्वैत दर्शन: ईश्वर, जीव और जगत का संबंध
- 5. 'श्रीभाष्य' और अन्य कृतियाँ: ब्रह्मसूत्र की भक्तिपरक व्याख्या
- 6. समाज सुधार: मंदिर प्रवेश और अष्टाक्षर मंत्र का दान
- 7. शंकराचार्य बनाम रामानुजाचार्य: एक तुलनात्मक अध्ययन
- 8. निष्कर्ष: सहस्राब्दी का प्रभाव
भारतीय दर्शन के इतिहास में, यदि आदि शंकराचार्य ने **'बुद्धि'** (Intellect) के शिखर को छूआ, तो श्री रामानुजाचार्य ने **'हृदय'** (Heart) की गहराइयों को मापा। 11वीं शताब्दी में, जब अद्वैत वेदांत का यह मत प्रबल हो रहा था कि "संसार मिथ्या (illusion) है" और "भक्ति केवल अज्ञानी के लिए है", तब रामानुजाचार्य ने वेदों और उपनिषदों के आधार पर यह सिद्ध किया कि **संसार सत्य है, जीव सत्य है और ईश्वर (नारायण) सत्य है।**
रामानुजाचार्य (1017–1137 ई.) केवल एक दार्शनिक नहीं थे; वे एक क्रांतिकारी समाज सुधारक थे। उन्होंने उस समय के कठोर जाति-बंधनों को तोड़ते हुए दलितों और पिछड़ों को **'तिरुक्कुलतार'** (लक्ष्मी के कुल वाले) कहा और उन्हें मंदिर में प्रवेश दिलाया। उनका दर्शन **'विशिष्टाद्वैत'** (Vishishtadvaita) कहलाता है, जो मानता है कि ईश्वर 'विशेषणों' (Attributes) से युक्त है, निर्गुण नहीं।
| जन्म | 1017 ई. (पिङ्गल वर्ष), श्रीपेरुम्बुदुर, तमिलनाडु |
| जीवन काल | 120 वर्ष (1017 – 1137 ई.) |
| उपाधियाँ | यतिराज, भाष्यकार, उడయवर, एम्पेरुमानार, लक्ष्मण मुनि |
| दर्शन | विशिष्टाद्वैत वेदांत (Qualified Non-Dualism) |
| प्रमुख कृति | श्रीभाष्य (ब्रह्मसूत्र भाष्य), गीता भाष्य, वेदार्थ संग्रह |
| गुरु | यादवप्रकाश (आरंभिक), पेरिया नम्बी (दीक्षा गुरु), यमुनाचार्य (मानस गुरु) |
| विशेष योगदान | मंदिरों में दलित प्रवेश, प्रपत्ति (शरणागति) का सिद्धांत |
2. जीवन परिचय: श्रीपेरुम्बुदुर से श्रीरंगम तक
रामानुजाचार्य का जन्म चेन्नई के पास श्रीपेरुम्बुदुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम केशव सोमयाजी और माता का नाम कांतिमती था। बाल्यकाल से ही वे अत्यंत मेधावी थे। उन्हें लक्ष्मण का अवतार माना जाता है, और बाद में संन्यास लेने पर उन्हें 'यतिराज' (यतियों के राजा) कहा गया।
विवाह और गृह त्याग: उनका विवाह कम उम्र में हो गया था, लेकिन उनकी पत्नी के रूढ़िवादी विचारों और रामानुज के उदारवादी दृष्टिकोण में निरंतर संघर्ष रहता था। एक दिन जब उनकी पत्नी ने एक भूखे दलित को भोजन देने से मना कर दिया और स्थान को "अपवित्र" मानकर साफ किया, तो रामानुज ने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और संन्यास ग्रहण कर श्रीरंगम चले गए।
3. जीवन के मोड़: गुरु से मतभेद और यमुनाचार्य का संदेश
रामानुज के जीवन में दो घटनाएं निर्णायक सिद्ध हुईं:
1. यादवप्रकाश से मतभेद (Conflict with Yadavaprakasha)
रामानुज ने कांचीपुरम् में अद्वैत विद्वान यादवप्रकाश से शिक्षा लेना शुरू किया। लेकिन वे यादवप्रकाश की "निर्गुण ब्रह्म" और "जगत मिथ्या" की व्याख्याओं से सहमत नहीं थे।
उदाहरण: छान्दोग्य उपनिषद् के वाक्य "तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी" की व्याख्या करते हुए यादवप्रकाश ने कहा—"ईश्वर की आँखें बंदर के लाल नितम्ब (Monkey's posterior) जैसी हैं।" रामानुज की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने इसका अर्थ किया—"ईश्वर की आँखें सूर्य से खिले हुए कमल (Kapyasam = Blossomed by Sun) के समान हैं।" इस घटना ने गुरु और शिष्य के रास्ते अलग कर दिए।
2. यमुनाचार्य की तीन उंगलियां (The Three Vows)
श्रीरंगम के प्रधान आचार्य **यमुनाचार्य** (आलवन्दार) ने रामानुज की प्रतिभा सुनी और उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए बुलाया। लेकिन जब रामानुज वहां पहुंचे, तो यमुनाचार्य शरीर त्याग चुके थे। रामानुज ने देखा कि मृत शरीर की तीन उंगलियां मुड़ी हुई हैं। रामानुज ने तत्क्षण तीन प्रतिज्ञाएं लीं:
1. मैं ब्रह्मसूत्र पर वैष्णव भाष्य (श्रीभाष्य) लिखूंगा।
2. मैं व्यास और पराशर ऋषि का नाम अमर करूँगा (विष्णु पुराण के सम्मान में)।
3. मैं नम्मालवार (शूद्र संत) की 'तिरुवायमोली' (द्रविड़ वेद) का प्रचार करूँगा।
जैसे ही उन्होंने ये प्रतिज्ञाएं लीं, मुड़ी हुई उंगलियां सीधी हो गईं। यह उनके जीवन का उद्देश्य बन गया।
4. विशिष्टाद्वैत दर्शन: ईश्वर, जीव और जगत का संबंध
रामानुजाचार्य के दर्शन को **विशिष्टाद्वैत** (Vishishta + Advaita) कहा जाता है। इसका अर्थ है—"विशेषणों से युक्त अद्वैत"।
रामानुज के अनुसार, ईश्वर (ब्रह्म) और जगत अलग-अलग (द्वैत) नहीं हैं, लेकिन वे एक (अद्वैत) भी नहीं हैं जैसा कि शंकराचार्य कहते हैं। उनका संबंध **'शरीर और आत्मा'** जैसा है।
1. ईश्वर (शरीरी): परमात्मा (नारायण) इस ब्रह्मांड की आत्मा है।
2. चित् और अचित् (शरीर): सभी जीव (Chit) और जड़ प्रकृति (Achit) ईश्वर का शरीर हैं।
जैसे आत्मा के होने पर शरीर कार्य करता है, वैसे ही ईश्वर के होने पर जगत कार्य करता है। जगत ईश्वर का ही एक प्रकार (Mode) है, इसलिए यह मिथ्या (Illusion) नहीं हो सकता। यह सत्य है।
5. 'श्रीभाष्य' और अन्य कृतियाँ: ब्रह्मसूत्र की भक्तिपरक व्याख्या
रामानुजाचार्य की सबसे महान कृति **'श्रीभाष्य'** (Sri Bhashya) है। यह बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर लिखी गई विस्तृत टीका है।
- बोधायन वृत्ति की खोज: श्रीभाष्य लिखने से पहले, रामानुज अपने शिष्यों के साथ कश्मीर गए (शारदा पीठ) ताकि वे प्राचीन **'बोधायन वृत्ति'** को पढ़ सकें। वहां के पंडितों ने ग्रंथ देने से मना कर दिया, लेकिन कहा जाता है कि माँ सरस्वती ने स्वयं वह ग्रंथ उन्हें सौंपा।
- खंडन: श्रीभाष्य में उन्होंने शंकराचार्य के 'मायावाद' और 'अविद्या' के सिद्धांत का तार्किक खंडन किया। उन्होंने 'सप्त-विध अनुपपत्ति' (Seven Great Untenables) के माध्यम से सिद्ध किया कि अद्वैत का अविद्या सिद्धांत तर्कसंगत नहीं है।
अन्य प्रमुख कृतियाँ:
- वेदार्थ संग्रह: उपनिषदों का सार।
- गीता भाष्य: भगवद्गीता की भक्तिपरक व्याख्या।
- गद्य त्रयम्: शरणागति के तीन गद्य काव्य (शरणगति गद्य, श्रीरंग गद्य, वैकुण्ठ गद्य)।
6. समाज सुधार: मंदिर प्रवेश और अष्टाक्षर मंत्र का दान
रामानुजाचार्य केवल सिद्धांतों में उलझने वाले पंडित नहीं थे; उनका हृदय करुणा से भरा था।
रामानुज ने अपने गुरु **गोष्ठीपूर्ण** से अष्टाक्षर मंत्र ("ॐ नमो नारायणाय") की दीक्षा ली। गुरु ने चेतावनी दी: "यह मंत्र गुप्त रखना। जो इसे जपेगा, वह वैकुण्ठ जाएगा, लेकिन यदि तुमने इसे किसी अयोग्य को दिया, तो तुम नरक जाओगे।"
रामानुज ने अगले ही दिन मंदिर के गोपुरम (शिखर) पर चढ़कर सभी जाति के लोगों को इकट्ठा किया और जोर से मंत्र का उच्चारण कर दिया। गुरु ने क्रोधित होकर पूछा, "तुम्हें पता है इसका फल नरक है?"
रामानुज ने उत्तर दिया: "गुरुदेव! यदि मेरे अकेले के नरक जाने से हजारों लोगों को मोक्ष मिलता है, तो मुझे यह सौदा स्वीकार है।"
गुरु गोष्ठीपूर्ण ने रोते हुए उन्हें गले लगा लिया और कहा—"तुम मुझसे भी बड़े वैष्णव हो। आज से यह दर्शन 'रामानुज दर्शन' कहलाएगा।"
मेलकोट और तिरुक्कुलतार
जब चोल राजा (जो कट्टर शैव था) ने रामानुज को प्रताड़ित किया, तो उन्हें श्रीरंगम छोड़कर कर्नाटक के **मेलकोट** (Melkote) जाना पड़ा। वहां उन्होंने होयसल राजा **विष्णुवर्धन** को वैष्णव बनाया।
मेलकोट में उन्होंने देखा कि दलितों को मंदिर में नहीं आने दिया जाता। उन्होंने आदेश दिया कि दलितों को **'तिरुक्कुलतार'** (Thirukulathar - कुलीन/पवित्र जन) कहा जाए और उन्हें साल में एक बार मंदिर प्रवेश का अधिकार दिया। 11वीं सदी में यह एक अभूतपूर्व क्रांति थी।
7. शंकराचार्य बनाम रामानुजाचार्य: एक तुलनात्मक अध्ययन
भारतीय दर्शन को समझने के लिए इन दो दिग्गजों का अंतर समझना आवश्यक है।
| विषय | शंकराचार्य (अद्वैत) | रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत) |
|---|---|---|
| ईश्वर का स्वरूप | निर्गुण ब्रह्म (बिना गुणों का)। | सगुण ब्रह्म (अनंत कल्याण गुणों से युक्त, नारायण)। |
| जगत (World) | मिथ्या (Maya/Illusion) - रज्जु-सर्प न्याय। | सत्य (Real) - ईश्वर की लीला और शरीर। |
| जीव (Soul) | ब्रह्म ही है (अहं ब्रह्मास्मि)। | ब्रह्म का अंश और सेवक है (दासोऽहम्)। |
| मोक्ष का मार्ग | ज्ञान (Jnana) - "मैं ब्रह्म हूँ" का बोध। | भक्ति और प्रपत्ति (Surrender) - ईश्वर की कृपा। |
| मुक्ति के बाद | आत्मा ब्रह्म में लीन हो जाती है (नदी समुद्र में)। | आत्मा वैकुण्ठ में ईश्वर की सेवा करती है (आनंद का अनुभव)। |
8. निष्कर्ष: सहस्राब्दी का प्रभाव
श्री रामानुजाचार्य 120 वर्ष की दीर्घायु तक जीवित रहे। उनके शरीर को आज भी **श्रीरंगम मंदिर** में सुरक्षित रखा गया है (कहा जाता है कि यह उनकी 'तमोमूर्ति' है, ममी नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से संरक्षित)।
भक्ति आंदोलन के जनक: उत्तर भारत का पूरा भक्ति आंदोलन रामानुज का ऋणी है। रामानुज की परंपरा में **रामानंद** हुए, और रामानंद के शिष्य **कबीर, रैदास** और **तुलसीदास** हुए। इस प्रकार, कबीर के 'निर्गुण राम' और तुलसी के 'सगुण राम' दोनों की जड़ें कहीं न कहीं रामानुज के विशिष्टाद्वैत में मिलती हैं।
आज जब हम हैदराबाद में 'स्टैच्यू ऑफ इक्वलिटी' (Statue of Equality) को देखते हैं, तो हमें याद आता है कि समानता का पाठ पश्चिम से नहीं, बल्कि 1000 साल पहले भारत के इस महान संत ने पढ़ाया था। रामानुजाचार्य ने सिखाया कि **वेदों का ज्ञान** और **हृदय की भक्ति** एक दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। उनका जीवन संदेश है—"ईश्वर की सेवा करनी है तो उसके बनाए जीवों की सेवा करो।"
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- श्रीभाष्य - (हिन्दी अनुवाद) - गीताप्रेस गोरखपुर।
- यतीन्द्र मत दीपिका - श्रीनिवास दास।
- The Life and Teachings of Ramanuja - C.R. Srinivasa Aiyengar.
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Volume III).
- सर्वदर्शनसंग्रह - रामानुज दर्शन अध्याय।
