महाकवि भर्तृहरि: 'शतकत्रय' के प्रणेता और मानव-मन के महान मनोवैज्ञानिक
एक अत्यंत विस्तृत दार्शनिक, साहित्यिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: उज्जैन का वह चक्रवर्ती सम्राट जिसने अपनी पत्नी के धोखे से आहत होकर राजपाट त्याग दिया, और 'नीति', 'शृंगार' तथा 'वैराग्य' पर ऐसे अमर श्लोक रचे जो आज भी जीवन का सबसे बड़ा सत्य माने जाते हैं।
- 1. प्रस्तावना: जीवन के तीन आयामों (Three Dimensions) का गायक
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: विक्रमादित्य के भ्राता या बौद्ध वैयाकरण?
- 3. अमरफल की कथा: रानी पिंगला का धोखा और वैराग्य का उदय
- 4. 'नीतिशतकम्': व्यावहारिक ज्ञान और कर्म का विज्ञान
- 5. 'शृंगारशतकम्': कामदेव का प्रताप और स्त्री-सौंदर्य की स्वीकृति
- 6. 'वैराग्यशतकम्': "वैराग्यमेवाभयम्" (केवल वैराग्य में ही अभय है)
- 7. 'वाक्यपदीय': शब्द-ब्रह्म (Sphota) का महान दार्शनिक ग्रंथ
- 8. निष्कर्ष: राजमहलों से जंगल की गुफा तक की अमर यात्रा
संस्कृत साहित्य में कवियों ने या तो 'शृंगार' (प्रेम) का वर्णन किया है या 'वैराग्य' (संन्यास) का। लेकिन महाकवि भर्तृहरि (Mahakavi Bhartrihari) एकमात्र ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने जीवन के सभी रंगों को पूरी गहराई से जिया और उन्हें पूरी ईमानदारी से अपनी कविताओं में उतारा।
उन्होंने मानव जीवन के तीन प्रमुख चरणों को तीन पुस्तकों में पिरोया, जिसे 'शतकत्रय' (Shatakatraya - The Three Hundreds) कहा जाता है:
1. नीतिशतक (Niti Shataka): समाज में कैसे जियें और व्यवहार करें।
2. शृंगारशतक (Shringara Shataka): यौवन में प्रेम और कामुकता का आकर्षण कैसा होता है।
3. वैराग्यशतक (Vairagya Shataka): बुढ़ापे में या सत्य का ज्ञान होने पर संसार से मोहभंग कैसे होता है।
| पूरा नाम एवं उपाधि | भर्तृहरि (जनश्रुति के अनुसार 'राजा भर्तृहरि')। वे नाथ संप्रदाय के एक महान योगी (राजर्षि) भी माने जाते हैं। |
| जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) |
1. पारंपरिक मान्यता: प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व (1st Century BCE)। जनश्रुतियों के अनुसार वे मालवा (उज्जैन) के महान राजा विक्रमादित्य के बड़े सौतेले भाई थे। 2. ऐतिहासिक/अकादमिक मत: 5वीं से 7वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य। चीनी यात्री इत्सिंग (I-Tsing, 671 ई.) ने अपने यात्रा-वृत्तांत में लिखा है कि 'भर्तृहरि' नामक एक महान वैयाकरण बौद्ध विद्वान का निधन 651 ईस्वी में हुआ था, जो सात बार संन्यासी बने और सात बार गृहस्थ जीवन में लौटे। (विद्वानों में आज भी यह मतभेद है कि शतकत्रय के रचयिता राजा भर्तृहरि और वैयाकरण भर्तृहरि एक ही व्यक्ति थे या अलग-अलग)। |
| कार्यक्षेत्र / राज्य | उज्जैन (मालवा)। (आज भी उज्जैन में 'भर्तृहरि की गुफा' स्थित है जहाँ उन्होंने तपस्या की थी)। |
| महानतम काव्यात्मक कृति | शतकत्रय (Shatakatraya) - (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक)। प्रत्येक में 100+ मुक्तक श्लोक। |
| महानतम दार्शनिक कृति | वाक्यपदीय (Vakyapadiya) - भाषा-विज्ञान और 'शब्द-ब्रह्म' (Sphota) का ग्रंथ। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: विक्रमादित्य के भ्राता या बौद्ध वैयाकरण?
भारतीय जनमानस में भर्तृहरि एक चक्रवर्ती राजा के रूप में अमर हैं। लोककथाओं के अनुसार उनके पिता गंधर्वसेन थे। भर्तृहरि अपने पिता के बाद उज्जैन के राजा बने, जबकि उनके छोटे भाई विक्रमादित्य उनके मंत्री थे।
दूसरी ओर, अकादमिक इतिहासकार चीनी यात्री इत्सिंग (I-Tsing) के वर्णन का हवाला देते हुए उन्हें 7वीं शताब्दी का एक बौद्ध या वेदांती वैयाकरण मानते हैं, जिनका मन 'संसार' (Monastery/World) और 'संन्यास' (Renunciation) के बीच झूलता रहता था। यही कारण है कि उनके साहित्य में शृंगार और वैराग्य दोनों का अत्यंत गहरा और व्यक्तिगत अनुभव झलकता है।
3. अमरफल की कथा: रानी पिंगला का धोखा और वैराग्य का उदय
भर्तृहरि के 'वैराग्य' धारण करने के पीछे एक अत्यंत विख्यात और हृदयविदारक किंवदंती है, जिसका वर्णन उन्होंने स्वयं अपने श्लोक में एक दार्शनिक रूप में किया है।
एक बार एक तपस्वी ब्राह्मण ने राजा भर्तृहरि को एक 'अमरफल' (फल जिसे खाकर यौवन अमर हो जाए) दिया। राजा अपनी सबसे छोटी और प्रिय पत्नी रानी पिंगला से अथाह प्रेम करते थे। उन्होंने वह अमरफल अपनी रानी को दे दिया ताकि वह हमेशा युवा और सुंदर रहे।
लेकिन रानी पिंगला राजा से नहीं, बल्कि राज्य के एक अश्वपाल (घोड़ों के रखवाले / सेनापति) से गुप्त प्रेम करती थी। रानी ने वह फल उस सेनापति को दे दिया।
विडंबना यह थी कि वह सेनापति रानी से नहीं, बल्कि राज्य की एक वेश्या (गणिका) से प्रेम करता था। उसने वह फल उस वेश्या को दे दिया।
वेश्या ने सोचा कि इस नश्वर और पापी जीवन को अमर करके क्या लाभ? उसने सोचा कि हमारे महान राजा भर्तृहरि को इसकी आवश्यकता है। वेश्या ने जाकर वह अमरफल पुनः राजा भर्तृहरि को भेंट कर दिया।
अपने ही दिए हुए फल को वेश्या के हाथों में देखकर राजा भर्तृहरि सन्न रह गए। छानबीन करने पर जब उन्हें रानी के धोखे का पता चला, तो उनका हृदय संसार से पूरी तरह विरक्त हो गया। इसी पीड़ा को उन्होंने 'नीतिशतक' के इस अमर श्लोक में व्यक्त किया है:
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥ (अर्थ: जिस (रानी) के बारे में मैं निरंतर सोचता हूँ, वह मुझसे विरक्त (उदासीन) है। वह किसी अन्य व्यक्ति (सेनापति) को चाहती है, और वह व्यक्ति किसी और (वेश्या) में आसक्त है। और कोई अन्य स्त्री (वेश्या) मेरे लिए संतुष्ट (समर्पित) है।
धिक्कार है उस रानी को, धिक्कार है उस सेनापति को, धिक्कार है उस कामदेव को, धिक्कार है इस वेश्या को, और धिक्कार है स्वयं मुझको!)
इसी क्षण भर्तृहरि ने अपना मुकुट उतार फेंका, राजपाट विक्रमादित्य को सौंपा, और संन्यासी बनकर जंगल की ओर निकल गए।
4. 'नीतिशतकम्': व्यावहारिक ज्ञान और कर्म का विज्ञान
'नीतिशतक' में भर्तृहरि ने बताया है कि समाज में एक सज्जन पुरुष को कैसे जीना चाहिए। इसमें विद्या का महत्व, मूर्खों की निंदा, और 'कर्म' (भाग्य) की प्रधानता का वर्णन है।
भर्तृहरि कहते हैं कि किसी अज्ञानी को समझाना आसान है, और किसी ज्ञानी को समझाना तो और भी आसान है। लेकिन जो 'आधा-अधूरा' ज्ञान रखता है, उसे साक्षात ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते:
"अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति॥"
इसी शतक में उनका "विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्..." (विद्या मनुष्य का वास्तविक रूप है, यह छिपा हुआ गुप्त धन है) श्लोक भारतीय शिक्षा-प्रणाली का आधारभूत मंत्र माना जाता है।
5. 'शृंगारशतकम्': कामदेव का प्रताप और स्त्री-सौंदर्य की स्वीकृति
यद्यपि भर्तृहरि एक वैरागी बन गए थे, लेकिन उन्होंने 'शृंगारशतक' में स्त्री-सौंदर्य और 'काम' (Desire) की शक्ति को पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया है। वे कोई पाखंडी साधु नहीं थे जो कामुकता से आँखें चुराए।
वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि जब तक मनुष्य के भीतर कामदेव का वास है, तब तक ज्ञान और वैराग्य की बातें बेमानी हैं। एक श्लोक में वे कहते हैं कि स्त्रियों की कटाक्षपूर्ण दृष्टि (तिरछी नज़र) से बड़े-बड़े मुनियों का तप भी नष्ट हो जाता है। यह शतक यौवन के उस उन्माद का अत्यंत पारदर्शी चित्र है, जिसे जिए बिना कोई व्यक्ति सच्चे वैराग्य की ओर नहीं बढ़ सकता।
6. 'वैराग्यशतकम्': "वैराग्यमेवाभयम्" (केवल वैराग्य में ही अभय है)
भर्तृहरि की आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम और सर्वोच्च शिखर 'वैराग्यशतक' है। इसमें संसार की नश्वरता, समय की शक्ति (काल-महिमा), और इच्छाओं के खोखलेपन का अत्यंत विदारक वर्णन है।
वे कहते हैं कि संसार की हर चीज़ के साथ कोई न कोई 'डर' (Fear) जुड़ा हुआ है। केवल एक ही चीज़ है जिसमें कोई डर नहीं है—और वह है 'वैराग्य' (पूर्ण त्याग):
माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरयाभयम्।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयम्
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्॥ (अर्थ: भोग (सुखों) में 'रोग' का डर है, उच्च कुल में कलंक (गिरने) का डर है, धन में राजा/चोर का डर है, सम्मान में दीनता (अपमान) का डर है, बल में शत्रु का डर है, सुंदरता में बुढ़ापे का डर है, शास्त्र-ज्ञान में शास्त्रार्थ (विवाद) का डर है, गुणों में दुष्टों का डर है, और शरीर में मृत्यु (यमराज) का डर है।
इस पृथ्वी पर मनुष्य की प्रत्येक वस्तु किसी न किसी 'भय' से घिरी हुई है; केवल 'वैराग्य' (Renunciation) ही एकमात्र ऐसी अवस्था है जो पूर्णतः 'अभय' (Fearless) है।)
7. 'वाक्यपदीय': शब्द-ब्रह्म (Sphota) का महान दार्शनिक ग्रंथ
कविता से इतर, भर्तृहरि भारतीय दर्शन और भाषा-विज्ञान (Linguistics) के भी एक महान आचार्य थे। उन्होंने 'वाक्यपदीय' (Vakyapadiya) नामक ग्रंथ लिखा, जो संस्कृत व्याकरण के दर्शन पर विश्व का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
इसमें उन्होंने 'शब्द-अद्वैत' (Shabda-Brahma) का सिद्धांत दिया। उनके अनुसार, यह पूरा ब्रह्मांड एक परम चेतना से उत्पन्न हुआ है जिसे 'शब्द-ब्रह्म' कहते हैं। जब हम कोई शब्द बोलते हैं, तो हमारे मन में जो अर्थ प्रस्फुटित (Sphota) होता है, वही वास्तविक भाषा है। आधुनिक भाषाविज्ञानी (Noam Chomsky आदि) भी भर्तृहरि के इस भाषाई-दर्शन (Philosophy of Language) का अत्यंत सम्मान करते हैं।
8. निष्कर्ष: राजमहलों से जंगल की गुफा तक की अमर यात्रा
महाकवि भर्तृहरि का जीवन इस बात का प्रमाण है कि 'सच्चा संन्यास' अज्ञानता या पलायन से नहीं, बल्कि जीवन को पूरी तरह भोगने के बाद आई 'समझ' से पैदा होता है।
जो व्यक्ति पहले 'शृंगार' का सम्राट रहा हो, वही व्यक्ति 'वैराग्य' का सच्चा अधिकारी हो सकता है। भर्तृहरि ने अपने 'शतकत्रय' के माध्यम से भारतीय समाज को एक ऐसा दर्पण (Mirror) दिया है, जिसमें हर आयु का व्यक्ति अपना चेहरा देख सकता है। एक छात्र उनके नीतिशतक से सीखता है, एक युवा उनके शृंगारशतक में स्वयं को पाता है, और एक प्रौढ़ व्यक्ति उनके वैराग्यशतक में शांति खोजता है। उज्जैन की गुफाओं में गूंजता उनका वह वैराग्य-नाद आज भी भारतीय जनमानस की सबसे गहरी आध्यात्मिक धरोहर है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- शतकत्रयम् - महाकवि भर्तृहरि (चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अनुवाद)।
- वाक्यपदीयम् - भर्तृहरि (भाषा-दर्शन का मूल ग्रंथ)।
- A Record of the Buddhist Religion as Practised in India and the Malay Archipelago - I-Tsing (इत्सिंग का यात्रा वृत्तांत - भर्तृहरि का ऐतिहासिक संदर्भ)।
- संस्कृत साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।
