महाकवि भवभूति: 'उत्तररामचरितम्' के रचयिता और 'करुण रस' के सर्वोच्च सम्राट | Mahakavi Bhavabhuti

Sooraj Krishna Shastri
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महाकवि भवभूति: 'उत्तररामचरितम्' और 'करुण रस' के सम्राट

महाकवि भवभूति: 'उत्तररामचरितम्' के प्रणेता और 'करुण रस' के सर्वोच्च सम्राट

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक और नाट्यशास्त्रीय विश्लेषण: प्राचीन भारत का वह महान नाटककार जिसने 'शृंगार' और 'वीर' रस के स्थापित नियमों को तोड़कर, मानव हृदय की चीख, विरह और 'करुणा' को संपूर्ण ब्रह्मांड का एकमात्र 'रस' (Emotion) घोषित कर दिया।

संस्कृत साहित्य के आलोचकों के बीच एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक है: "काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला... उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते।" अर्थात्, नाटकों में 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' सुंदर है, लेकिन जब बात 'उत्तररामचरितम्' की आती है, तो भवभूति (Bhavabhuti) कालिदास को भी पीछे छोड़ देते हैं।

कालिदास का साहित्य वसंत ऋतु के खिले हुए फूलों के समान है, जिसमें मिलन की मिठास है। इसके विपरीत, भवभूति का साहित्य घने और भयानक दंडकारण्य वन के समान है, जहाँ एक महान राजा (राम) अपनी निर्वासित पत्नी (सीता) की याद में साधारण मनुष्य की तरह फूट-फूट कर रोता है। भवभूति ने सिद्ध किया कि 'आँसू' (Tears) केवल कमज़ोरी का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे प्रेम की सबसे गहरी और सबसे पवित्र अभिव्यक्ति हैं।

📌 महाकवि भवभूति: एक ऐतिहासिक एवं नाट्यशास्त्रीय प्रोफाइल
मूल नाम एवं गोत्र मूल नाम 'श्रीकण्ठ' (Shrikantha) था। 'भवभूति' उनकी उपाधि थी। (काश्यप गोत्र के उदुम्बर ब्राह्मण)। माता: जतुकर्णी, पिता: नीलकंठ।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत: 8वीं शताब्दी ईस्वी का पूर्वार्ध (Early 8th Century CE / लगभग 700 - 740 ई.)।
ऐतिहासिक प्रमाण: कल्हण की 'राजतरंगिणी' (Rajatarangini) के अनुसार, भवभूति कन्नौज के राजा यशोवर्मन (King Yashovarman) के राजकवि थे। कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड ने 736 ई. के आस-पास यशोवर्मन को पराजित किया था और भवभूति को अपने साथ कश्मीर ले गया था। अतः उनका काल पूर्णतः प्रामाणिक है।
जन्म स्थान पद्मपुर (आधुनिक महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित विदर्भ क्षेत्र)।
महानतम कृति (Masterpiece) उत्तररामचरितम् (Uttararamacharitam) - 7 अंकों का नाटक (राम के उत्तर-जीवन पर)।
अन्य कृतियाँ महावीरचरितम् (वीर रस प्रधान), मालतीमाधवम् (शृंगार प्रधान प्रकरण नाटक)।
सर्वोच्च रस (Dominant Rasa) करुण रस (Pathos) - "एको रसः करुण एव"।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: यशोवर्मन का राजदरबार

भवभूति का जन्म विदर्भ (महाराष्ट्र) के एक अत्यंत कुलीन और वेद-पाठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम 'श्रीकण्ठ' था। वे व्याकरण, न्याय (तर्कशास्त्र), और मीमांसा के प्रकांड विद्वान थे (स्वयं को 'पदवाक्यप्रमाणज्ञ' कहते थे)।

वे कन्नौज के प्रतापी राजा यशोवर्मन के दरबार के रत्न थे। उसी दरबार में प्राकृत के महान कवि 'वाक्पतिराज' भी थे। जब कश्मीर के शासक ललितादित्य ने कन्नौज पर आक्रमण कर यशोवर्मन को हराया, तो संधि की शर्तों में उसने जिन बहुमूल्य 'रत्नों' की मांग की, उनमें भवभूति प्रमुख थे।

3. भवभूति की 'नाट्य-त्रयी': वीर से लेकर करुण रस तक की यात्रा

भवभूति ने अपने जीवन में तीन महान नाटकों की रचना की, जो मानव जीवन की तीन अवस्थाओं और तीन रसों का प्रतिनिधित्व करते हैं:

  • महावीरचरितम् (वीर रस): यह राम के युवावस्था (सीता विवाह से लेकर रावण वध तक) की कथा है। इसमें 'वीर' और 'रौद्र' रस की प्रधानता है।
  • मालतीमाधवम् (शृंगार रस): यह 10 अंकों का एक 'प्रकरण' (रोमांटिक नाटक) है। इसमें माधव और मालती की प्रेम कथा है, जिसमें तांत्रिकों, कपालिकों और श्मशान-भूमि के अत्यंत डरावने और रोमांचक दृश्य (Horror/Romance) हैं।
  • उत्तररामचरितम् (करुण रस): यह उनकी प्रौढ़ावस्था की और सर्वश्रेष्ठ रचना है, जिसमें राम के राजा बनने के बाद सीता-निर्वासन (Banishment) और उनके पुनर्मिलन की अत्यंत कारुणिक कथा है।

4. 'उत्तररामचरितम्': राम के पश्चात्ताप और सीता के विरह की गाथा

वाल्मीकि रामायण का 'उत्तरकाण्ड' अत्यंत दुखांत है (जहाँ सीता धरती में समा जाती हैं)। लेकिन भवभूति ने अपने नाटक 'उत्तररामचरितम्' में इस कथा को एक नया मनोवैज्ञानिक और 'सुखांत' (Happy ending) मोड़ दिया।

नाटक का कथानक

लोकापवाद (जनता के तानों) के कारण राम गर्भवती सीता को जंगल में छोड़ देते हैं। वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश का जन्म होता है। 12 वर्ष बीत जाते हैं।

राम एक शंबूक नामक शूद्र के वध के प्रसंग में दंडकारण्य (पंचवटी) आते हैं। यह वही वन है जहाँ उन्होंने सीता के साथ अपने यौवन के सबसे सुंदर दिन बिताए थे। उन पुराने पेड़ों, नदियों (गोदावरी, तमसा) और हिरणों को देखकर राम का धैर्य टूट जाता है और वे एक साधारण विरही मनुष्य की तरह फूट-फूट कर रोने लगते हैं। अंततः महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में एक 'गर्भ-नाटक' (Play within a play) के माध्यम से राम और सीता का पुनर्मिलन होता है।

5. "एको रसः करुण एव": करुण रस का अद्वैत दर्शन

भवभूति का सबसे बड़ा दार्शनिक और काव्यशास्त्रीय योगदान उनका यह सिद्धांत है कि संसार में 'करुणा' (Pathos) ही एकमात्र रस है।

भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में 8 रस माने थे, लेकिन भवभूति ने उत्तररामचरितम् के तीसरे अंक में घोषणा की:

एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्
भिन्नः पृथक्पृथगिव श्रयते विवर्तान्।
आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान्विकारान्
अम्भो यथा सलिलमेव हि तत्समस्तम्॥
(अर्थ: वास्तव में 'करुण रस' (करुणा) ही एकमात्र रस है। जिस प्रकार जल (पानी) ही अलग-अलग कारणों से भंवर, बुलबुले और लहरों (तरंगों) का रूप ले लेता है, लेकिन मूल रूप में वह 'जल' ही रहता है, ठीक उसी प्रकार अन्य सभी रस (शृंगार, वीर, हास्य) उसी एक 'करुण रस' के अलग-अलग रूप (विवर्त) मात्र हैं।)

भवभूति के अनुसार, सच्चा प्रेम और मिलन भी करुणा (एक-दूसरे को खोने के डर) के बिना अधूरा है।

6. तृतीय अंक (छायाङ्क): संस्कृत रंगमंच का सबसे महान मनोवैज्ञानिक दृश्य

उत्तररामचरितम् का तीसरा अंक 'छायांक' (The Shadow Act) विश्व साहित्य के सबसे महान दृश्यों में गिना जाता है।

अदृश्य सीता और रोते हुए राम

राम पंचवटी में आकर विरह की आग में जल रहे हैं। सीता भी भागीरथी (गंगा) के आशीर्वाद से अदृश्य (छाया रूप में) उसी वन में उपस्थित हैं। सीता अदृश्य रहकर राम को देख सकती हैं, लेकिन राम सीता को नहीं देख सकते।

राम अपने पुराने दिनों को याद कर विलाप करते हैं और मूर्छित (बेहोश) हो जाते हैं। तब अदृश्य सीता अपने कोमल हाथों से राम का स्पर्श करती हैं। सीता के स्पर्श से राम को होश आ जाता है और वे आनंद से चिल्लाते हैं: "हा प्रिये जानकि!" लेकिन आँखें खोलने पर उन्हें कोई नहीं दिखता। यह लुका-छिपी (Psychological play) दर्शकों के हृदयों को चीर कर रख देती है।

भवभूति लिखते हैं कि राम के इस रुदन को देखकर प्रकृति की भी वही हालत होती है:

अपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्। (अर्थ: राम के उस असीम दुःख को देखकर पत्थर भी रोने लगते हैं, और कठोर वज्र का हृदय भी फट जाता है।)

7. भवभूति के राम: "वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि"

भवभूति ने राम के चरित्र का जो विश्लेषण किया है, वह वाल्मीकि और तुलसीदास से भी अधिक मानवीय है। भवभूति के राम एक ही समय में एक 'कठोर राजा' और एक 'कोमल पति' हैं। भवभूति महापुरुषों के चरित्र का वर्णन करते हुए लिखते हैं:

वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति॥
(अर्थ: जो लोग महापुरुष (लोकोत्तर) होते हैं, उनका हृदय वज्र से भी अधिक कठोर (कर्तव्य पालन में) और फूल से भी अधिक कोमल (प्रेम और करुणा में) होता है। ऐसे हृदय को भला कौन समझ सकता है?)

राम ने 'राजा' के रूप में वज्र के समान कठोर होकर सीता का परित्याग कर दिया, लेकिन 'पति' के रूप में वे सीता की याद में फूल के समान कोमल होकर पंचवटी में फूट-फूट कर रोते हैं।

8. निष्कर्ष: पत्थरों को रुलाने वाला महाकवि

कालिदास यदि सौंदर्य और माधुर्य के कवि हैं, तो भवभूति पीड़ा, त्याग और अंतर्मन की गहराइयों के कवि हैं। भवभूति को अपने जीवनकाल में उचित सम्मान नहीं मिला था। उनके समकालीन आलोचकों ने उनकी भाषा को 'कठोर' कहकर उनकी उपेक्षा की थी।

तब भवभूति ने अत्यंत गर्व और आत्मविश्वास के साथ लिखा था: "ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञाम्..." (जो लोग आज मेरी उपेक्षा कर रहे हैं, वे जान लें कि यह रचना उनके लिए नहीं है। भविष्य में कोई न कोई मेरे समान विचारों वाला अवश्य पैदा होगा, क्योंकि समय अनंत है और यह पृथ्वी बहुत विशाल है)।

और भवभूति की वह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। आज 'उत्तररामचरितम्' को पढ़ने वाला हर विद्वान यह स्वीकार करता है कि करुण रस की जो असीम गहराइयां भवभूति ने नापी हैं, वहाँ तक विश्व का कोई अन्य नाटककार नहीं पहुँच सका।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • उत्तररामचरितम् - महाकवि भवभूति (संस्कृत मूल एवं हिंदी अनुवाद)।
  • राजतरंगिणी - कल्हण (भवभूति और यशोवर्मन के ऐतिहासिक संदर्भ हेतु)।
  • Sanskrit Drama - A.B. Keith (भवभूति के नाट्य-शिल्प का मूल्यांकन)।
  • संस्कृत साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।

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