महाकवि मयूरभट्ट: 'सूर्यशतकम्' के रचयिता, बाणभट्ट के समकालीन और सूर्य-उपासना के महान साधक | Mayurabhatta

Sooraj Krishna Shastri
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महाकवि मयूरभट्ट: 'सूर्यशतकम्' के रचयिता और सूर्य-भक्ति के अमर साधक

महाकवि मयूरभट्ट: 'सूर्यशतकम्' के प्रणेता और सूर्य-भक्ति के अमर साधक

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक विश्लेषण: प्राचीन भारत का वह ओजस्वी कवि, जिसने शारीरिक व्याधि (कुष्ठ रोग) के भयंकर कष्ट में पड़कर, भगवान सूर्य की ऐसी अलंकृत स्तुति रची कि स्वयं सूर्यदेव को आकाश से उतरकर उन्हें नव-जीवन का वरदान देना पड़ा।

संस्कृत साहित्य में 'शतक-परंपरा' (Shataka Tradition - 100 श्लोकों का संग्रह) का बहुत बड़ा महत्व है (जैसे भर्तृहरि का नीतिशतक, अमरु का अमरुशतक)। लेकिन जब बात भक्ति और चमत्कार की आती है, तो महाकवि मयूरभट्ट (Mahakavi Mayurabhatta) द्वारा रचित 'सूर्यशतकम्' (Surya Shatakam) का नाम सबसे ऊपर आता है।

मयूरभट्ट केवल एक कवि नहीं थे, वे सम्राट हर्षवर्धन के दरबार के उन नवरत्नों में से थे, जो गद्य-सम्राट बाणभट्ट को भी कड़ी टक्कर देते थे। उनका 'सूर्यशतकम्' मात्र एक प्रार्थना नहीं है; यह एक ऐसा 'तांत्रिक और काव्यात्मक अनुष्ठान' (Tantric and Poetic Ritual) था, जिसने संस्कृत की 'गौड़ी रीति' (कठोर और अलंकृत शब्दावली) को भक्ति-साहित्य के शिखर पर पहुँचा दिया।

📌 महाकवि मयूरभट्ट: एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रोफाइल
पूरा नाम महाकवि मयूरभट्ट (Mayurabhatta)
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): 7वीं शताब्दी ईस्वी का पूर्वार्ध (First half of 7th Century CE)।
वे उत्तर भारत के महान सम्राट हर्षवर्धन (शासनकाल 606–647 ईस्वी) के राजकवि और बाणभट्ट के समकालीन (Contemporary) थे। राजशेखर ने अपने श्लोकों में बाणभट्ट और मयूरभट्ट का एक साथ उल्लेख किया है।
बाणभट्ट से संबंध पारंपरिक जनश्रुतियों के अनुसार, मयूरभट्ट बाणभट्ट के साले (Brother-in-law) या ससुर थे। दोनों में घोर साहित्यिक और पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता (Rivalry) थी।
महानतम कृति सूर्यशतकम् (Surya Shatakam) - भगवान सूर्य की स्तुति में रचे गए 100 श्लोक।
अन्य कृतियाँ मयूराष्टकम् (Mayurashtakam) - (शृंगार प्रधान आठ श्लोकों का संग्रह)।
प्रिय छंद और शैली स्रग्धरा छंद (Sragdhara Chhanda - 21 अक्षरों वाला विशाल छंद) और गौड़ी रीति (Gaudi Riti)।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: हर्षवर्धन का स्वर्ण युग

कवि मयूरभट्ट का जीवन पूर्णतः 7वीं शताब्दी (हर्षवर्धन के काल) में व्यतीत हुआ। यह वह युग था जब भारत में ज्ञान, कला और साहित्य अपने चरमोत्कर्ष पर थे। कन्नौज और उज्जयिनी के राजदरबारों में विद्वानों के बीच भयंकर 'शास्त्रार्थ' (Debates) और काव्य-प्रतियोगिताएं होती थीं।

10वीं सदी के आचार्य राजशेखर ने अपनी 'कर्पूरमंजरी' और अन्य सूक्तियों में लिखा है कि सम्राट हर्ष के दरबार में बाणभट्ट, मयूरभट्ट, और मातंग-दिवाकर जैसे रत्न शोभा बढ़ाते थे: "अहो प्रभावो वाग्देव्याः यन्मातङ्गदिवाकरः। श्रीहर्षस्याभवत् सभ्यः समो बाणमयूरयोः॥" (यह वाग्देवी सरस्वती का ही प्रभाव है कि मातंग-दिवाकर जैसे कवि हर्ष की सभा में बाण और मयूर के समान आदरणीय बने)।

3. ऐतिहासिक किंवदंती: बाणभट्ट से प्रतिद्वंद्विता और 'शाप'

मयूरभट्ट के जीवन और 'सूर्यशतक' की रचना के पीछे एक अत्यंत विख्यात और कुछ हद तक विवादित किंवदंती (Legend) है, जिसका उल्लेख जैन विद्वान मेरुतुंग ने 'प्रबंधचिंतामणि' में किया है।

शृंगारिक कविता और कुष्ठ रोग का शाप

कहा जाता है कि बाणभट्ट और उनकी पत्नी (जो मयूरभट्ट की बहन या पुत्री बताई जाती हैं) के बीच किसी बात पर मनमुटाव हो गया। बाणभट्ट ने अपनी पत्नी को मनाने के लिए रात भर कविताएं लिखीं। सुबह जब मयूरभट्ट वहां पहुंचे, तो उन्होंने बाणभट्ट की अधूरी कविता सुनी और अपनी ओर से एक अत्यंत शृंगारिक और अंतरंग (Intimate) पंक्ति जोड़ दी, जिसमें बाण की पत्नी के सौंदर्य का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन था।

इस अंतरंग वर्णन को सुनकर बाणभट्ट की पत्नी अत्यंत क्रोधित और लज्जित हो उठीं। उन्होंने मयूरभट्ट को अपनी मर्यादा भूलने के कारण शाप (Curse) दे दिया कि "तुम कुष्ठ रोगी (Leper) हो जाओ!" शाप के प्रभाव से मयूरभट्ट का शरीर श्वेत-कुष्ठ (Leprosy) से ग्रसित हो गया और उनके अंग गलने लगे।

4. 'सूर्यशतकम्' की रचना: मृत्यु के द्वार पर सूर्य-साधना

रोग से अत्यंत पीड़ित मयूरभट्ट ने इस भयंकर कष्ट से मुक्ति पाने के लिए प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य (Sun God) की आराधना करने का निश्चय किया।

उन्होंने एक ऊंचे वृक्ष (या कुछ कथाओं के अनुसार एक मंदिर के मंडप) से 100 धागों (Threads) के सहारे स्वयं को उल्टा लटका लिया। उन्होंने निश्चय किया कि वे सूर्य भगवान की स्तुति में प्रतिदिन एक श्लोक रचेंगे और एक धागा काट देंगे। यदि 100 श्लोक पूरे होने तक सूर्यदेव ने उन्हें ठीक नहीं किया, तो वे 100वाँ धागा कटते ही गिरकर अपने प्राण त्याग देंगे।

जैसे-जैसे वे एक-एक श्लोक पढ़ते गए, उनका एक-एक अंग ठीक होता गया। जब उन्होंने 100वाँ श्लोक पूर्ण किया, तो सूर्यदेव प्रत्यक्ष प्रकट हुए और मयूरभट्ट का शरीर सोने के समान (स्वर्ण-कांति) रोगमुक्त और सुंदर हो गया। इन्हीं 100 श्लोकों का संग्रह आज 'सूर्यशतकम्' के नाम से विश्व-विख्यात है।

5. 'स्रग्धरा' छंद और गौड़ी रीति का महासागर

'सूर्यशतकम्' कोई सामान्य प्रार्थना नहीं है जिसे आसानी से गाया जा सके। यह संस्कृत की 'गौड़ी रीति' (Gaudi Riti) का चरम शिखर है।

काव्यशास्त्रीय जटिलता और ओज-गुण

स्रग्धरा छंद: मयूरभट्ट ने इस पूरे शतक को 'स्रग्धरा' (Sragdhara) छंद में लिखा है। इस छंद के एक चरण (Line) में 21 अक्षर (Syllables) होते हैं (अर्थात् एक श्लोक में 84 अक्षर)। यह अत्यंत लंबा और सांस रोक देने वाला छंद है, जो वीर रस और तीव्र स्तुति के लिए उपयोग होता है।

लंबे समास (Compounds): उन्होंने श्लोकों में इतने लंबे समास और 'अनुप्रास' (Alliteration) का प्रयोग किया है कि एक श्लोक को पढ़ने के लिए उच्च कोटि के व्याकरण ज्ञान की आवश्यकता होती है। उनके श्लोकों की ध्वनि में ही सूर्य की प्रचंड रश्मियों (तेज धूप) का अहसास होता है।

6. मंगलाचरण: सूर्य की रश्मियों (किरणों) का ओजस्वी वर्णन

सूर्यशतकम् का मंगलाचरण (प्रथम श्लोक) इतना ओजस्वी है कि यह पाठक के मस्तिष्क में सूर्योदय का एक प्रखर चित्र (Visual) खींच देता है। मयूरभट्ट सूर्य की प्रातःकालीन लाल किरणों की वंदना करते हैं:

जम्भारातीभकुम्भोद्भवमिव दधतः सान्द्रसिन्दूररेणुं
रक्ताः सिक्ता इवोद्यत्खदिरदलजलैः सुप्रभाते प्रभाते।
...
सूर्याश्वाः प्रातरव्यासुः...
(अर्थ: प्रातःकाल के समय सूर्य की वे लाल किरणें आपकी रक्षा करें, जो ऐसी प्रतीत होती हैं मानो उन्होंने देवराज इंद्र के हाथी (ऐरावत) के गंडस्थल से गाढ़ा लाल सिंदूर पोत लिया हो, या मानो उन्हें खदिर (कत्था / खैर) के लाल पत्तों के रस में डुबोकर निकाला गया हो...)

यहाँ 'जम्भारातीभकुम्भोद्भवमिव' (Jambharatibhakumbhodbhavamiva) जैसे लंबे और जटिल शब्दों का प्रयोग ही मयूरभट्ट की 'गौड़ी रीति' का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

7. 'चण्डीशतकम्': बाणभट्ट का मयूर को काव्यात्मक उत्तर

मयूरभट्ट के इस चमत्कार से राजदरबार में उनकी ख्याति बाणभट्ट से भी अधिक हो गई। इस पर बाणभट्ट के स्वाभिमान को ठेस पहुँची।

उसी किंवदंती के अनुसार, यह सिद्ध करने के लिए कि उनके काव्य में भी दैवीय शक्ति है, बाणभट्ट ने स्वयं अपने हाथ-पैर काट लिए (Mutilated himself) और भगवती दुर्गा की स्तुति में 'चण्डीशतकम्' (Chandi Shatakam) नामक 100 श्लोकों का एक अत्यंत प्रचंड स्तोत्र लिखा। चण्डीशतक के प्रभाव से देवी दुर्गा प्रसन्न हुईं और बाणभट्ट के अंग पुनः जुड़ गए।
यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इसे केवल एक अलंकारिक कथा मानते हैं, लेकिन यह कथा स्पष्ट करती है कि संस्कृत के ये दोनों 'शतक' (सूर्यशतक और चण्डीशतक) समकालीन हैं और दोनों में ही काव्यात्मक जटिलता की होड़ लगी हुई है।

8. निष्कर्ष: भारतीय साहित्य में रोग-मुक्ति और कला का समन्वय

महाकवि मयूरभट्ट (7वीं शती) का 'सूर्यशतकम्' भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) का एक ऐसा विलक्षण ग्रंथ है जो साहित्य, चिकित्सा (रोग-मुक्ति की आस्था) और देव-स्तुति तीनों का समन्वय करता है।

उन्होंने सिद्ध किया कि 'काव्य' केवल राजाओं के मनोरंजन या प्रेम-कथाओं के लिए नहीं है; यह एक 'मंत्र' (Mantra) है। जब 21 अक्षरों वाला 'स्रग्धरा' छंद एक सच्चे साधक के मुख से निकलता है, तो वह प्रकृति (सूर्य) को भी अपनी रश्मियां बदलने पर विवश कर सकता है। आज भी भारत के अनेक सूर्य मंदिरों (जैसे कोणार्क और देव-सूर्य मंदिर) में रोग-मुक्ति की कामना से मयूरभट्ट के 'सूर्यशतक' का सस्वर पाठ किया जाता है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • सूर्यशतकम् - महाकवि मयूरभट्ट (संस्कृत मूल एवं हिंदी अनुवाद)।
  • प्रबंधचिंतामणि - मेरुतुंग (मयूरभट्ट और बाणभट्ट की किंवदंती के लिए)।
  • कर्पूरमंजरी - राजशेखर (हर्षवर्धन के राजकवियों का उल्लेख)।
  • संस्कृत साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय (गौड़ी रीति का विश्लेषण)।

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