महर्षि लोमहर्षण: पुराणों के संरक्षक और व्यास के प्रमुख शिष्य
(Biographical & Puranic History)
लोमहर्षणनामानं वन्दे सूतं जगद्गुरुम्॥" अर्थ: महर्षि व्यास के शिष्य, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता और जगत को कथाओं के माध्यम से ज्ञान देने वाले सूत जी (लोमहर्षण) की मैं वंदना करता हूँ।
भारतीय धर्मग्रंथों की विशाल श्रृंखला में महर्षि लोमहर्षण (Maharishi Lomaharshana) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें 'सूत जी' के नाम से भी जाना जाता है। जब भगवान वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया और 18 पुराणों की रचना की, तो उन्होंने पुराणों और इतिहास को सुरक्षित रखने तथा जन-जन तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व लोमहर्षण ऋषि को सौंपा। वे नैमिषारण्य में होने वाले ज्ञान-सत्रों के मुख्य सूत्रधार थे।
| गुरु | महर्षि वेदव्यास |
| पुत्र | उग्रश्रवा (सौती जी) |
| जाति / वर्ग | सूत (प्राचीन इतिहासकार और कथावाचक) |
| प्रमुख दायित्व | अठारह पुराणों का संरक्षण और वाचन |
| प्रमुख स्थान | नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश) |
| विशेषता | वाणी के प्रखर ओजस्वी वक्ता |
1. 'लोमहर्षण' नाम का रहस्य
'लोमहर्षण' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: **लोम** (शरीर के बाल) और **हर्षण** (खड़ा कर देने वाला)। पुराणों में उल्लेख है कि उनकी कथा कहने की शैली इतनी अद्भुत, ज्ञानवर्धक और ओजपूर्ण थी कि उसे सुनकर श्रोताओं के शरीर के रोएँ (लोम) हर्ष से खड़े हो जाते थे।
2. पुराणों का संकलन और विस्तार
वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों की रचना की थी, लेकिन उन्हें विस्तृत रूप देने और शिष्यों के माध्यम से संसार में फैलाने का श्रेय लोमहर्षण जी को जाता है। उन्होंने इन पुराणों को अपने छह प्रमुख शिष्यों में विभाजित किया था:
- सुमति
- अग्निवर्चस
- मित्रयु
- शांशपायन
- अकृतव्रण
- सावर्णि
इन्हीं शिष्यों के माध्यम से अलग-अलग पुराण संहिताएं (जैसे 'रोमहर्षण संहिता') आगे बढ़ीं। आज हम जो पुराण पढ़ते हैं, उनका अधिकांश भाग लोमहर्षण जी द्वारा नैमिषारण्य में ऋषियों को सुनाया गया संवाद ही है।
3. बलराम प्रसंग: नैमिषारण्य की एक घटना
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी नैमिषारण्य पधारे। उस समय लोमहर्षण जी 'व्यासपीठ' पर आसीन होकर हज़ारों ऋषियों को कथा सुना रहे थे। सभी ऋषियों ने उठकर बलराम जी का सम्मान किया, लेकिन लोमहर्षण जी अपनी गद्दी से नहीं उठे।
बलराम जी ने इसे अपना अपमान समझा (हालाँकि व्यासपीठ पर बैठने वाले के लिए नियम अलग होते हैं)। क्रोधवश बलराम जी ने एक 'कुश' के तिनके से उनका वध कर दिया। बाद में पश्चाताप होने पर बलराम जी ने उनके पुत्र उग्रश्रवा (सौती जी) को वही स्थान और ज्ञान प्रदान किया। यह घटना अहंकार और मर्यादा के सूक्ष्म संतुलन को दर्शाती है।
4. निष्कर्ष
महर्षि लोमहर्षण केवल एक कथावाचक नहीं थे, बल्कि वे भारतीय इतिहास के उस ज्ञान को सुरक्षित रखने वाले 'अभिलेखागार' (Archive) थे, जिसे हम आज पुराण कहते हैं। उन्होंने वेदों के कठिन रहस्यों को आम मनुष्य के लिए सुलभ बनाया। उनके द्वारा प्रज्ज्वलित कथा की मशाल को उनके पुत्र उग्रश्रवा ने और आगे बढ़ाया। आज भी जब कोई कथा प्रारंभ होती है, तो 'सूत जी उवाच' (सूत जी ने कहा) कहकर उन्हीं लोमहर्षण ऋषि की स्मृति को नमन किया जाता है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कन्ध)।
- विष्णु पुराण (तृतीय अंश)।
- वायु पुराण (लोमहर्षण संहिता)।
- महाभारत (अनुशासन पर्व)।
