महर्षि दयानंद सरस्वती: आर्य समाज के संस्थापक और आधुनिक भारत के निर्माता
एक विस्तृत ऐतिहासिक और दार्शनिक विश्लेषण: वह संन्यासी जिसने 19वीं सदी के अंधकारमय भारत में 'वेदों' का दीपक जलाया और 'स्वराज्य' का प्रथम मंत्र दिया। (The Luther of India)
- 1. प्रस्तावना: युगपुरुष का अवतरण
- 2. जीवन परिचय: मूलशंकर से दयानंद तक
- 3. शिवरात्रि की घटना और गृहत्याग
- 4. गुरु विरजानंद और जीवन का संकल्प
- 5. आर्य समाज की स्थापना और 10 नियम
- 6. दर्शन: वेदों की ओर लौटो (Back to Vedas)
- 7. 'सत्यार्थ प्रकाश': सत्य का सूर्य
- 8. समाज सुधार: जाति, नारी और शिक्षा
- 9. राष्ट्रवाद: स्वराज्य का प्रथम उद्घोषक
- 10. निष्कर्ष: अमर विरासत
19वीं शताब्दी का भारत अंधविश्वास, कुरीतियों और विदेशी दासता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। ऐसे समय में गुजरात की धरती से एक तेजस्वी संन्यासी का उदय हुआ, जिसका नाम था—स्वामी दयानंद सरस्वती। उन्हें रोमा रोलां ने "भारतीय पुनर्जागरण का सबसे निर्भीक योद्धा" कहा था।
दयानंद ने केवल पूजा-पाठ का विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने मानसिक गुलामी पर प्रहार किया। उन्होंने घोषित किया कि भारत का पतन वेदों को भूलने के कारण हुआ है। उन्होंने **'आर्य समाज'** की स्थापना करके एक ऐसी सामाजिक क्रांति की शुरुआत की जिसने शिक्षा (DAV), विधवा विवाह, और राष्ट्रीयता के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किया।
| मूल नाम | मूलशंकर तिवारी |
| जन्म | 12 फरवरी 1824 (टंकारा, गुजरात) |
| निर्वाण | 30 अक्टूबर 1883 (अजमेर, राजस्थान) - दीपावली के दिन |
| गुरु | स्वामी विरजानंद दंडी (मथुरा) |
| संस्थापक | आर्य समाज (10 अप्रैल 1875, मुंबई) |
| प्रमुख ग्रंथ | सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कार विधि |
| नारा | "वेदों की ओर लौटो" (Back to the Vedas) |
| विशेष योगदान | स्वराज्य शब्द का प्रथम प्रयोग, शुद्धि आंदोलन, स्त्री शिक्षा |
2. जीवन परिचय: मूलशंकर से दयानंद तक
महर्षि दयानंद का जन्म गुजरात के मोरबी रियासत के **टंकारा** गाँव में एक समृद्ध औदीच्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता **करषणजी लालजी तिवारी** एक शिवभक्त और कर-कलेक्टर थे। बालक का नाम **मूलशंकर** रखा गया क्योंकि उनका जन्म 'मूल नक्षत्र' में हुआ था।
बचपन से ही उनकी बुद्धि अत्यंत कुशाग्र थी। 14 वर्ष की आयु तक उन्होंने यजुर्वेद और व्याकरण का गहन अध्ययन कर लिया था। उनके पिता उन्हें एक कट्टर शिवभक्त बनाना चाहते थे, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था।
3. शिवरात्रि की घटना और गृहत्याग
दयानंद के जीवन में परिवर्तन की पहली चिंगारी 14 वर्ष की आयु में शिवरात्रि के दिन जली।
पिता के कहने पर मूलशंकर ने शिवरात्रि का व्रत रखा और रात भर मंदिर में जागते रहे। आधी रात को उन्होंने देखा कि एक चूहा शिवलिंग पर चढ़कर प्रसाद खा रहा है और मूर्ति के ऊपर दौड़ रहा है।
मूलशंकर का मन विचलित हो गया। उन्होंने सोचा: "जो ईश्वर सर्वशक्तिमान है, जो त्रिलोकीनाथ है, क्या वह एक छोटे से चूहे से अपनी रक्षा नहीं कर सकता?"
इस घटना ने उनके मन से मूर्ति पूजा की श्रद्धा को समाप्त कर दिया। इसके बाद, अपनी बहन और चाचा की मृत्यु ने उन्हें "मृत्यु क्या है?" और "अमरता क्या है?" खोजने के लिए विवश कर दिया। 1846 में, विवाह के दबाव से बचने के लिए उन्होंने घर छोड़ दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े।
4. गुरु विरजानंद और जीवन का संकल्प
वर्षों तक हिमालय और नर्मदा के तटों पर भटकने के बाद, 1860 में वे मथुरा पहुंचे। वहां उन्हें एक प्रज्ञाचक्षु (अंधे) संन्यासी **स्वामी विरजानंद दंडी** मिले। विरजानंद वेदों के प्रकांड विद्वान थे और आधुनिक (अनार्ष) ग्रंथों के विरोधी थे।
अनोखी गुरुदक्षिणा: दयानंद ने लगभग 3 वर्ष तक कठोर अनुशासन में रहकर उनसे व्याकरण और वेद पढ़े। शिक्षा पूर्ण होने पर जब दयानंद गुरुदक्षिणा देने गए (कहा जाता है वे लौंग लेकर गए थे क्योंकि गुरुजी को पसंद थी), तो विरजानंद ने कहा:
"मैं तुमसे लौंग नहीं चाहता। मुझे यह दक्षिणा चाहिए कि तुम जाओ और देश में फैले अज्ञान, अंधविश्वास और पाखंड को मिटाओ और सच्चे वैदिक धर्म की स्थापना करो।"
दयानंद ने वचन दिया और अपना शेष जीवन इसी कार्य में लगा दिया।
5. आर्य समाज की स्थापना और 10 नियम
10 अप्रैल 1875 को मुंबई में स्वामी दयानंद ने **'आर्य समाज'** की स्थापना की। 'आर्य' का अर्थ है 'श्रेष्ठ' या 'कुलीन'। यह कोई नया धर्म नहीं था, बल्कि वैदिक धर्म का शुद्ध रूप था।
प्रमुख सिद्धांत:
1. ईश्वर एक है, निराकार है और सर्वशक्तिमान है (मूर्ति पूजा का खंडन)।
2. वेद ही सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है।
3. सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
4. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।
6. दर्शन: वेदों की ओर लौटो (Back to Vedas)
दयानंद का दर्शन स्पष्ट और तर्कपूर्ण था।
- ईश्वर, जीव और प्रकृति (त्रैतवाद): वे अद्वैतवाद (शंकराचार्य) के विरोधी थे। उनका मानना था कि ईश्वर, जीव (आत्मा) और प्रकृति (Matter) तीनों अनादि और अनंत हैं। जीव कर्म करने में स्वतंत्र है, लेकिन फल भोगने में ईश्वर के अधीन है।
- मूर्ति पूजा विरोध: वेदों में मूर्ति पूजा नहीं है, इसलिए उन्होंने इसे अवैदिक और पतन का कारण माना।
- वर्ण व्यवस्था: उन्होंने 'जन्मना' जाति व्यवस्था (Caste by Birth) का घोर विरोध किया। उन्होंने वेदों के आधार पर कहा कि वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि) **'गुण, कर्म और स्वभाव'** से निर्धारित होने चाहिए, जन्म से नहीं।
7. 'सत्यार्थ प्रकाश': सत्य का सूर्य
1875 में उन्होंने अपना महानतम ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' (The Light of Truth) प्रकाशित किया। यह हिंदी भाषा में लिखा गया था ताकि आम जनता इसे समझ सके।
इस ग्रंथ में 14 समुल्लास (अध्याय) हैं।
- पहले 10 अध्यायों में वैदिक धर्म, ईश्वर, शिक्षा, राजधर्म आदि का वर्णन है।
- अंतिम 4 अध्यायों में उन्होंने अन्य मतों (पौराणिक हिंदू, जैन, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम) की तार्किक समीक्षा (खंडन) की है।
यह पुस्तक आर्य समाजियों के लिए एक मार्गदर्शक ग्रंथ है।
8. समाज सुधार: जाति, नारी और शिक्षा
स्वामी दयानंद केवल धार्मिक गुरु नहीं थे, वे एक क्रांतिकारी समाज सुधारक थे।
- नारी शिक्षा: उस समय जब महिलाओं को वेद पढ़ने की मनाही थी, दयानंद ने प्रमाण देकर सिद्ध किया कि गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियां वेद पढ़ती थीं। उन्होंने स्त्री शिक्षा का प्रबल समर्थन किया।
- शुद्धि आंदोलन: उन्होंने उन हिंदुओं को वापस धर्म में लेने का अभियान चलाया जिन्हें जबरन या प्रलोभन से दूसरे धर्मों में परिवर्तित कर दिया गया था। यह इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था।
- शिक्षा (DAV): उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों (लाला हंसराज आदि) ने उनकी स्मृति में D.A.V. (Dayanand Anglo-Vedic) स्कूल और कॉलेज खोले, जहाँ पश्चिमी विज्ञान और वैदिक ज्ञान साथ-साथ दिया जाता है।
9. राष्ट्रवाद: स्वराज्य का प्रथम उद्घोषक
बहुत कम लोग जानते हैं कि लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी से भी पहले, स्वामी दयानंद ने **'स्वराज्य'** (Self-rule) शब्द का प्रयोग किया था।
सरदार पटेल ने कहा था, "भारत की स्वतंत्रता की नींव स्वामी दयानंद ने ही रखी थी।" 1857 की क्रांति में भी उनकी गुप्त भूमिका मानी जाती है।
10. निष्कर्ष: अमर विरासत
30 अक्टूबर 1883 को अजमेर में, एक षड्यंत्र के तहत रसोइये द्वारा दिए गए विष के कारण इस महामानव का देहांत हो गया। लेकिन मरते समय भी उन्होंने उस रसोइये (जगन्नाथ) को माफ़ कर दिया और उसे भागने के लिए पैसे दिए। यह उनकी करुणा का प्रमाण था।
स्वामी दयानंद ने भारत को एक नई दृष्टि दी। उन्होंने हमें सिखाया कि हम अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व करें, लेकिन अंधविश्वासों को छोड़कर **विज्ञान और तर्क** को अपनाएं। आज दुनिया भर में फैले हजारों आर्य समाज मंदिर, डीएवी स्कूल और गुरुकुल उनकी अमर कीर्ति के जीवित स्मारक हैं।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- सत्यार्थ प्रकाश - महर्षि दयानंद सरस्वती।
- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका - महर्षि दयानंद।
- Light of Truth (English Translation) - Ganga Prasad Upadhyaya.
- Dayanand Saraswati: His Life and Ideas - J.T.F. Jordens.
