महर्षि याज्ञवल्क्य (maharshi yajnavalkya)

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
महर्षि याज्ञवल्क्य: जीवन, दर्शन और काल

महर्षि याज्ञवल्क्य: योगीश्वर और शुक्ल यजुर्वेद के रचयिता

(Biographical & Philosophical Study)

"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
अर्थ: वह (परब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत) पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। — (बृहदारण्यक उपनिषद, याज्ञवल्क्य)

वैदिक काल के ऋषियों में महर्षि याज्ञवल्क्य (Maharishi Yajnavalkya) का नाम सूर्य के समान दैदीप्यमान है। उन्हें 'योगीश्वर' कहा जाता है। वे न केवल एक महान कर्मकांडी थे, बल्कि आत्म-तत्व के सर्वोच्च ज्ञाता (ब्रह्मज्ञानी) भी थे। भारतीय दर्शन को 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, वह भी नहीं - ईश्वर इससे परे है) का सिद्धांत देने वाले महर्षि याज्ञवल्क्य ही थे।

📌 महर्षि याज्ञवल्क्य: एक दृष्टि में
पूरा नाम याज्ञवल्क्य वाजसनेय
पिता का नाम ब्रह्मरात (देवरात) / वाजयसक
माता का नाम सुनंदा (योगयात्रा के अनुसार)
गुरु महर्षि वैशम्पायन, उद्दालक आरुणि, सूर्य देव
पत्नियां मैत्रेयी (विदुषी) और कात्यायनी
प्रमुख रचनाएं शुक्ल यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद, याज्ञवल्क्य स्मृति
जयंती कार्तिक शुक्ल द्वादशी (याज्ञवल्क्य द्वादशी)
⏳ काल निर्धारण: शताब्दी एवं युग (मतान्तर)
पौराणिक/वैदिक मत
द्वापर युग का अंत महाभारत के अनुसार, वे राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित थे। वे महर्षि वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन के शिष्य थे, अतः उनका काल महाभारत काल (लगभग 3100 ईसा पूर्व) माना जाता है।
खगोलीय गणना
~3000 ईसा पूर्व (3000 BCE) याज्ञवल्क्य द्वारा रचित 'शतपथ ब्राह्मण' में कृत्तिका नक्षत्र के उदय होने का जो वर्णन है, खगोल विज्ञान के अनुसार वह स्थिति 2950-3000 BCE के आसपास बनती है।
आधुनिक इतिहासकार
8वीं - 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व पाश्चात्य और आधुनिक विद्वान इसे 'उपनिषद काल' मानते हैं, जब वैदिक कर्मकांडों के विरुद्ध दार्शनिक चिंतन (ज्ञान काण्ड) का उदय हो रहा था।
समकालीन राजा
राजा जनक (विदेह) ये सीता के पिता 'सीरध्वज जनक' से भिन्न, उनके वंशज 'बहुलाश्व जनक' या 'कृति जनक' माने जाते हैं।

1. जन्म, माता-पिता और कुल

याज्ञवल्क्य का जन्म कार्तिक शुक्ल द्वादशी को माना जाता है। उनके पिता का नाम ब्रह्मरात (जिन्हें देवरात या वाजयसक भी कहा जाता है) था और माता का नाम सुनंदा था। कुछ पुराणों में उन्हें भगवान ब्रह्मा का अवतार भी माना गया है जो वेदों के लुप्त ज्ञान को पुनः प्रकाशित करने के लिए आए थे।

बचपन से ही वे अत्यंत तेजस्वी और कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने महर्षि वैशम्पायन से यजुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की थी।

2. गुरु वैशम्पायन से विवाद और वेद का त्याग

यजुर्वेद के दो भाग होने (कृष्ण और शुक्ल) के पीछे गुरु-शिष्य के बीच हुआ एक ऐतिहासिक विवाद है।

एक बार गुरु वैशम्पायन से अनजाने में ब्रह्महत्या (अपने भांजे की हत्या) का पाप लग गया। उन्होंने अपने सभी शिष्यों को इस पाप के प्रायश्चित के लिए तपस्या करने को कहा। याज्ञवल्क्य ने अपने तपोबल के अभिमान में कहा—"गुरुदेव! इन अल्प-तेज वाले शिष्यों से क्या होगा? मैं अकेले ही आपके पाप का निवारण कर दूंगा।"

यह सुनकर वैशम्पायन क्रोधित हो गए। उन्होंने इसे गुरु-भाइयों का अपमान माना और याज्ञवल्क्य को आदेश दिया—"तुम्हें मेरा दिया हुआ ज्ञान अभी लौटाना होगा और आश्रम छोड़ना होगा।"

गुरु आज्ञा मानकर याज्ञवल्क्य ने योग बल से सीखे हुए यजुर्वेद का 'वमन' (उल्टी) कर दिया। उस ज्ञान को तीतर पक्षियों (Tittiri Birds) ने चुग लिया। यही ज्ञान बाद में 'कृष्ण यजुर्वेद' (तैत्तिरीय संहिता) कहलाया।

3. सूर्य उपासना और शुक्ल यजुर्वेद की प्राप्ति

वेद-विहीन होने के बाद याज्ञवल्क्य ने हार नहीं मानी। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब ऐसे गुरु से ज्ञान लेंगे जो किसी और के पास न हो। उन्होंने भगवान सूर्य की कठोर तपस्या की।

प्रसन्न होकर सूर्य देव ने 'वाजी' (घोड़े) का रूप धारण किया और याज्ञवल्क्य को यजुर्वेद का वह ज्ञान दिया जो अब तक किसी ऋषि को ज्ञात नहीं था।

  • चूँकि यह ज्ञान सूर्य से मिला और 'स्वच्छ/शुद्ध' था, इसलिए इसे 'शुक्ल यजुर्वेद' कहा गया।
  • सूर्य ने वाजी (घोड़े) रूप में ज्ञान दिया, इसलिए इसे 'वाजसनेयी संहिता' भी कहते हैं।
  • दिन के मध्य (दोपहर) में ज्ञान मिलने के कारण इसकी शाखा को 'माध्यन्दिन शाखा' कहा जाता है।

4. राजा जनक की सभा और गार्गी-संवाद

विदेहराज जनक (सीता के पिता) स्वयं एक ब्रह्मज्ञानी थे। एक बार उन्होंने ऋषियों की एक महासभा बुलाई और 1000 गायें (जिनके सींगों पर सोना मढ़ा था) रख दीं। उन्होंने कहा—"जो भी यहाँ 'ब्रह्मनिष्ठ' (सबसे बड़ा विद्वान) हो, वह इन गायों को ले जाए।"

सन्नाटा छा गया। तब याज्ञवल्क्य उठे और अपने शिष्य से बोले—"सौम्य! इन गायों को हमारे आश्रम ले चलो।" यह देखकर बाकी ऋषि क्रोधित हो गए और शास्त्रार्थ शुरू हुआ।

याज्ञवल्क्य ने एक-एक करके अश्वल, आर्तभाग, भुज्यु, उद्दालक आदि सभी विद्वानों को अपने तर्कों से परास्त कर दिया। अंत में विदुषी गार्गी वाचक्नवी ने उन्हें चुनौती दी। गार्गी ने अत्यंत सूक्ष्म प्रश्न पूछे, जिनका याज्ञवल्क्य ने सटीक उत्तर दिया। अंततः उन्होंने गार्गी को समझाया कि ब्रह्म तर्कों से परे है (अतिप्रश्न न करें), जिसे गार्गी ने स्वीकार किया और याज्ञवल्क्य को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया।

5. मैत्रेयी संवाद और दर्शन

जब याज्ञवल्क्य ने वानप्रस्थ (संन्यास) लेने का निर्णय किया, तो वे अपनी दो पत्नियों—मैत्रेयी (विदुषी) और कात्यायनी (गृहस्थ)—के पास संपत्ति का बंटवारा करने गए।

कात्यायनी ने धन स्वीकार कर लिया, लेकिन मैत्रेयी ने पूछा—"क्या इस धन से मैं अमर हो जाऊंगी?" याज्ञवल्क्य ने कहा—"नहीं।" तब मैत्रेयी ने कहा—"येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्?" (जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसका मैं क्या करूँगी? मुझे ब्रह्मज्ञान दीजिए।)

तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें वह उपदेश दिया जो भारतीय दर्शन का आधारस्तंभ है:

"न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति,
आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।"
अर्थ: हे मैत्रेयी! पत्नी को पति इसलिए प्रिय नहीं होता कि वह पति है, बल्कि अपनी ही आत्मा की तृप्ति के लिए पति प्रिय होता है। संसार में हम जिसे भी प्रेम करते हैं, वह अपनी ही आत्मा के सुख के लिए करते हैं।

उन्होंने सिखाया कि सब कुछ आत्मा (Brahman) ही है। आत्मा को ही देखना चाहिए, सुनना चाहिए और मनन करना चाहिए।

6. निष्कर्ष

महर्षि याज्ञवल्क्य का जीवन संघर्ष और सिद्धि का अद्भुत संगम है। गुरु के श्राप को वरदान में बदलना, सूर्य से नया वेद प्राप्त करना और गृहस्थ होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी बनना—यह केवल याज्ञवल्क्य ही कर सकते थे। उनकी 'याज्ञवल्क्य स्मृति' आज भी हिन्दू कानून (Hindu Law) का मुख्य आधार है।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • बृहदारण्यक उपनिषद (जनक सभा और मैत्रेयी संवाद)।
  • विष्णु पुराण (तृतीय अंश, अध्याय 5 - वेद विभाजन)।
  • महाभारत, शांति पर्व।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!