मौरिस विंटरनिट्ज़: भारतीय साहित्य के महा-इतिहासकार और 'निष्पक्ष' इंडोलॉजिस्ट
एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह ऑस्ट्रियाई विद्वान जिन्होंने भारत के हजारों वर्षों के साहित्य को एक 'वैज्ञानिक इतिहास' का रूप दिया (The Chronicler of Indian Wisdom)
- 1. प्रस्तावना: इंडोलॉजी के भीष्म पितामह
- 2. जीवन परिचय: वियना, ऑक्सफोर्ड और प्राग
- 3. 'भारतीय साहित्य का इतिहास': तीन खंडों का महासागर
- 4. रामायण और महाभारत का आलोचनात्मक अध्ययन
- 5. बौद्ध और जैन साहित्य: निष्पक्ष दृष्टि
- 6. भारत प्रवास: शांतिनिकेतन और टैगोर
- 7. कार्य पद्धति: अन्य विद्वानों से कैसे अलग थे?
- 8. निष्कर्ष: साहित्य के अमर संरक्षक
पश्चिमी विद्वानों ने वेदों का अनुवाद किया, शब्दकोश बनाए और व्याकरण लिखा। लेकिन इन सबको एक सूत्र में पिरोकर, वैदिक काल से लेकर मध्यकाल तक के भारतीय साहित्य की कहानी (History) लिखने का महान कार्य जिस विद्वान ने किया, वे थे—मौरिस विंटरनिट्ज़ (Moriz Winternitz)।
विंटरनिट्ज़ केवल एक 'पुस्तकालय' में बैठने वाले विद्वान नहीं थे। वे उन गिने-चुने पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट्स में से थे जिन्होंने भारत की यात्रा की, यहाँ रहे और रवींद्रनाथ टैगोर के साथ विश्व-भारती विश्वविद्यालय (शांतिनिकेतन) में अध्यापन किया। उनका दृष्टिकोण मैक्स मूलर की तरह 'रोमांटिक' नहीं था और न ही जेम्स मिल की तरह 'पूर्वाग्रह से ग्रस्त' था; वे अत्यंत संतुलित और न्यायप्रिय इतिहासकार थे।
| पूरा नाम | मौरिस विंटरनिट्ज़ (Moriz Winternitz) |
| काल | 23 दिसंबर 1863 – 9 जनवरी 1937 |
| राष्ट्रीयता | ऑस्ट्रियाई (जन्म: हॉर्न, ऑस्ट्रिया) |
| शिक्षा | वियना विश्वविद्यालय (बुहलर के शिष्य) |
| प्रमुख कृति | Geschichte der indischen Litteratur (History of Indian Literature - 3 Volumes) |
| विशेष योगदान | महाभारत का आलोचनात्मक संस्करण (Critical Edition), ऋग्वेद इंडेक्स |
| भारत संबंध | शांतिनिकेतन (Visva-Bharati) में विजिटिंग प्रोफेसर (1922-23) |
| गुरु/सहयोगी | जॉर्ज बुहलर, मैक्स मूलर |
2. जीवन परिचय: वियना, ऑक्सफोर्ड और प्राग
विंटरनिट्ज़ का जन्म 1863 में ऑस्ट्रिया के एक यहूदी परिवार में हुआ था। वियना विश्वविद्यालय में उन्होंने पुरातत्व और संस्कृत की शिक्षा ली। उनके गुरु प्रसिद्ध इंडोलॉजिस्ट जॉर्ज बुहलर थे।
मैक्स मूलर के सहायक: अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, वे इंग्लैंड गए और 1888 से 1892 तक ऑक्सफोर्ड में मैक्स मूलर के सहायक के रूप में कार्य किया। उन्होंने ऋग्वेद के दूसरे संस्करण के लिए 'इंडेक्स' (Index) तैयार करने में मदद की। यह उनके जीवन का महत्वपूर्ण प्रशिक्षण काल था।
प्राग विश्वविद्यालय: बाद में वे प्राग (चेकोस्लोवाकिया) चले गए, जहाँ वे 'जर्मन यूनिवर्सिटी' में इंडोलॉजी के प्रोफेसर बने। यहीं रहकर उन्होंने अपना अधिकांश लेखन कार्य किया।
3. 'भारतीय साहित्य का इतिहास': तीन खंडों का महासागर
विंटरनिट्ज़ की अमर कृति है—"History of Indian Literature" (मूल जर्मन: Geschichte der indischen Litteratur)। यह 1907 से 1922 के बीच तीन खंडों में प्रकाशित हुई।
- खंड 1: वैदिक साहित्य (संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद), महाकाव्य (रामायण, महाभारत) और पुराण।
- खंड 2: बौद्ध साहित्य और जैन साहित्य। (यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले के विद्वान इन पर कम ध्यान देते थे)।
- खंड 3: काव्य, नाटक, अलंकार शास्त्र, व्याकरण और वैज्ञानिक साहित्य।
महत्व: आज भी, 100 साल बाद, यदि किसी छात्र को यह जानना हो कि 'कठोपनिषद्' का काल क्या है या 'कालिदास' की रचनाओं का क्रम क्या है, तो सबसे प्रामाणिक संदर्भ विंटरनिट्ज़ की पुस्तक ही मानी जाती है।
4. रामायण और महाभारत का आलोचनात्मक अध्ययन
वेदों के बाद, विंटरनिट्ज़ ने महाकाव्यों (Epics) पर बहुत गहरा शोध किया।
महाभारत: उन्होंने तर्क दिया कि महाभारत एक बार में नहीं लिखा गया। यह सदियों तक विकसित हुआ। उन्होंने पूना के **भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट** (BORI) को महाभारत का **'समीक्षात्मक संस्करण'** (Critical Edition) तैयार करने का सुझाव दिया और इस परियोजना के शुरुआती मार्गदर्शकों में से एक रहे।
रामायण: उन्होंने सिद्ध किया कि रामायण का मूल भाग (अयोध्या से युद्ध कांड तक) प्राचीन है, जबकि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड बाद में जोड़े गए (प्रक्षिप्त) हैं। उनकी यह दृष्टि साहित्यिक आलोचना (Literary Criticism) का बेहतरीन नमूना है।
5. बौद्ध और जैन साहित्य: निष्पक्ष दृष्टि
मैक्स मूलर और अन्य विद्वानों का ध्यान मुख्य रूप से 'वैदिक' साहित्य पर था। विंटरनिट्ज़ ने संतुलन बनाया। उन्होंने अपने इतिहास का पूरा दूसरा खंड बौद्ध और जैन साहित्य को समर्पित किया।
- पाली कैनन: उन्होंने त्रिपिटक और जातक कथाओं का विस्तृत विश्लेषण किया।
- जैन आगम: उन्होंने जैन ग्रंथों को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बताया और उनकी दार्शनिक गहराई की प्रशंसा की।
इससे सिद्ध हुआ कि भारतीय साहित्य केवल 'ब्राह्मणवादी' नहीं है, बल्कि उसमें श्रमण परंपरा का भी बराबर का योगदान है।
6. भारत प्रवास: शांतिनिकेतन और टैगोर
विंटरनिट्ज़ उन दुर्लभ पश्चिमी विद्वानों में से थे जिन्होंने भारत को केवल किताबों में नहीं, बल्कि आँखों से देखा।
1922-1923 का दौरा: रवींद्रनाथ टैगोर के निमंत्रण पर वे भारत आए और विश्व-भारती विश्वविद्यालय (शांतिनिकेतन) में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। वहां वे छात्रों को संस्कृत पढ़ाते थे और शाम को टैगोर के साथ चर्चा करते थे।
विंटरनिट्ज़ ने लिखा है कि भारत आकर उन्हें लगा कि संस्कृत कोई 'मृत भाषा' (Dead Language) नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की जीवित आत्मा है। उन्होंने महात्मा गांधी से भी मुलाकात की और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रति सहानुभूति रखी।
7. कार्य पद्धति: अन्य विद्वानों से कैसे अलग थे?
विंटरनिट्ज़ की कार्यशैली विशिष्ट थी:
- काल निर्धारण (Chronology): वेदों के काल निर्धारण में वे बहुत सतर्क थे। जहाँ तिलक वेदों को 4000-6000 ई.पू. मानते थे और मैक्स मूलर 1200 ई.पू., विंटरनिट्ज़ ने मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहा कि वेदों का काल 2000-2500 ई.पू. के आसपास होना चाहिए, क्योंकि इतना विशाल साहित्य विकसित होने में समय लगता है।
- महिला विदुषियाँ: उन्होंने प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति पर भी शोध किया और बताया कि ऋग्वेद काल में महिलाएं विदुषी और ऋषिकाएं (जैसे गार्गी, मैत्रेयी) होती थीं।
8. निष्कर्ष: साहित्य के अमर संरक्षक
मौरिस विंटरनिट्ज़ भारतीय साहित्य के लिए वही हैं जो एक मानचित्रकार (Cartographer) दुनिया के लिए होता है। उन्होंने भारतीय ज्ञान के बिखरे हुए मोतियों को एक धागे में पिरोकर दुनिया को दिखाया कि भारत का साहित्यिक इतिहास यूनान (Greece) या रोम से कम समृद्ध नहीं है।
उनकी पुस्तक "History of Indian Literature" आज भी हर संस्कृत छात्र और शोधकर्ता की मेज पर पाई जाती है। यह न केवल तथ्यों का संग्रह है, बल्कि भारतीय मेधा (Intellect) के प्रति एक पश्चिमी विद्वान की श्रद्धांजलि भी है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- History of Indian Literature (Vol I, II, III) - Moriz Winternitz (English Translation by Mrs. S. Ketkar).
- Some Problems of Indian Literature - Moriz Winternitz.
- Winternitz and India - Festschrift Volume.
- Rabindranath Tagore and Moriz Winternitz: Correspondence.
