डॉ. फतेह सिंह: सिंधु घाटी सभ्यता और वेदों के अंतर्संबंध के अप्रतिम शोधकर्ता
आधुनिक इतिहासलेखन के वह निर्भीक और मूर्धन्य विद्वान, जिन्होंने 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (AIT) के ऐतिहासिक पाखंड को ध्वस्त कर, अपनी वैज्ञानिक लिपि-मीमांसा के माध्यम से यह प्रमाणित किया कि "हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के निर्माता कोई और नहीं, अपितु ऋग्वेद के निर्माता 'आर्य' ही थे।"
- 1. प्रस्तावना: औपनिवेशिक इतिहासलेखन का भ्रम और डॉ. फतेह सिंह
- 2. अकादमिक पृष्ठभूमि: राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान के निदेशक
- 3. 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (AIT) का वैज्ञानिक खण्डन
- 4. सिंधु लिपि का रहस्योद्घाटन: द्रविड़ नहीं, विशुद्ध 'वैदिक-संस्कृत'
- 5. मुहरों (Seals) पर वैदिक प्रतीकवाद: पशुपति, अश्वत्थ और एकशृंगी
- 6. औपनिषदिक दर्शन: 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया...' का चित्रांकन
- 7. सरस्वती नदी का पुरातात्त्विक साक्ष्य और वैदिक भूगोल
- 8. प्रमुख साहित्यिक अवदान एवं ऐतिहासिक ग्रन्थ
- 9. निष्कर्ष: भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन के पुरोधा
1. प्रस्तावना: औपनिवेशिक इतिहासलेखन का भ्रम और डॉ. फतेह सिंह
1920 के दशक में जब हड़प्पा (Harappa) और मोहनजोदड़ो (Mohenjo-Daro) की खुदाई हुई, तो ब्रिटिश पुरातत्वविदों (जैसे सर जॉन मार्शल और मोर्टिमर व्हीलर) ने इसे एक 'द्रविड़ सभ्यता' घोषित कर दिया। उन्होंने एक नैरेटिव (Narrative) गढ़ा कि 1500 ईसा पूर्व में 'आर्यों' ने मध्य-एशिया से आकर इस महान सभ्यता को नष्ट कर दिया।
इस 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (Aryan Invasion Theory) ने भारतीय इतिहास को दो विरोधी खेमों (आर्य बनाम द्रविड़) में बाँट दिया। इस ऐतिहासिक अन्याय का सबसे तार्किक, भाषाई और पुरातात्त्विक खण्डन करने वाले विद्वानों की प्रथम पंक्ति में डॉ. फतेह सिंह (Dr. Fateh Singh) का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। उन्होंने 'सिंधु लिपि' (Indus Script) का गहन अध्ययन कर यह स्थापित किया कि सिंधु घाटी की मुहरों पर उकेरे गए चित्र और शब्द पूर्णतः 'वैदिक और औपनिषदिक' हैं।
| पूरा नाम | डॉ. फतेह सिंह (Dr. Fateh Singh) |
| काल निर्धारण (Chronology) | 20वीं शताब्दी (जन्म: 1914 – मृत्यु: 2008 ई.) |
| अकादमिक उपाधि | डी.लिट्. (D.Litt.) - संस्कृत एवं इंडोलॉजी |
| प्रमुख धारित पद | पूर्व निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान (Rajasthan Oriental Research Institute, Jodhpur) |
| मुख्य शोध क्षेत्र | सिंधु लिपि (Indus Script), वैदिक दर्शन, पुरातत्व, और प्राचीन भारतीय इतिहास |
| महानतम कृति | सिंधु घाटी की लिपि (The Sindhu Valley Script) - जिसमें उन्होंने लिपि का वैदिक वाचन किया। |
| ऐतिहासिक प्रतिपादन | "सिंधु-सरस्वती सभ्यता और वैदिक सभ्यता एक ही काल और एक ही समाज (आर्यों) की रचना हैं।" |
2. अकादमिक पृष्ठभूमि: राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान के निदेशक
डॉ. फतेह सिंह एक अत्यंत मेधावी संस्कृतज्ञ और इतिहासकार थे। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्यकाल 'राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान' (जोधपुर) के निदेशक के रूप में बीता।
इस पद पर रहते हुए उन्होंने हज़ारों दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण किया। इसी दौरान जब उन्होंने सिंधु घाटी की मुहरों (Seals) और चिह्नों का अध्ययन किया, तो एक संस्कृत विद्वान होने के नाते उन्हें उन प्रतीकों में 'वेद' के दर्शन होने लगे। उन्होंने फादर हेरास (Father Heras) और अस्को पर्पोला (Asko Parpola) जैसे पाश्चात्य विद्वानों के 'द्रविड़ियन मॉडल' को चुनौती दी और शोध की एक नई स्वदेशी दिशा (Indigenous perspective) का सूत्रपात किया।
3. 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (AIT) का वैज्ञानिक खण्डन
औपनिवेशिक इतिहासकारों का तर्क था कि ऋग्वेद में वर्णित 'इन्द्र' ने 'पुरों' (किले) को नष्ट किया (पुरंदर), जो हड़प्पा के किले थे। अतः आर्य आक्रमणकारी थे।
डॉ. फतेह सिंह ने ऋग्वेद के निरुक्त-आधारित (Etymological) अर्थों को प्रस्तुत करते हुए बताया कि वेदों में 'पुर' का अर्थ ईंटों का किला नहीं, बल्कि मानव शरीर या अज्ञान के आवरण से है।
उन्होंने पुरातात्त्विक साक्ष्य दिए कि मोहनजोदड़ो में किसी युद्ध या नरसंहार के प्रमाण नहीं मिले हैं। वहाँ के कंकाल विभिन्न कालों के हैं, किसी एक 'आक्रमण' के नहीं। डॉ. सिंह ने सिद्ध किया कि सिंधु सभ्यता का पतन किसी 'आर्य आक्रमण' से नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, बाढ़, और सरस्वती नदी के सूखने (Tectonic shifts) के कारण हुआ था। आर्य बाहर से नहीं आए, वे वहीं के मूल निवासी थे।
4. सिंधु लिपि का रहस्योद्घाटन: द्रविड़ नहीं, विशुद्ध 'वैदिक-संस्कृत'
डॉ. फतेह सिंह का सबसे साहसिक कार्य 'सिंधु लिपि' (Harappan Script) को पढ़ने का प्रयास था। जहाँ अन्य विद्वान इसे 'Proto-Dravidian' मानकर फँस गए थे, डॉ. सिंह ने इसे 'ब्राह्मी' (Brahmi) लिपि की पूर्वजा और 'वैदिक संस्कृत' से सम्बंधित माना।
डॉ. सिंह ने सिंधु मुहरों पर उत्कीर्ण लगभग 400 चिह्नों का वैज्ञानिक वर्गीकरण किया। उन्होंने संस्कृत की वर्णमाला (Varnamala) के 'स्वर' (Vowels) और 'व्यंजनों' (Consonants) के आधार पर सिंधु चिह्नों की पहचान की।
उन्होंने दिखाया कि 'U' (यू) आकार का चिह्न अक्सर 'उ' स्वर या पात्र का द्योतक है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि यह लिपि केवल 'चित्रात्मक' (Pictographic) नहीं है, बल्कि यह एक 'अक्षरात्मक-ध्वन्यात्मक' (Syllabo-phonetic) लिपि है, जो बाद में विकसित होकर 'ब्राह्मी' में परिवर्तित हो गई।
5. मुहरों (Seals) पर वैदिक प्रतीकवाद: पशुपति, अश्वत्थ और एकशृंगी
डॉ. फतेह सिंह ने मुहरों पर बने चित्रों की व्याख्या ऋग्वेद और अथर्ववेद के मंत्रों के आधार पर की, जिसने 'सिंधु-वैदिक एकता' के सिद्धांत पर मुहर लगा दी:
- पशुपति शिव (Pashupati Seal): सर जॉन मार्शल ने तीन सींग वाले, योग-मुद्रा में बैठे और जानवरों से घिरे देवता को 'प्रोटो-शिवा' (आदि शिव) कहा था। डॉ. सिंह ने ऋग्वेद का प्रमाण देकर इसे 'वैदिक रुद्र' (Prajapati) या 'अग्नि' का प्रतीक बताया, जिसे वेदों में पशुओं का रक्षक (पशुपति) कहा गया है।
- अश्वत्थ (पीपल का पेड़): सिंधु मुहरों पर पीपल के पेड़ की प्रचुरता है। डॉ. सिंह ने बताया कि ऋग्वेद और भगवद्गीता (15.1) में 'अश्वत्थ' वृक्ष को ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है।
- एकशृंगी बैल (Unicorn Bull): यह सिंधु सभ्यता का सबसे प्रसिद्ध प्रतीक है। पाश्चात्य विद्वान इसे एक काल्पनिक जानवर मानते थे। डॉ. सिंह ने शतपथ ब्राह्मण और वेदों का हवाला दिया जहाँ 'एकशृंग' (एक सींग वाला) शब्द 'यज्ञ' (Sacrifice) या 'विष्णु/प्रजापति' के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह बैल शक्ति और पौरुष (धर्म) का वैदिक प्रतीक है।
6. औपनिषदिक दर्शन: 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया...' का चित्रांकन
डॉ. फतेह सिंह की सबसे विलक्षण खोज वह मुहर थी जिस पर एक पेड़ और उस पर बैठे दो पक्षी (या एक पक्षी और एक व्यक्ति) अंकित हैं।
उन्होंने सिद्ध किया कि यह मुहर सीधे-सीधे उपनिषद के इस महान दार्शनिक मंत्र का 'दृश्य-रूपांतरण' (Visual representation) है। इस मंत्र में एक पक्षी (जीवात्मा) फल खा रहा है और दूसरा (परमात्मा) केवल साक्षी भाव से उसे देख रहा है। हड़प्पा की मुहर पर यह चित्रांकन इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि हड़प्पावासी उच्च कोटि के वेदांती और दार्शनिक थे।
7. सरस्वती नदी का पुरातात्त्विक साक्ष्य और वैदिक भूगोल
वेदों में 'गंगा' और 'सिंधु' से भी अधिक 'सरस्वती' (नदीतमे, अम्बितमे) की स्तुति की गई है। जब आर्य आक्रमण सिद्धांत गढ़ा गया, तो पाश्चात्य विद्वानों ने सरस्वती को अफ़ग़ानिस्तान की एक छोटी नदी या केवल 'कल्पना' कह दिया।
डॉ. फतेह सिंह ने पुरातात्त्विक साक्ष्यों का समर्थन करते हुए बताया कि सिंधु सभ्यता के 80% से अधिक नगर (जैसे कालीबंगा, राखीगढ़ी, बनावली) सिंधु नदी पर नहीं, बल्कि सूख चुकी सरस्वती नदी (घग्गर-हकरा बेसिन) के किनारे बसे थे। अतः यह 'सिंधु सभ्यता' कम और 'सिंधु-सरस्वती सभ्यता' अधिक है। यही वह वैदिक भूमि (ब्रह्मावर्त) है जहाँ आर्यों ने ऋग्वेद के मंत्रों की रचना की थी।
8. प्रमुख साहित्यिक अवदान एवं ऐतिहासिक ग्रन्थ
डॉ. फतेह सिंह ने अपने जीवनकाल में इतिहास, पुरातत्व और वेदों पर जो साहित्य रचा, वह आज भी शोधकर्ताओं के लिए एक 'खदान' (Mine) के समान है:
- सिंधु घाटी की लिपि (The Sindhu Valley Script) - लिपि वाचन और वैदिक अंतर्संबंध का मास्टरपीस।
- वैदिक दर्शन (Vedic Philosophy) - वेदों के आधिभौतिक और आध्यात्मिक रहस्यों का विवेचन।
- प्राचीन भारतीय इतिहास की समस्याएँ - आर्यन आक्रमण सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाने वाला ग्रन्थ।
- विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में सिंधु लिपि पर शोध-पत्र।
9. निष्कर्ष: भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन के पुरोधा
डॉ. फतेह सिंह केवल एक इतिहासकार नहीं थे; वे भारतीय स्वाभिमान के रक्षक थे। एक ऐसे समय में जब संपूर्ण विश्व ब्रिटिश इतिहासकारों के 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (AIT) को आँख मूंदकर स्वीकार कर रहा था, डॉ. सिंह ने अकेले दम पर 'सिंधु-वैदिक सातत्य' (Vedic-Harappan Continuity) की अवधारणा को स्थापित किया।
आज जब आधुनिक डीएनए शोध (Genetics/R1a1a haplogroup) और सैटेलाइट इमेजरी (Saraswati river mapping) सिद्ध कर रहे हैं कि भारतीय सभ्यता में कोई 'बाहरी आक्रमण' या विखंडन नहीं हुआ, तो हमें याद आता है कि दशकों पूर्व डॉ. फतेह सिंह ने अपनी 'लिपि मीमांसा' के माध्यम से यही उद्घोष किया था। उनका शोध चीख-चीख कर कहता है— "वेद ही हड़प्पा की आत्मा हैं।" आधुनिक इतिहासलेखन उनके इस स्वदेशी (Indigenous) और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सदैव ऋणी रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- सिंधु घाटी की लिपि - डॉ. फतेह सिंह (राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान)।
- The Myth of the Aryan Invasion of India - David Frawley (Supporting theories).
- The Lost River: On the Trail of the Sarasvati - Michel Danino.
- Vedic Harappans - Bhagwan Singh.
- सिंधु मुहरों और औपनिषदिक प्रतीकों का तुलनात्मक अध्ययन (Archeological Survey of India Records).
