Nirakar Ki Sadhana Itni Kathin Kyon Hai? (Sakar vs Nirakar)

Sooraj Krishna Shastri
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निराकार की साधना इतनी कठिन क्यों है?

निराकार शब्द भी समझ में नहीं आता। निराकार शब्द भी हमारे मन में आकार का ही बोध देता है। 'असीम' भी हम कहते हैं, तो ऐसा लगता है, उसकी भी सीमा होगी—बहुत दूर, बहुत दूर—लेकिन कहीं उसकी भी सीमा होगी। मन असीम का खयाल भी नहीं पकड़ सकता। मन का द्वार इतना छोटा है, सीमित है कि उससे अनंत आकाश नहीं पकड़ा जा सकता। इसलिए निराकार की साधना कठिन है। क्योंकि निराकार की साधना का अर्थ हुआ, मन को अभी इसी क्षण छोड़ देना पड़ेगा, तो ही निराकार की तरफ गति होगी।

मन और सीमा का बंधन

मन से तो जो भी दिखाई पड़ेगा, वह आकार होगा। और मन से जहां तक पहुंच होगी, वह सीमा और गुण की होगी। मन के तराजू पर निराकार को तौलने का कोई उपाय नहीं है। जो तौला जा सकता है, वह साकार है। और हम मन से भरे हैं। हम मन ही हैं। मन के अतिरिक्त हमारे भीतर कुछ है, इसका हमें कोई पता नहीं। कहते हैं आत्मा की बात, सुनते हैं; लेकिन आपको उसका कुछ पता नहीं है। पता तो मन का है।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दस में से केवल एक हिस्सा मन का हमें थोड़ा-थोड़ा पता है। नौ हिस्सा मन का भी हमें पता नहीं है। मन भी अभी ज्ञात नहीं है। अभी सीमित को भी हम नहीं जान पाए हैं, तो असीम को जानने में कठिनाई होगी।

अगर कोई आपसे कहे कि यह जो आकाश है, अनंत है, तो भी मन में ऐसा ही खयाल बना रहता है कि कहीं न कहीं जाकर समाप्त जरूर होता होगा। समाप्त होता ही नहीं है, यह बात मन को उलझन में डाल देती है; मन घबड़ा जाता है। मन की व्यवस्था सीमा को समझने के लिए है। इसलिए निराकार को पकड़ना कठिन हो जाता है।

सम्राट के द्वंद्व की कथा: निराकार का खालीपन

एक सम्राट ने अपनी प्रेयसी के लिए अपने एक प्रतिद्वंद्वी को द्वंद्व (Duel) में उतरने की स्वीकृति दे दी। कल सुबह छ: बजे गांव के बाहर एकांत में वे अपनी-अपनी पिस्तौल लेकर पहुंचेंगे और दो में से एक ही बचकर लौटेगा। सम्राट ठीक समय से पूर्व पहुंच गया, लेकिन दूसरा प्रतिद्वंद्वी नहीं आया। छ: दस, छ: पंद्रह—बेचैनी से प्रतीक्षा रही। तब एक घुड़सवार दौड़ता हुआ आया और प्रतिद्वंद्वी का एक टेलीग्राम (संदेश) दिया।

"अनिवार्य कारणों से देरी हो गई। न पहुंचूंगा, तो आप निराश होंगे। इसलिए मेरी प्रतीक्षा मत करें, आप गोली चलाएं।" (Please don't wait for me, shoot.)

लेकिन गोली किस पर चलाएं? जो उस राजा की अवस्था हो गई होगी, वही निराकार के साधक की होती है। किस पर? किसकी पूजा? किसकी अर्चना? किसके चरणों में सिर झुकाएं? किसको पुकारें? किस पर ध्यान करें? कोई भी नहीं है वहां! वह राजा भी बिना गोली चलाए वापस लौट आया होगा!

निराकार का अर्थ है: मन का शून्यता में जाना

निराकार का अर्थ है, वहां कोई भी नहीं है, जिससे आप संबंधित हो सकें। और मनुष्य का मन संबंध चाहता है। निराकार का अर्थ हुआ कि आप अकेले हैं; वहां कोई भी नहीं है आपके सामने। इसलिए अति कठिन है।

यह मन, दूसरा हो, तो संबंधित हो जाता है, और गतिमान हो पाता है। दूसरा न हो, तो अवरुद्ध हो जाता है। कोई गति नहीं रह जाती है। निराकार की कठिनाई निराकार की नहीं, आपके मन की कठिनाई है। अगर आप मन छोड़ने को राजी हों, तो निराकार फिर कठिन नहीं है। फिर तो साकार कठिन है। क्योंकि मन के बिना आकार नहीं बनता।

तो साकार एक क्रमिक विकास (Gradual Process) है। यह धीरे-धीरे आपके मन को गलाएगा। और एक ऐसी घड़ी आएगी कि मन पूरा गल जाएगा, और आप मन से छुटकारा पा जाएंगे। जिस दिन मन छूटेगा, उसी दिन साकार भी छूट जाएगा। और निराकार एक छलांग है (Sudden)। अगर आपकी तैयारी हो आकस्मिक छलांग लगाने की, कि रख दिया मन और कूद गए, तो निराकार कठिन नहीं है।

साकार कि निराकार: सही मार्ग क्या है?

पर मन को रख सकेंगे? कपड़े जैसा नहीं है कि उतारा और रख दिया। चमड़ी से भी ज्यादा तकलीफ होगी। क्योंकि मन हड्डी-हड्डी, एक-एक कोष्ठ से जुड़ा है। मन को उतारकर रखना अपनी ही हत्या है। इसलिए खोजियों ने कहा है कि जब तक 'अमनी' (No-Mind), अमन की स्थिति न हो जाए, तब तक निराकार की बात का कोई अर्थ ही समझ में नहीं आएगा।

बहुत-से लोग हैं, जिन्होंने साकार को छोड़ दिया है निराकार के पक्ष में, और निराकार में उतरने की उनकी कोई सुविधा नहीं बनती। जब भी कुछ छोड़ें, तो सोच लें कि जिस विपरीत के लिए छोड़ रहे हैं, उसमें उतर सकेंगे?

एक बात सदा ध्यान में रखें कि जो भी आप मानना चाहते हों, उससे आपको क्या होगा? क्या आप बदल सकेंगे? क्या आपकी नई जिंदगी शुरू होगी? आपको कोई नई ज्योति मिलेगी? इसका खयाल करें। अगर निराकार से मिलती हो, तो निराकार की तरफ चल पड़ें। अगर साकार से मिलती हो, तो साकार की तरफ चल पड़ें।

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