Satyam Shivam Sundaram: Bhagwan Shiv Ki Mahima Aur Nirakar Swaroop

Sooraj Krishna Shastri
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भगवान शिव: निराकार से साकार तक का दिव्य दर्शन

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं ।
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ।
स्फुर-न्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा ।
लसद्भाल-बालेन्दु कण्ठे भुजंगा ।।
अर्थ: जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर गंगा जी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीय का चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं।

सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है

पूरी प्रकृति शिव का ही रूप है – भगवान शिव से बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं! परम सत्य हैं वह! देवों के देव हैं महादेव और इनको प्रसन्न करने के लिए आवश्यक है निष्काम भक्ति!

हमारे शास्त्रों में त्रिदेवों का वर्णन आता है! – ब्रह्मा, विष्णु और महेश अर्थात् शिव (कर्ता, धर्ता और संहारकर्ता)। सभी की अपनी महिमा है! परंतु भगवान शिव जो पूरी सृष्टि को सम्भाले हुए हैं, अद्वितीय हैं। शिवजी के इस प्रधान पंच स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य और शक्ति में बाकी सभी स्वरूपों और संप्रदायों में अलग-अलग स्वरूप वर्णन और उपासना बताई गई है। शिवजी के महेश (शंकर, महादेव) स्वरूप की ही शिवस्वरूप पूजा प्रचलित हुई, इसलिए कैलास पर्वत पर बिराजमान महादेव ही शिवस्वरूप पूजे जाते हैं। विश्व के किसी भी देवी-देवताओं की पूजा शिवलिंग पर कर सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है, क्योंकि वे उन स्वरूप के ही अंश हैं।

भगवान शंकर का सौम्य स्वरूप अतिसुन्दर मोहिनी स्वरूप है। तंत्र मार्ग में श्मशानवासी, अंग पर भभूत लगाए कापाल स्वरूप वर्णित किये गए हैं, तो अघोरमार्ग में उनका प्रचंड प्रलयंकारी महाकाल स्वरूप वर्णन है। यौगिक उपासना में एक योगी स्वरूप तो कहीं गणनायक स्वरूप का वर्णन है। पर साकार उपासना से साक्षात्कार करने वाले ऋषियों और भक्तजनों ने उनके सौम्य सुंदर स्वरूप का वर्णन किया है।

भगवान शिव की आराधना और महामृत्युंजय मंत्र

कहा जाता है कि हिमालय के शिखर पर अपनी साधना में लीन विराजमान हैं शिव, जिनकी जटा से गंगा की धारा निकल रही है और जो संपूर्ण जगत को अपनी तीसरी आँख में संजोए हुए हैं!

भगवान शिव की आराधना और तप से जो फल प्राप्त होता है, उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। इसी लिये जब मृत्यु शैय्या पर कोई आ जाये अथवा भयंकर रोग से ग्रस्त हो जाये, तब भगवान का महामृत्युंजय मंत्र चमत्कारी सिद्ध होता है:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
इसे मृत संजीवनी मंत्र भी कहते हैं! जब इसका गायत्री मंत्र के साथ संपुट बनाकर जप किया जाये, तो यह ब्रह्मांड से आती हुई तमाम नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट कर देता है और स्वास्थ्य लाभ व सफलता मिलती है।

शिवरात्रि का पर्व भगवान के लिए विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन सभी श्रद्धालु भक्त पूरी तरह विह्वल होकर व्रत और जप करते हैं। शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र तथा अनेक सामग्री अर्पित करते हैं और रात्रि तक भजन-पूजन के साथ आनंद मनाते हैं।

भगवान शिव ओघड़ दानी हैं

जो इनके दर पर झोली फैलाकर जाता है, उसकी मनोकामना वे अवश्य पूर्ण करते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के रूप में हमारे देश के विभिन्न स्थानों पर श्रद्धा भाव से भक्तों का समूह पहुँचता है।

कहते हैं भगवान शिव अति शीघ्र प्रसन्न होते हैं! दूध, बेलपत्र, धतूरा यह सब भगवान को प्रिय है। पर यदि आप कुछ भी सामग्री लेकर ना जाओ, मात्र अपने अश्रुओं का जल ही क्षमा प्रार्थना करते हुए भगवान को अर्पित कर दो, तो भोले भंडारी उतने से ही रीझ जाते हैं और झोलियाँ भर देते हैं!

पंचाक्षरी मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जाप परम कल्याणकारी है, जो दैहिक, दैविक और भौतिक सभी तापों को नष्ट करके जीवन को आनन्दमय बनाता है।

॥ श्री शंकराचार्यजी कृत शिव स्तवः ॥
1

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं
महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम॥

2

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं
विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं
सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्॥

3

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं
गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं
भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्॥

4

शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले
महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप:
प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप॥

5

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं
निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥

6

न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर्न
चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न ग्रीष्मो न शीतं न देशो न वेषो
न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे॥

7

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं
प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्॥

8

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते
नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य॥

9

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ
महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:॥

10

शंभो महेश करुणामय शूलपाणे
गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-
स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि॥

11

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन॥

भगवान शंकर स्वयं निराकार शिव की पूजा शिवलिंग के रुप में करते हैं। शंकर जी एक साकार रूप हैं, वहीं, भगवान शिव एक ज्योति (निराकार) स्वरूप हैं। हिंदू धर्म में उन्हें निराकार और निर्गुण भगवान माना जाता है, जो उन्हें सभी सत्व, रजस् और तमस् गुणों से परे, सर्वव्यापी, अद्वैत और अनंत बनाता है।

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