डॉ. शशिप्रभा कुमार: वैदिक दर्शन और वैशेषिक की शोधपूर्ण व्याख्याकार
आधुनिक भारतीय ज्ञान-परम्परा की वह शीर्षस्थ विदुषी, जिन्होंने 'वैशेषिक दर्शन' (Vaisheshika Philosophy) को न्याय-दर्शन की छाया से मुक्त कर उसके स्वतंत्र वैज्ञानिक एवं नैतिक स्वरूप को वैश्विक पटल पर पुनर्स्थापित किया।
- 1. प्रस्तावना: प्राच्य-विद्या और समकालीन दार्शनिक विमर्श
- 2. अकादमिक पृष्ठभूमि: जे.एन.यू. (JNU) से सांची विश्वविद्यालय तक
- 3. वैशेषिक दर्शन पर युगांतरकारी शोध: भौतिकी और अध्यात्म का संगम
- 4. पदार्थ-मीमांसा और महर्षि कणाद का परमाणुवाद (Atomic Theory)
- 5. वैशेषिक में 'धर्म' की वैज्ञानिक एवं लौकिक अवधारणा
- 6. वैदिक दर्शन: संहिताओं और उपनिषदों का समन्वयात्मक भाष्य
- 7. वैदिक वाङ्मय में नारी-विमर्श: पितृसत्तात्मक भ्रांतियों का खण्डन
- 8. संस्थान-निर्माण: सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय की कुलपति
- 9. प्रमुख साहित्यिक अवदान एवं शोध-ग्रंथ
- 10. निष्कर्ष: इक्कीसवीं सदी में डॉ. शशिप्रभा कुमार की बौद्धिक विरासत
1. प्रस्तावना: प्राच्य-विद्या और समकालीन दार्शनिक विमर्श
भारतीय षड्दर्शन (Six Systems of Indian Philosophy) की परम्परा में 'वैशेषिक दर्शन' (Vaisheshika Darshana) को अक्सर एक भौतिकवादी या 'न्याय दर्शन' (Nyaya) का पिछलग्गू शास्त्र मान लिया जाता था। पश्चिमी विद्वानों ने इसे केवल एक प्राचीन 'परमाणुवाद' (Atomism) का सिद्धांत कहकर इसकी दार्शनिक और नैतिक गहराइयों की उपेक्षा की।
इस ऐतिहासिक उपेक्षा को समाप्त करने और वैशेषिक की 'स्वतंत्र सत्ता' को आधुनिक अकादमिक मंचों पर स्थापित करने का भगीरथ कार्य प्रो. (डॉ.) शशिप्रभा कुमार ने किया। एक प्रकांड संस्कृतज्ञा, दार्शनिक और कुशल प्रशासक के रूप में, उन्होंने महर्षि कणाद के सूत्रों और प्रशस्तपाद भाष्य की ऐसी सूक्ष्म मीमांसा प्रस्तुत की, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि वैशेषिक दर्शन केवल भौतिक विज्ञान नहीं, अपितु जीवन के लौकिक और पारलौकिक (Spiritual) अभ्युदय का एक पूर्ण शास्त्र है।
| पूरा नाम | प्रोफेसर (डॉ.) शशिप्रभा कुमार (Prof. Shashiprabha Kumar) |
| काल निर्धारण | समकालीन (जन्म: 1951) - वर्तमान काल की शीर्षस्थ प्राच्य-विदुषी |
| प्रमुख धारित पद | संस्थापक कुलपति, सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय (म.प्र.) |
| अध्यापन एवं शोध संस्थान | प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, संस्कृत अध्ययन केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली |
| मुख्य शोध क्षेत्र | वैशेषिक दर्शन, वैदिक साहित्य, उपनिषद मीमांसा, भारतीय ज्ञान परम्परा (IKS) |
| प्रमुख कृतियाँ | Facets of Indian Philosophic Thought, वैशेषिक दर्शन में पदार्थ-निरूपण, वैदिक वाङ्मय में नारी |
| राष्ट्रीय सम्मान | राष्ट्रपति सम्मान (President's Certificate of Honour), शंकर पुरस्कार |
2. अकादमिक पृष्ठभूमि: जे.एन.यू. (JNU) से सांची विश्वविद्यालय तक
डॉ. शशिप्रभा कुमार की अकादमिक यात्रा भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति गहरी निष्ठा और कठोर शोध का जीवंत प्रमाण है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से उच्च शिक्षा और पीएच.डी. प्राप्त की। उनकी मेधा को देखते हुए उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रतिष्ठित 'संस्कृत अध्ययन केंद्र' (Special Centre for Sanskrit Studies) में प्रोफेसर नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने न केवल अध्यापन किया, बल्कि इस केंद्र को वैश्विक शोध के एक प्रमुख हब (Hub) के रूप में विकसित किया।
उनकी प्रशासनिक क्षमता और दार्शनिक विज़न के कारण उन्हें मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नव-स्थापित 'सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय' (Sanchi University of Buddhist-Indic Studies) का प्रथम और संस्थापक कुलपति (Founder Vice-Chancellor) नियुक्त किया गया। यहाँ उन्होंने बौद्ध दर्शन (Buddhist Studies) और वैदिक दर्शन (Vedic Studies) के बीच समन्वयवादी शोध के नए आयाम स्थापित किए।
3. वैशेषिक दर्शन पर युगांतरकारी शोध: भौतिकी और अध्यात्म का संगम
भारतीय दर्शन में वैशेषिक का स्थान अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि यह 'विशेष' (Particularity) नामक पदार्थ को मानता है। डॉ. शशिप्रभा कुमार ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तकों और शोध-पत्रों (जैसे *Facets of Indian Philosophic Thought*) के माध्यम से वैशेषिक दर्शन पर जमी हुई धूल को साफ़ किया।
मध्यकाल में 'न्याय' (तर्कशास्त्र) और 'वैशेषिक' (पदार्थशास्त्र) को मिलाकर एक 'न्याय-वैशेषिक' परम्परा बना दी गई थी, जिससे वैशेषिक का मूल स्वरूप दब गया था।
डॉ. कुमार ने महर्षि कणाद के वैशेषिक सूत्रों का स्वतंत्र विश्लेषण कर यह स्थापित किया कि वैशेषिक मुख्य रूप से 'सत्ता-मीमांसा' (Ontology) का शास्त्र है, जबकि न्याय 'ज्ञान-मीमांसा' (Epistemology) का। उन्होंने वैशेषिक को 'स्वतंत्र दार्शनिक प्रणाली' के रूप में पुनर्जीवित किया।
4. पदार्थ-मीमांसा और महर्षि कणाद का परमाणुवाद (Atomic Theory)
वैशेषिक दर्शन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को छह या सात 'पदार्थों' (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव) में विभाजित करता है। डॉ. कुमार ने इन पदार्थों की आधुनिक वैज्ञानिक और तार्किक व्याख्या प्रस्तुत की।
- परमाणुवाद (Atomism): उन्होंने स्पष्ट किया कि महर्षि कणाद का परमाणुवाद (Paramanu-vada) ग्रीक दार्शनिक डेमोक्रिटस (Democritus) के परमाणुवाद से अत्यंत भिन्न और परिष्कृत है। वैशेषिक का परमाणु केवल जड़ नहीं है, बल्कि उसके पीछे 'ईश्वर की इच्छा' और 'अदृष्ट' (जीवात्मा के कर्म) कार्य करते हैं।
- विशेष (Vishesha): उन्होंने 'विशेष' पदार्थ की व्याख्या करते हुए बताया कि कैसे सृष्टि के अंतिम कणों (परमाणुओं) में भी एक अनूठी पृथकता होती है। यही सिद्धांत इस दर्शन को 'वैशेषिक' नाम देता है।
5. वैशेषिक में 'धर्म' की वैज्ञानिक एवं लौकिक अवधारणा
वैशेषिक दर्शन का आरम्भ ही 'धर्म' की जिज्ञासा से होता है— "अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः"। डॉ. शशिप्रभा कुमार ने कणाद के द्वितीय सूत्र की जो व्याख्या की, वह उनके शोध का एक महानतम बिंदु है:
डॉ. कुमार ने इस सूत्र के आधार पर सिद्ध किया कि भारतीय दर्शन जीवन से पलायन नहीं सिखाता। 'अभ्युदय' का अर्थ है सांसारिक उन्नति, भौतिक सुख और वैज्ञानिक प्रगति (Material Prosperity)। 'निःश्रेयस' का अर्थ है मोक्ष या आध्यात्मिक शांति (Spiritual Liberation)।
उन्होंने प्रतिपादित किया कि महर्षि कणाद का 'धर्म' वह है जो मनुष्य को भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक शांति दोनों प्रदान करे। यह सिद्धांत आधुनिक युग के 'सतत विकास' (Sustainable Development) और मानव-कल्याण का सबसे सटीक दार्शनिक मॉडल है।
6. वैदिक दर्शन: संहिताओं और उपनिषदों का समन्वयात्मक भाष्य
डॉ. शशिप्रभा कुमार केवल शास्त्रीय दर्शन (Classical Philosophy) तक सीमित नहीं रहीं; उनका मूल आधार 'वैदिक संहिताएँ' और 'उपनिषद' हैं।
उन्होंने ईशावास्योपनिषद (Isa Upanishad) और कठोपनिषद (Katha Upanishad) के दार्शनिक पक्षों का अत्यंत गहरा विश्लेषण किया है। उनका मानना है कि वेदों में जो सत्य 'बीज' (Seed) रूप में है, वही उपनिषदों में 'वृक्ष' और षड्दर्शनों में 'फल' के रूप में प्रकट हुआ है। उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों के उस मत का दृढ़ता से खण्डन किया जो यह मानते थे कि "वेद कर्मकांड हैं और उपनिषद उनके विरुद्ध एक दार्शनिक विद्रोह (Rebellion) हैं।" डॉ. कुमार ने ऐतिहासिक और पाठ्य-प्रमाणों से सिद्ध किया कि श्रुति (संहिता) और वेदांत (उपनिषद) में एक अखंड दार्शनिक निरंतरता (Continuity) है।
7. वैदिक वाङ्मय में नारी-विमर्श: पितृसत्तात्मक भ्रांतियों का खण्डन
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में डॉ. शशिप्रभा कुमार का सबसे सशक्त और प्रासंगिक कार्य "वैदिक साहित्य में नारी" की स्थिति पर किया गया शोध है। आधुनिक विमर्शों (Feminism) में अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि प्राचीन भारतीय समाज पितृसत्तात्मक (Patriarchal) और स्त्री-विरोधी था।
डॉ. कुमार ने ऋग्वेद और अथर्ववेद के मूल मंत्रों का उद्धरण देकर इस नैरेटिव (Narrative) को तोड़ा।
- ऋषिकाएं और मंत्र-दृष्ट्री: उन्होंने अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, और वाक् आम्भृणी जैसी महिला ऋषियों के सूक्तों का अनुवाद और विश्लेषण कर सिद्ध किया कि वैदिक काल में स्त्रियों को न केवल वेदाध्ययन का अधिकार था, बल्कि वे स्वयं 'ज्ञान का सृजन' (Knowledge Creation) कर रही थीं।
- समान अधिकार: उन्होंने दिखाया कि वैदिक विवाह सूक्तों में पति-पत्नी को एक रथ के दो समान पहिये माना गया है, जहाँ पत्नी को घर की 'साम्राज्ञी' (Empress) का दर्ज़ा प्राप्त था। उनका शोध 'आधुनिक फेमिनिज़्म' को एक स्वदेशी, वैदिक और सम्मानजनक विकल्प प्रदान करता है।
8. संस्थान-निर्माण: सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय की कुलपति
एक शिक्षाविद् के रूप में डॉ. शशिप्रभा कुमार का कार्यकाल सांची विश्वविद्यालय (SUBIS) में अत्यंत परिवर्तनकारी रहा। उनके विज़न के अंतर्गत:
1. विश्वविद्यालय में बौद्ध दर्शन, वैदिक अध्ययन, भारतीय चित्रकला, और योग विज्ञान के उच्च-स्तरीय पाठ्यक्रम (M.A., M.Phil., Ph.D.) आरम्भ किए गए।
2. उन्होंने 'भारत-विद्या' (Indology) को पाश्चात्य 'ऑब्जेक्टिव' लेंस से निकालकर 'भारतीय इनसाइडर' (Insider's perspective) के दृष्टिकोण से पढ़ाने पर ज़ोर दिया।
3. उनके नेतृत्व में अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों (जैसे 'तत्त्वबोधिनी' व्याख्यानमाला) का आयोजन हुआ, जिसने सांची को बौद्ध और सनातन दर्शन के विमर्श का वैश्विक केंद्र बना दिया।
9. प्रमुख साहित्यिक अवदान एवं शोध-ग्रंथ
डॉ. कुमार ने 30 से अधिक शोध-ग्रंथों की रचना और सम्पादन किया है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
- वैशेषिक दर्शन में पदार्थ-निरूपण (हिन्दी) – वैशेषिक की सत्त्वामीमांसा का सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ।
- Facets of Indian Philosophic Thought (अंग्रेज़ी) – भारतीय दर्शन के विविध आयाम।
- Self, Society and Value: Reflections on Indian Philosophical Thought – नैतिकता और मूल्यों पर शोध।
- Sanskrit Studies (Vol. 3) – जे.एन.यू. के संस्कृत केंद्र द्वारा प्रकाशित जर्नल्स का सम्पादन।
10. निष्कर्ष: इक्कीसवीं सदी में डॉ. शशिप्रभा कुमार की बौद्धिक विरासत
प्रो. शशिप्रभा कुमार का जीवन और उनका विपुल साहित्य इस बात का प्रज्वलित प्रमाण है कि 'संस्कृत' केवल एक मृत भाषा या कर्मकांड की भाषा नहीं है, बल्कि वह जीवंत दर्शन, विज्ञान और आधुनिक विमर्श (Discourse) की भाषा है।
उन्होंने महर्षि कणाद के 'वैशेषिक' को पुस्तकालयों की धूल से निकालकर आधुनिक विश्वविद्यालयों के शोध-पत्रों (Research Papers) का ज्वलंत विषय बना दिया। भारत के राष्ट्रपति द्वारा 'सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर' (Certificate of Honour) से सम्मानित डॉ. कुमार की मेधा आज भी 'भारतीय ज्ञान परम्परा' (Indian Knowledge Systems - IKS) को दिशा दे रही है। उनका यह स्पष्ट दृष्टिकोण कि "दर्शन केवल अकादमिक बहस नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और विज्ञान है", आने वाली पीढ़ियों के शोधार्थियों के लिए सदैव एक प्रकाश-स्तम्भ (Lighthouse) का कार्य करेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Facets of Indian Philosophic Thought - Dr. Shashiprabha Kumar.
- वैशेषिक दर्शन में पदार्थ-निरूपण - डॉ. शशिप्रभा कुमार।
- Sanskrit Studies (Various Volumes) - Edited by Prof. Shashiprabha Kumar (JNU/D.K. Printworld).
- सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय की 'तत्त्वबोधिनी' व्याख्यान शृंखला के अभिलेख।
- वैदिक वाङ्मय में नारी-विमर्श पर उनके प्रकाशित विभिन्न शोध-पत्र एवं राष्ट्रपति सम्मान की प्रशस्ति।
