पं. जयदेव शर्मा (विद्यालंकार): चारों वेदों के हिंदी भाष्यकार और दयानंद-परंपरा के महान संवाहक
एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह तपस्वी विद्वान जिसने अपना संपूर्ण जीवन वेदों के 20,000 से अधिक मंत्रों का 'सरल और तार्किक हिंदी अनुवाद' करने में समर्पित कर दिया (The Master Translator of the Vedas)
- 1. प्रस्तावना: महर्षि दयानंद के अधूरे कार्य की पूर्णता
- 2. जीवन परिचय: विद्यालंकार की उपाधि और आर्य समाज का प्रभाव
- 3. चारों वेदों का हिंदी भाष्य: एक ऐतिहासिक महायज्ञ
- 4. भाष्य की शैली: पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ
- 5. यौगिक अर्थ प्रक्रिया: वेदों में कोई 'रूढ़ि' या 'इतिहास' नहीं
- 6. पाश्चात्य और पौराणिक व्याख्याओं का तार्किक खंडन
- 7. आर्य साहित्य मंडल (अजमेर) का योगदान
- 8. निष्कर्ष: वेदों के लोकतंत्रीकरण के पुरोधा
19वीं शताब्दी में महर्षि दयानंद सरस्वती ने यह घोषणा की थी कि "वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है" और सभी मनुष्यों (स्त्री-पुरुष, ब्राह्मण-शूद्र) को वेद पढ़ने का अधिकार है। उन्होंने वेदों का संस्कृत और हिंदी में भाष्य लिखना प्रारंभ किया, लेकिन अपने असामयिक निधन के कारण वे केवल यजुर्वेद और ऋग्वेद के कुछ भाग का ही भाष्य कर पाए।
महर्षि दयानंद के इस अपूर्ण स्वप्न को पूर्ण करने का बीड़ा आर्य समाज के जिस मूर्धन्य विद्वान ने उठाया, वे थे—पंडित जयदेव शर्मा 'विद्यालंकार' (Pt. Jaidev Sharma Vidyalankar)। उन्होंने अथक परिश्रम करके चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) का संपूर्ण और अत्यंत सुबोध हिंदी भाष्य तैयार किया, जो आज भारत के कोने-कोने में पढ़ा जाता है।
| पूरा नाम | पंडित जयदेव शर्मा (विद्यालंकार) |
| संप्रदाय/संस्था | आर्य समाज (Arya Samaj) |
| प्रमुख उपाधि | विद्यालंकार (गुरुकुल प्रणाली की सर्वोच्च उपाधि) |
| महानतम उपलब्धि | चारों वेदों (20,000+ मंत्रों) का संपूर्ण हिंदी भाष्य |
| प्रकाशन संस्था | आर्य साहित्य मंडल, अजमेर (राजस्थान) |
| व्याख्या पद्धति | निरुक्त आधारित 'यौगिक' (Etymological) व्याख्या |
| प्रेरणा स्रोत | महर्षि दयानंद सरस्वती का 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' |
2. जीवन परिचय: विद्यालंकार की उपाधि और आर्य समाज का प्रभाव
पंडित जयदेव शर्मा आर्य समाज की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की उपज थे। उन्होंने 'विद्यालंकार' की उपाधि प्राप्त की थी, जो उस समय संस्कृत साहित्य, व्याकरण, निरुक्त और दर्शन में सर्वोच्च योग्यता का प्रतीक मानी जाती थी।
उनका संपूर्ण जीवन एक संन्यासी की भांति 'स्वाध्याय' (Self-study) और 'प्रवचन' को समर्पित था। वे प्रचार-प्रसार और मंचों की राजनीति से दूर रहते थे। उनका मानना था कि यदि भारत को फिर से विश्वगुरु बनना है, तो यहाँ के सामान्य नागरिकों को वेदों का सीधा अर्थ समझ में आना चाहिए, न कि केवल पंडितों के माध्यम से। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपना जीवन 'अनुवाद' और 'भाष्य' को समर्पित कर दिया।
3. चारों वेदों का हिंदी भाष्य: एक ऐतिहासिक महायज्ञ
वेदों में कुल मिलाकर 20,000 से अधिक मंत्र हैं (ऋग्वेद में लगभग 10,500, अथर्ववेद में 6,000, यजुर्वेद में 1,975, और सामवेद में 1,875)। एक व्यक्ति के जीवनकाल में इन सभी मंत्रों का पदच्छेद कर उनका तार्किक अर्थ लिखना एक असम्भव सा कार्य प्रतीत होता है।
- ऋग्वेद भाष्य: जयदेव जी ने महर्षि दयानंद द्वारा छोड़े गए भाग के आगे से ऋग्वेद का पूर्ण भाष्य किया। यह कई विशाल खंडों में प्रकाशित हुआ।
- सामवेद और अथर्ववेद: इन दोनों वेदों पर दयानंद जी भाष्य नहीं लिख पाए थे। जयदेव शर्मा ने दयानंद की 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' में दिए गए नियमों का पालन करते हुए इन वेदों का ऐसा अद्भुत भाष्य किया जिसने तंत्र-मंत्र और जादू-टोने (अथर्ववेद के संबंध में) की भ्रांतियों को मिटा दिया।
4. भाष्य की शैली: पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ
पं. जयदेव शर्मा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी प्रस्तुतीकरण (Presentation) की शैली थी, जो एक साधारण हिंदी पाठक के लिए भी अत्यंत सुगम थी।
उन्होंने प्रत्येक मंत्र को निम्नलिखित क्रम में समझाया:
1. मूल मंत्र: सस्वर वेद मंत्र।
2. पदच्छेद (Word Break): मंत्र के जुड़े हुए शब्दों (संधि) को अलग-अलग करना।
3. अन्वय (Syntax): संस्कृत शब्दों को हिंदी वाक्य रचना (कर्ता, कर्म, क्रिया) के क्रम में सजाना।
4. पदार्थ (Word Meaning): एक-एक शब्द का व्युत्पत्ति (Etymology) के आधार पर अर्थ बताना।
5. भावार्थ (Substance/Essence): अंत में एक पैराग्राफ में मंत्र का दार्शनिक या सामाजिक संदेश देना।
यह पद्धति इतनी वैज्ञानिक थी कि इसे पढ़कर कोई भी पाठक स्वयं संस्कृत के शब्दों का अर्थ निकालना सीख सकता था।
5. यौगिक अर्थ प्रक्रिया: वेदों में कोई 'रूढ़ि' या 'इतिहास' नहीं
जयदेव शर्मा ने आचार्य यास्क के 'निरुक्त' और पाणिनी के व्याकरण का कठोरता से पालन किया। उनका मूल सिद्धांत 'यौगिक अर्थ' (Derivative Meaning) था।
मध्यकालीन भाष्यकारों (जैसे सायण) ने वेदों के कई शब्दों को 'रूढ़' (Proper Nouns) मान लिया था।
- सायण के अनुसार: 'जमदग्नि' या 'वशिष्ठ' किसी प्राचीन ऋषि के नाम (इतिहास) हैं।
- जयदेव शर्मा के अनुसार: वेदों में कोई इतिहास या किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। 'जमदग्नि' (जमत + अग्नि) का अर्थ है "प्रज्ज्वलित अग्नि" या "तेजस्वी ज्ञान", और 'वशिष्ठ' का अर्थ है "जो सबसे अधिक वास (श्रेष्ठ निवास) करता है"।
इस पद्धति से उन्होंने सिद्ध किया कि वेद शाश्वत (Eternal) हैं और उनमें किसी विशेष काल, राजा या युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि वे ब्रह्मांड और जीवन के सार्वभौमिक नियम हैं।
6. पाश्चात्य और पौराणिक व्याख्याओं का तार्किक खंडन
पंडित जयदेव शर्मा का भाष्य केवल अनुवाद नहीं था, बल्कि यह पाश्चात्य इंडोलॉजिस्ट्स (जैसे मैक्स मूलर, ग्रिफिथ) और पौराणिक कर्मकांडियों (महीधर, उव्वट) को एक करारा जवाब था।
- पशुबलि का खंडन: महीधर आदि ने यजुर्वेद के कई मंत्रों का अर्थ 'यज्ञ में पशु (अश्व, गो) की बलि देना' किया था। जयदेव जी ने व्याकरण से सिद्ध किया कि 'अश्वमेध' का अर्थ घोड़े को मारना नहीं, बल्कि 'अश्व' (राष्ट्र की शक्ति/विद्युत) को मेध (संगठित/उन्नत) करना है। 'गो' का अर्थ गाय नहीं, बल्कि 'पृथ्वी' या 'किरण' है।
- प्रकृति पूजा का खंडन: पश्चिम के विद्वान मानते थे कि वैदिक आर्य 'अग्नि', 'वायु', 'जल' की पूजा करते थे। जयदेव शर्मा ने स्पष्ट किया कि ये सभी शब्द एक ही परमेश्वर (ब्रह्म) के विभिन्न गुणों के नाम हैं। ("एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति")।
7. आर्य साहित्य मंडल (अजमेर) का योगदान
पं. जयदेव शर्मा के इस भगीरथ कार्य को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य राजस्थान के अजमेर स्थित 'आर्य साहित्य मंडल' ने किया।
इस प्रकाशन संस्था ने उनके चारों वेदों के भाष्यों को अत्यंत सुंदर, मोटे अक्षरों में और सस्ती दरों पर प्रकाशित किया। आज भी पूरे भारत के आर्य समाज मंदिरों, गुरुकुलों और वैदिक शोध संस्थानों की अलमारियों में जो लाल या नीले रंग के वेद ग्रंथ सजे दिखाई देते हैं, वे अधिकांशतः पंडित जयदेव शर्मा द्वारा ही भाष्य किए गए हैं।
8. निष्कर्ष: वेदों के लोकतंत्रीकरण के पुरोधा
पंडित जयदेव शर्मा (विद्यालंकार) एक ऐसे मौन तपस्वी थे जिन्होंने ख्याति की कामना किए बिना भारतीय ज्ञान परंपरा की अतुलनीय सेवा की।
जहाँ डॉ. राधाकृष्णन और मैक्स मूलर ने वेदों को 'अंग्रेजी' जगत में पहुँचाया, वहीं पं. जयदेव शर्मा ने वेदों को भारत के 'आम नागरिक', 'किसान' और 'गृहस्थ' के हाथों में सौंप दिया। उन्होंने महर्षि दयानंद के इस मंत्र को चरितार्थ कर दिखाया कि वेद ज्ञान पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं है। वे आधुनिक युग के सच्चे 'वेद-प्रचारक' और 'ज्ञान-योगी' थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- ऋग्वेद भाष्य - पं. जयदेव शर्मा विद्यालंकार (आर्य साहित्य मंडल, अजमेर)।
- यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद भाष्य - पं. जयदेव शर्मा विद्यालंकार।
- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका - महर्षि दयानंद सरस्वती।
- आर्य समाज का इतिहास - सत्यकेतु विद्यालंकार (वैदिक विद्वानों का योगदान)।
