भगवान भाव के भूखे हैं: महात्मा और दो गोपियों की अद्भुत कथा
प्राचीन काल की बात है, श्री धाम वृन्दावन में एक विरक्त साधु महात्मा रहते थे। उनका इस संसार में न कोई अपना था, न कोई स्थायी आश्रम और न ही कोई धर्मशाला जहाँ वे टिक सकें। जहाँ रात हो जाती, वहीं किसी वृक्ष के नीचे या मंदिर के चबूतरे पर अपना आसन लगा लेते। दिन भर भगवान का भजन करते और भिक्षाटन से जो रूखा-सूखा मिल जाता, उसे बड़े प्रेम से अपने झोली में बैठे भगवान (लड्डू गोपाल) को भोग लगाते और स्वयं प्रसाद रूप में ग्रहण कर लेते। उनके लिए वह झोली ही उनका पूरा संसार और मंदिर था।
उसी वृन्दावन में दो भोली-भाली गोपियाँ भी रहती थीं। उनका जीवन अत्यंत सरल था। उन्होंने कभी किसी बड़े मंदिर के दर्शन नहीं किये थे, न ही वे कभी किसी कथा-सत्संग में गई थीं। वेद-पुराण के ज्ञान से वे कोसों दूर थीं। उनका नित्य का नियम था— प्रातः काल उठना, गायों की सेवा करना, और दही-मक्खन से भरी गागर (मटकी) सिर पर रखकर गलियों में बेचना। वे अपनी इसी सीधी-सादी गृहस्थी में मगन रहती थीं।
झोली में छिपे भगवान की खोज
उन दोनों गोपियों ने लोगों से यह सुन रखा था कि 'साधु-संतों के पास उनकी झोली में भगवान रहते हैं।' उनके मन में अक्सर यह बाल-सुलभ कौतूहल उठता था कि आखिर वे भगवान दिखते कैसे होंगे?
एक दिन की बात है, दोनों गोपियाँ अपना दही बेचकर लौट रही थीं। वे यमुना के पावन तट पर पहुँचीं। वहाँ उन्होंने देखा कि वही महात्मा जी अपनी झोली एक कदंब के वृक्ष के नीचे रखकर, यमुना जल में संध्या-वंदन और स्नान करने के लिए गहरे पानी में गए हुए हैं। गोपियों के मन की उत्सुकता जाग उठी। उन्होंने सोचा कि यही सही अवसर है झोली में छिपे भगवान को देखने का।
अत्यंत कौतूहल और डर के साथ दोनों ने चुपके से वह झोली उठाई और उसका सारा सामान वृक्ष के नीचे बिखेर दिया। चंदन, रुद्राक्ष, कंठी—सब दिखा, पर भगवान नहीं मिले। तभी उनकी नजर एक छोटे से बंद डिब्बे पर पड़ी। उन्होंने कांपते हाथों से उस डिब्बे को खोला, तो देखा कि पीतल के एक छोटे से लड्डू गोपाल (त्रिभंगी मुद्रा में) डिब्बे में बंद हैं।
गोपियों का वात्सल्य और भगवान की मुसकान
मूर्ति को देखकर दोनों गोपियों का हृदय वात्सल्य (ममता) से भर आया।
अब दोनों के भीतर की 'माँ' जाग उठी। उन्होंने बड़े ही प्रेम से लड्डू गोपाल को अपने हाथों में उठाया और पुचकारते हुए बोलीं, "अरे मेरे प्यारे भगवान जी! अब परेशान न हो। संन्यासी बाबा नहीं हैं, तुम खुलकर अपने हाथ-पैर सीधे कर लो। तुम भूखे भी होंगे, लो हम तुम्हें अपनी मटकी का सबसे मीठा दही खिलाते हैं।"
इतना कहकर दोनों ने अष्टधातु की उस मूर्ति के मुड़े हुए हाथ-पैरों को खींच-खींच कर सीधा करना शुरू किया। भगवान श्रीकृष्ण भी उन भोली गोपियों की इस निश्छल और सरल भक्ति पर मुग्ध हो रहे थे। अष्टधातु की वह कठोर मूर्ति उनकी ममता के आगे मोम की तरह पिघलने लगी। जब गोपियाँ मूर्ति को सीधा करते-करते थक गईं, लेकिन हार नहीं मानीं, तो भक्त के आगे भगवान को ही हारना पड़ा। चमत्कार हो गया! लड्डू गोपाल की टेढ़ी मूर्ति बिल्कुल सीधी हो गई। भगवान अपने पैरों पर सीधे खड़े हो गए और उनके मुख पर एक अलौकिक मुसकान छा गई।
महात्मा का विलाप और भगवान के दर्शन
गोपियों ने बड़े प्यार से भगवान को नहलाया, उन्हें भरपेट माखन और दही खिलाया। फिर वे बड़े लाड़ से बोलीं– "अब तुम वापस इस डिब्बे में लेटो और आराम करो।"
लेकिन अब वह सीधी खड़ी मूर्ति उस छोटे से डिब्बे में कैसे जाती? वे उसे लिटाने का प्रयास कर ही रही थीं कि तभी महात्मा जी स्नान करके वापस आ गए। अपनी झोली बिखरी देख और गोपियों को भागते देख, महात्मा जी ने सोचा कि ये कुछ चुरा कर भाग रही हैं। वे जोर से चिल्लाते हुए उनके पीछे दौड़े, लेकिन गोपियाँ तब तक आँखों से ओझल हो चुकी थीं।
हांफते हुए महात्मा जी लौटकर आए। जब उन्होंने अपना डिब्बा और झोली देखी, तो वे हतप्रभ (हैरान) रह गए। उनके लड्डू गोपाल जो त्रिभंगी (टेढ़े) मुद्रा में थे, आज बिल्कुल सीधे खड़े होकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे, और उनके होठों पर दही लगा हुआ था!
महात्मा सारी बात समझ गए कि भगवान उन अनपढ़ गोपियों के प्रेम पर रीझ गए हैं। वह रोते हुए भगवान के चरणों में गिर पड़े। उसके बाद वे पागलों की तरह भागते हुए उन गोपियों को खोजते हुए उनके घर पहुँचे। दरवाजे पर जाकर उन दोनों साधारण गोपियों के चरण पकड़कर फूट-फूट कर रोने लगे।
कथा भाव (सार):
हम जीवन में बहुत कुछ बन जाते हैं, लेकिन 'सरल' नहीं बन पाते, यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना है।

