संसार का सहारा: तिनके पर टिकी ओस की बूंद | Adhisthanam Samicchanti Shloka

Sooraj Krishna Shastri
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संसार का सहारा: तिनके पर टिकी ओस की बूंद | Adhisthanam Samicchanti Shloka

क्षणभंगुर जीवन: तिनके पर टिकी ओस की बूंद

अधिष्ठानं समिच्छन्ति
ह्यचलं निर्बले सति।
संसारे सर्वभूतानां
तृणबिन्दुवदस्थिरे॥
Adhiṣṭhānaṃ samicchanti
hyacalaṃ nirbale sati |
Saṃsāre sarvabhūtānāṃ
tṛṇabinduvadasthire ||
हिन्दी अनुवाद:
"निर्बल व्यक्ति (जब संकट में होता है) तो एक स्थिर सहारे (अधिष्ठान) की इच्छा करता है। परन्तु वह यह नहीं जानता कि इस संसार में समस्त प्राणियों का अस्तित्व तिनके की नोक पर ठहरी हुई ओस की बूंद के समान अस्थिर (नाशवान) है।"

📖 शब्दार्थ (Word Analysis)

शब्द (Sanskrit) अर्थ (Hindi) English Meaning
अधिष्ठानं सहारा/आधार/बुनियाद Basis/Support/Foundation
समिच्छन्ति इच्छा करते हैं Desire/Seek
अचलं जो हिले नहीं/स्थिर Steady/Immovable
निर्बले सति निर्बल (कमजोर) होने पर When weak/powerless
सर्वभूतानां समस्त प्राणियों का Of all living beings
तृण-बिन्दु-वत् तिनके पर स्थित बूंद की तरह Like a drop on a grass blade
अस्थिरे अस्थिर/क्षणभंगुर Unsteady/Transient

(↔ तालिका को खिसका कर देखें)

🧠 गहरा चिंतन (Deep Insights)

1. उपमा अलंकार (Metaphor):
यहाँ जीवन की तुलना 'तृणबिन्दु' (Water drop on grass) से की गई है। जैसे ओस की बूंद तिनके पर एक पल के लिए चमकती है और जरा सी हवा चलने पर गिर जाती है, वैसा ही हमारा जीवन और हमारे सांसारिक सहारे हैं।
2. अधिष्ठान का भ्रम:
इंसान सोचता है कि धन, पद या कोई बलवान व्यक्ति उसका 'अचल अधिष्ठान' (Permanent Support) बन सकता है। लेकिन श्लोक कहता है कि जिस पर आप निर्भर हैं, वह स्वयं 'अस्थिर' है।

🏙️ आधुनिक सन्दर्भ

आज के भागदौड़ भरे जीवन में यह श्लोक हमें 'धरातल' (Ground Reality) दिखाता है:

  • नौकरी और सुरक्षा: हम बड़ी कंपनियों या ऊंची पदवियों में सुरक्षा खोजते हैं, लेकिन एक छोटी सी आर्थिक मंदी (Recession) या बीमारी सब कुछ खत्म कर सकती है।
  • संबंधों में निर्भरता: हम अक्सर दूसरों को अपना सब कुछ मान लेते हैं, पर मृत्यु या परिस्थितियाँ उन्हें भी हमसे दूर कर सकती हैं। यह श्लोक सिखाता है कि एकमात्र स्थायी सहारा परमात्मा ही है।

🐢 संवादात्मक नीति कथा

🏰 रेत का महल

एक बार एक बच्चा समुद्र किनारे रेत का एक बहुत बड़ा और सुंदर महल बना रहा था। वह उसे अपना 'घर' मान रहा था और बहुत खुश था।

तभी एक लहर आई और महल का एक हिस्सा बहा ले गई। बच्चा रोने लगा और फिर से उसे ठीक करने लगा। एक बुजुर्ग व्यक्ति वहां से गुजर रहे थे, उन्होंने कहा— "बेटा, लहर तो फिर आएगी और इस बार पूरा महल ले जाएगी। तुम लहर को नहीं रोक सकते।"

बच्चा बोला, "लेकिन मुझे सहारा (अधिष्ठान) चाहिए।"

बुजुर्ग बोले: "सहारा महल में नहीं, तुम्हारी उस मिट्टी के खेल के प्रति समझ में है। यह संसार रेत के महल जैसा है और हमारा जीवन उस पर टिकी ओस की बूंद जैसा। अगर सहारा लेना है, तो उस समुद्र (ईश्वर) का लो जो लहरें बनाता है, न कि उस रेत का जिसे लहरें मिटा देती हैं।"

निष्कर्ष: जो स्वयं अस्थिर है, वह दूसरों को क्या स्थिरता देगा?

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

संसार का हर सहारा 'तिनके की बूंद' है।
चाहे धन हो या जन, सब समय के साथ विलीन हो जाएंगे।
इसलिए, अस्थिर में स्थिर को खोजें और केवल सत्य का अधिष्ठान ग्रहण करें।

© BhagwatDarshan.com | ॥ इति शुभम् ॥

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