Shani Dev Janm Katha aur Vakra Drishti: Kyon hai Shani ki Nazar Tedhi?

Sooraj Krishna Shastri
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शनिदेव: दंडनायक या मित्र? जन्म कथा और वक्र दृष्टि का रहस्य

अक्सर शनि का नाम सुनते ही लोग सहमने लगते हैं, शामत नजर आने लगती है और शनि के प्रकोप का खौफ खा जाते हैं। कुल मिलाकर शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है, लेकिन असल में ऐसा है नहीं।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि न्यायधीश या कहें दंडाधिकारी की भूमिका का निर्वहन करते हैं। वह अच्छे कर्मों का परिणाम अच्छा और बुरे का बुरा देने वाले ग्रह हैं। अगर कोई शनिदेव के कोप का शिकार है, तो रूठे हुए शनिदेव को मनाया भी जा सकता है। शनि जयंती का दिन तो इस काम के लिये सबसे उचित माना जाता है।

यहाँ प्रस्तुत है शनिदेव के जन्म की अद्भुत कहानी और उनकी टेढ़ी दृष्टि (नाराजगी) का वास्तविक कारण।

1. शनिदेव की जन्मकथा (स्कंदपुराण के अनुसार)

सूर्यदेव और छाया का मिलन

स्कंदपुराण के काशीखंड में वर्णित कथा के अनुसार, राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ। सूर्यदेवता का तेज इतना अधिक था कि संज्ञा उसे सहन नहीं कर पाती थीं और परेशान रहती थीं।

समय बीतने पर संज्ञा के गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना ने जन्म लिया। संतानों के जन्म के बाद भी संज्ञा सूर्य के तेज से घबराती थीं। अंततः उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को कम करेंगी।

सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे और बच्चों का पालन भी होता रहे, इसके लिए उन्होंने अपने तप से अपनी हमशक्ल (छाया) को पैदा किया, जिसका नाम 'संवर्णा' (सुवर्णा/छाया) रखा। संज्ञा ने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी अपनी छाया को दी और कहा:

"अब से मेरी जगह तुम सूर्यदेव की सेवा और बच्चों का पालन करते हुए नारीधर्म का पालन करोगी, लेकिन यह राज सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही बना रहना चाहिए।"

संज्ञा वहां से पिता के घर गईं, लेकिन पिता की डांट के कारण वापस न जाकर वन में घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या में लीन हो गईं। उधर, सूर्यदेव को आभास नहीं हुआ कि उनके साथ संज्ञा नहीं, अपितु उनकी छाया रह रही है। सूर्यदेव और संवर्णा (छाया) के मिलन से मनु, शनिदेव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया।

2. पिता-पुत्र में विद्रोही संबंध क्यों? (रंग का भेद)

एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में 'कश्यप यज्ञ' से हुआ। माता छाया भगवान शिव की परम भक्त थीं। जब शनिदेव गर्भ में थे, तो छाया भगवान शिव की कठोर तपस्या में इतनी लीन हो गईं कि उन्हें खाने-पीने की सुध न रही।

भूख-प्यास और धूप-गर्मी सहने के कारण इसका प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु पर पड़ा और शनिदेव का रंग काला हो गया।

जब शनिदेव का जन्म हुआ, तो उनके श्याम वर्ण को देखकर सूर्यदेव ने छाया के चरित्र पर संदेह किया और अपमानित करते हुए कहा कि "यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता।"

माँ के अपमान और तप की शक्ति शनिदेव में भी थी। उन्होंने क्रोधित होकर जैसे ही पिता सूर्यदेव को देखा, सूर्यदेव बिल्कुल काले पड़ गए और उनके घोड़ों की चाल रुक गई। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी। शिवजी ने उन्हें उनकी गलती का अहसास करवाया और सूर्यदेव ने क्षमा मांगी, तब उन्हें अपना रूप वापस मिला।

परंतु, पिता-पुत्र का संबंध जो एक बार खराब हुआ, वह फिर न सुधरा। आज भी शनिदेव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है।

3. शनिदेव की टेढ़ी (वक्र) दृष्टि का राज

शनिदेव की दृष्टि विनाशकारी क्यों मानी जाती है? ब्रह्मपुराण में इसकी एक रोचक कथा मिलती है।

पत्नी का श्राप और कृष्ण भक्ति

ब्रह्मपुराण के अनुसार, शनिदेव भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। युवावस्था में उनका विवाह चित्ररथ की कन्या से हुआ। उनकी पत्नी सती, साध्वी और परम तेजस्विनी थीं।

किंतु, शनिदेव भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में इतना लीन रहते थे कि उन्होंने अपनी पत्नी को जैसे भुला ही दिया। एक रात ऋतु स्नान कर संतान प्राप्ति की इच्छा लिए पत्नी शनिदेव के पास आईं, लेकिन शनिदेव हमेशा की तरह ध्यान में मग्न थे। पत्नी प्रतीक्षा करते-करते थक गईं और उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया।

आवेश और क्रोध में आकर उन्होंने शनिदेव को श्राप दे दिया:

"आज के बाद जिस पर भी तुम्हारी नजर पड़ेगी, वह नष्ट हो जायेगा।"

ध्यान टूटने पर शनिदेव ने पत्नी को मनाने की कोशिश की। पत्नी को भी अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन तीर कमान से छूट चुका था। श्राप के प्रतिकार की शक्ति उनमें नहीं थी। इसीलिए, किसी का अहित न हो, यह सोचकर शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे।

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