सर विलियम जोन्स: इंडोलॉजी के पितामह, और संस्कृत-यूरोपीय भाषा संबंध के खोजकर्ता | Sir William Jones

Sooraj Krishna Shastri
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सर विलियम जोन्स: प्राच्य विद्या के जनक और पूरब-पश्चिम के सेतु

सर विलियम जोन्स: इंडोलॉजी के पितामह और संस्कृत-यूरोपीय संबंध के खोजकर्ता

एक विस्तृत ऐतिहासिक और भाषाई विश्लेषण: वह ब्रिटिश न्यायाधीश जिसने 1784 में भारत के अतीत को खोजने की व्यवस्थित शुरुआत की (The Father of Modern Indology)

18वीं शताब्दी के अंत में, जब अंग्रेज भारत में अपनी सत्ता जमा रहे थे, एक ऐसा ब्रिटिश अधिकारी कलकत्ता (अब कोलकाता) के तट पर उतरा, जो भारत को लूटने नहीं, बल्कि समझने आया था। वे थे—सर विलियम जोन्स (Sir William Jones)।

विलियम जोन्स वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आधिकारिक और तार्किक रूप से यह घोषणा की कि संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषाओं का मूल स्रोत एक ही है। इस एक खोज ने पूरी दुनिया के इतिहास को देखने का नजरिया बदल दिया। 1784 में उनके द्वारा स्थापित **'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल'** (Asiatic Society) आज भी प्राच्य विद्या (Indology) का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाती है। मैक्स मूलर, विल्सन और कीथ जैसे बाद के सभी विद्वान कहीं न कहीं जोन्स द्वारा जलाई गई मशाल को ही आगे बढ़ा रहे थे।

📌 सर विलियम जोन्स: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम सर विलियम जोन्स (Sir William Jones)
काल 28 सितंबर 1746 – 27 अप्रैल 1794
राष्ट्रीयता ब्रिटिश (लंदन), वेल्श मूल
पद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (Puisne Judge), कलकत्ता
संस्थापक द एशियाटिक सोसाइटी (1784)
महान खोज इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार (PIE Theory)
प्रमुख अनुवाद अभिज्ञानशाकुंतलम (Kalidasa), मनुस्मृति (Institutes of Hindu Law), गीतगोविंद (Jayadeva)
भाषाई ज्ञान 28 भाषाएं (13 में पारंगत)

2. जीवन परिचय: एक भाषाई विलक्षण प्रतिभा (Prodigy)

विलियम जोन्स का जन्म लंदन में हुआ था। उनके पिता एक प्रसिद्ध गणितज्ञ थे (जो आइजैक न्यूटन के मित्र थे)। जोन्स बचपन से ही विलक्षण थे। हारो (Harrow) और ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने ग्रीक, लैटिन, फारसी, अरबी और हिब्रू सीख ली थी।

कहा जाता है कि अपने जीवन के अंत तक वे 28 भाषाएं जानते थे, जिनमें से 13 में वे धाराप्रवाह थे।
भारत आगमन (1783): उन्हें कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of Judicature) में न्यायाधीश नियुक्त किया गया। भारत आते ही उन्होंने देखा कि यहाँ ज्ञान का एक विशाल महासागर (संस्कृत साहित्य) छिपा है, जिसे पश्चिम के लोग नहीं जानते। उन्होंने तुरंत संस्कृत सीखने का निर्णय लिया।

3. एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना: शोध का मंदिर

भारत आने के कुछ ही महीनों बाद, 15 जनवरी 1784 को जोन्स ने 30 अन्य अंग्रेज अधिकारियों के साथ मिलकर "The Asiatic Society" की स्थापना की।

उद्देश्य: जोन्स ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि इस संस्था का उद्देश्य है—"मनुष्य और प्रकृति द्वारा किया गया वह सब कुछ, जो एशिया की सीमाओं के भीतर हुआ है" (Man and Nature; whatever is performed by the one, or produced by the other).
यह संस्था भारत के इतिहास, विज्ञान, साहित्य और कला को खोजने और संरक्षित करने वाली पहली व्यवस्थित संस्था बनी। आज हम जो भी प्राचीन पांडुलिपियां देखते हैं, उनमें से हजारों इसी सोसाइटी द्वारा बचाई गई हैं।

4. 1786 का ऐतिहासिक भाषण: इंडो-यूरोपियन परिवार की खोज

2 फरवरी 1786 को एशियाटिक सोसाइटी की तीसरी वर्षगांठ पर जोन्स ने वह भाषण दिया जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने दुनिया को बताया कि संस्कृत कोई अलग-थलग भाषा नहीं है।

"संस्कृत भाषा, चाहे वह कितनी भी पुरानी क्यों न हो, उसकी संरचना अद्भुत है; यह ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लैटिन से अधिक समृद्ध है, और दोनों से अधिक परिष्कृत है... फिर भी इन तीनों में क्रियाओं और व्याकरण में इतनी समानता है कि यह संयोग नहीं हो सकता... इनका स्रोत एक ही होना चाहिए।" — सर विलियम जोन्स (Third Anniversary Discourse, 1786)
महत्व (Impact)

इस भाषण ने 'तुलनात्मक भाषाविज्ञान' (Comparative Linguistics) को जन्म दिया। इससे पता चला कि भारतीय और यूरोपीय (अंग्रेज, जर्मन, फ्रेंच) एक ही प्राचीन पूर्वज (Proto-Indo-European) की संतानें हैं। इसने औपनिवेशिक शासकों और भारतीय प्रजा के बीच एक 'भाईचारे' (Lost Kinsmen) के रिश्ते का अहसास कराया।

5. 'अभिज्ञानशाकुंतलम' का अनुवाद और यूरोप में तहलका

1789 में जोन्स ने कालिदास के नाटक 'अभिज्ञानशाकुंतलम' का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया ("Sacontala or The Fatal Ring")।

यह अनुवाद यूरोप में जंगल की आग की तरह फैल गया। इसने वहां के साहित्यकारों को चौंका दिया कि भारत में शेक्सपियर से भी सदियों पहले इतना महान नाटक लिखा जा चुका था।
गेटे (Goethe) की प्रतिक्रिया: महान जर्मन कवि गेटे इस अनुवाद को पढ़कर इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने शकुंतला पर एक कविता लिखी और कहा कि यदि कोई स्वर्ग और पृथ्वी को एक साथ देखना चाहता है, तो उसे 'शकुंतला' पढ़नी चाहिए।

6. मनुस्मृति और हिंदू कानून (Hindu Law)

एक न्यायाधीश के रूप में, जोन्स चाहते थे कि भारतीयों का न्याय उनके अपने कानूनों के हिसाब से हो, न कि अंग्रेजी कानूनों से। लेकिन उन्हें पंडितों पर निर्भर रहना पड़ता था।

इसलिए उन्होंने 'मनुस्मृति' का अनुवाद किया, जो 1794 में (उनकी मृत्यु के बाद) "Institutes of Hindu Law" के नाम से प्रकाशित हुई।
आलोचना और प्रभाव: यद्यपि इस कार्य ने अंग्रेजों को भारतीय कानून समझने में मदद की, लेकिन आलोचक कहते हैं कि जोन्स ने अनजाने में भारत की लचीली (Flexible) परंपरा को एक कठोर लिखित कानून (Code) में बदल दिया, जिससे जाति व्यवस्था और अधिक रूढ़िवादी हो गई।

7. ओरियंटलिस्ट दृष्टिकोण: भारत के प्रति सम्मान

विलियम जोन्स 'ओरियंटलिस्ट' (प्राच्यवादी) विचारधारा के प्रमुख थे। उनका मानना था कि:
1. भारतीय सभ्यता प्राचीन और महान है।
2. भारत पर शासन करने के लिए उसकी संस्कृति और भाषा को समझना और उसका सम्मान करना जरूरी है।

यह दृष्टिकोण बाद के 'एंग्लिसिस्ट' (जैसे लॉर्ड मैकाले) से बिलकुल अलग था, जो भारतीय ज्ञान को "कचरा" मानते थे और केवल अंग्रेजी शिक्षा थोपना चाहते थे। जोन्स ने भारतीय देवताओं की तुलना ग्रीक और रोमन देवताओं से की और सिद्ध किया कि मानव मन की कल्पना हर जगह एक जैसी है।

8. निष्कर्ष: आधुनिक भाषाविज्ञान के जनक

सर विलियम जोन्स का मात्र 47 वर्ष की आयु में कलकत्ता में निधन हो गया, लेकिन उन्होंने जो बीज बोया, वह आज एक वटवृक्ष बन चुका है।

  • इंडोलॉजी: उन्होंने पश्चिम को बताया कि भारत केवल मसालों की मंडी नहीं, बल्कि ज्ञान की खान है।
  • भाषा परिवार: आज अगर हम जानते हैं कि 'Mother' और 'मातृ' (Matri) शब्द एक ही हैं, तो इसका श्रेय जोन्स की दृष्टि को जाता है।

वे सही अर्थों में 'पूरब और पश्चिम के सेतु' थे। उनकी कब्र आज भी कोलकाता के साउथ पार्क स्ट्रीट सेमिटरी में मौजूद है, जो हर इतिहास प्रेमी के लिए एक तीर्थ स्थान है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • The Life and Mind of Oriental Jones - Garland Cannon.
  • Sir William Jones: A Reader - Satya S. Pachori.
  • Asiatic Researches (Volume 1) - The Third Anniversary Discourse (1786).
  • Abhijnanasakuntalam (Introduction by William Jones).

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