स्वामी करपात्री जी महाराज: धर्मसम्राट्, 'रामराज्य परिषद' के संस्थापक और मार्क्सवाद के वैदिक आलोचक | Swami Karpatri Ji

Sooraj Krishna Shastri
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स्वामी करपात्री जी: सनातन धर्म के 'लौह पुरुष' और अद्वितीय विद्वान

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी: सनातन धर्म के रक्षक और 'रामराज्य' के आधुनिक उद्घोषक

एक विस्तृत ऐतिहासिक और दार्शनिक विश्लेषण: वह संन्यासी जिसने भोजन के लिए 'पात्र' का भी त्याग कर दिया, किन्तु धर्म की रक्षा के लिए 'संसद' तक को हिला दिया (The Ascetic Who Challenged Modernity)

20वीं सदी के भारत में जब आधुनिकता, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की बयार बह रही थी, तब एक **दंडी स्वामी** ने हिमालय जैसी दृढ़ता के साथ **सनातन धर्म** के मूल स्वरूप को थामे रखा। वे थे **स्वामी करपात्री जी महाराज** (Swami Karpatri Ji)।

उन्हें उनके अनुयायी **'धर्मसम्राट्'** कहते थे। उनका जीवन विरोधाभासों का अद्भुत संगम था—एक ओर वे इतने विरक्त थे कि भिक्षा के लिए बर्तन भी नहीं रखते थे (हाथ ही उनका पात्र था), और दूसरी ओर वे इतने सक्रिय थे कि उन्होंने **'रामराज्य परिषद'** (Ram Rajya Parishad) नामक राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव भी लड़ा। उन्होंने कार्ल मार्क्स की 'दास कैपिटल' को पढ़कर उसका भारतीय दर्शन से खंडन किया।

📌 स्वामी करपात्री जी: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
दीक्षा नाम स्वामी हरिहरानंद सरस्वती
मूल नाम हर नारायण ओझा
जीवन काल 1907 – 7 फरवरी 1982
जन्म स्थान भटनी, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)
गुरु शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती (ज्योतिर्मठ)
संस्थापक अखिल भारतीय रामराज्य परिषद (1948), धर्म संघ
महानतम कृति मार्क्सवाद और रामराज्य (Marxwad aur Ramrajya), वेद स्वरूप विमर्श
प्रसिद्ध आंदोलन गोरक्षा आंदोलन (1966)

2. जीवन परिचय: हर नारायण से करपात्री जी तक

स्वामी करपात्री जी का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में एक सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें वैराग्य के लक्षण थे। 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया, लेकिन 17 वर्ष की आयु में, एक पुत्री के जन्म के पश्चात, उन्होंने गृहत्याग कर दिया।

विद्या और साधना: उन्होंने काशी में रहकर व्याकरण और वेदों का गहन अध्ययन किया। बाद में वे हिमालय चले गए और **ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती** से दंड-संन्यास की दीक्षा ली। उनका नाम **'स्वामी हरिहरानंद सरस्वती'** पड़ा। उनकी विद्वत्ता ऐसी थी कि बड़े-बड़े नैयायिक (Logicians) भी उनसे शास्त्रार्थ करने में घबराते थे।

3. 'कर-पात्री' नाम का रहस्य: अपरिग्रह की पराकाष्ठा

'करपात्री' उनका वास्तविक नाम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी जो उनकी जीवन शैली को दर्शाती थी।

कर + पात्र = करपात्री

कर (Kara): हाथ।
पात्र (Patra): बर्तन।
संन्यास लेने के बाद उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे भोजन के लिए किसी धातु या लकड़ी के बर्तन का उपयोग नहीं करेंगे। वे अपने **हाथों की अंजलि** में ही भिक्षा ग्रहण करते थे और उसी में खाते थे। यह 'अपरिग्रह' (Non-possession) की चरम सीमा थी। वे नंगे पैर चलते थे और कड़ाके की ठंड में भी केवल एक वस्त्र धारण करते थे।

4. रामराज्य परिषद: धर्म आधारित राजनीति

1948 में, स्वतंत्रता के ठीक बाद, स्वामी जी ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया। उन्होंने **'अखिल भारतीय रामराज्य परिषद'** (RRP) की स्थापना की।

उद्देश्य: उनका मानना था कि भारत का संविधान पश्चिमी देशों की नकल पर नहीं, बल्कि भारतीय **स्मृतियों और धर्मशास्त्रों** पर आधारित होना चाहिए।
सफलता: 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 3 सीटें जीतीं और राजस्थान विधानसभा में तो वे मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरे। यह एक संन्यासी की राजनीतिक शक्ति का प्रमाण था। उन्होंने 'हिंदू कोड बिल' का भी तार्किक विरोध किया था।

5. 'मार्क्सवाद और रामराज्य': साम्यवाद को चुनौती

यह स्वामी करपात्री जी के बौद्धिक कौशल का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब भारत में कम्युनिज्म (Communism) का प्रभाव बढ़ रहा था, तो उन्होंने कार्ल मार्क्स की रचनाओं का गहरा अध्ययन किया।

उन्होंने "मार्क्सवाद और रामराज्य" नामक विशाल ग्रंथ लिखा।
- इसमें उन्होंने मार्क्स के 'द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद' (Dialectical Materialism) की धज्जियां उड़ा दीं।
- उन्होंने सिद्ध किया कि मार्क्सवाद केवल 'पेट' (अर्थ) की बात करता है, जबकि 'रामराज्य' पेट के साथ-साथ 'आत्मा' की भी तृप्ति करता है।
- उन्होंने लिखा: "साम्यवाद में व्यक्ति मशीन का पुर्जा बन जाता है, जबकि रामराज्य में हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश देखा जाता है।"

6. 1966 का गोरक्षा आंदोलन: संसद पर ऐतिहासिक प्रदर्शन

7 नवंबर 1966 का दिन भारतीय इतिहास में एक काले दिन के रूप में दर्ज है, और यह स्वामी करपात्री जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष था।

संसद के सामने गोलीकांड

स्वामी करपात्री जी के नेतृत्व में लाखों साधु-संतों ने **'गौहत्या'** पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को लेकर संसद का घेराव किया। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें सैकड़ों साधु मारे गए।

श्राप की कथा: कहा जाता है कि इस हत्याकांड से दुखी होकर स्वामी करपात्री जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को श्राप दिया था कि "जिस गोपाष्टमी के दिन गोभक्तों पर गोली चली है, तुम्हारा अंत भी उसी तिथि के आसपास होगा।" (यह एक जनश्रुति और ऐतिहासिक संदर्भ का विषय है)।

7. साहित्यिक योगदान: वेद स्वरूप विमर्श

स्वामी जी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। उनकी प्रमुख रचनाएं हैं:

  • वेद स्वरूप विमर्श: इसमें उन्होंने महर्षि दयानंद और पाश्चात्य विद्वानों की वेद व्याख्या का खंडन करते हुए सायण और परंपरा-सम्मत अर्थ की स्थापना की।
  • रामायण मीमांसा: इसमें उन्होंने रामायण के ऐतिहासिक और दार्शनिक तथ्यों का विश्लेषण किया।
  • विचार पीयूष: यह उनके दार्शनिक लेखों का संग्रह है।

8. दार्शनिक विचार: वर्णाश्रम और सनातन धर्म

स्वामी करपात्री जी **'सनातन धर्म'** के कट्टर समर्थक थे। उनके विचार आधुनिकतावादियों को रूढ़िवादी लग सकते हैं, लेकिन वे अपने तर्कों में अडिग थे।

  • वर्णाश्रम धर्म: वे मानते थे कि शास्त्र-विहित वर्णाश्रम व्यवस्था समाज के संतुलन के लिए आवश्यक है। उन्होंने इसका वैज्ञानिक और शास्त्रीय आधार प्रस्तुत किया।
  • वेद प्रामाण्य: उनके लिए वेद अंतिम प्रमाण थे। वे उसमें एक मात्रा का भी परिवर्तन स्वीकार नहीं करते थे।

9. निष्कर्ष: धर्म का सूर्य

स्वामी करपात्री जी 1982 में ब्रह्मलीन हुए। वे भारतीय इतिहास के उन विरले महापुरुषों में से थे जिन्होंने सत्ता के गलियारों में रहते हुए भी अपनी लंगोटी तक नहीं छोड़ी।

उन्होंने भारत को याद दिलाया कि **"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, और विश्व का कल्याण हो।"** (यह नारा उन्हीं का प्रचलित किया हुआ है)। वे आधुनिक युग में प्राचीन ऋषि परंपरा के साक्षात विग्रह थे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • मार्क्सवाद और रामराज्य - स्वामी करपात्री जी।
  • वेद स्वरूप विमर्श - स्वामी करपात्री जी।
  • रामायण मीमांसा - स्वामी करपात्री जी।
  • धर्मसम्राट् करपात्री जी: जीवन और दर्शन (गीताप्रेस)।

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