आचार्य अभिनवगुप्त: 'अभिनवभारती', 'लोचन' और रस-सिद्धांत के सर्वोच्च दार्शनिक | Abhinavagupta

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य अभिनवगुप्त: 'अभिनवभारती' और 'लोचन' के महान दार्शनिक

आचार्य अभिनवगुप्त: 'अभिनवभारती', 'लोचन' और रस-सिद्धांत के सर्वोच्च दार्शनिक

एक अत्यंत विस्तृत दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और तंत्र-शास्त्रीय विश्लेषण: प्राचीन भारत का वह रहस्यवादी योगी जिसने 'कला' और 'अध्यात्म' के बीच की दीवार को गिरा दिया, और यह सिद्ध किया कि एक अच्छी कविता पढ़ने से जो आनंद मिलता है, वह योगियों की समाधि (Brahmananda) का सगा भाई (सह-उदर) है।

संस्कृत साहित्य में यदि कोई एक ऐसा नाम है जिसके बिना 'रस' (Aesthetics) और 'ध्वनि' (Suggestion) दोनों का अध्ययन शून्य है, तो वह आचार्य अभिनवगुप्त (Acharya Abhinavagupta) हैं।

वे कोई साधारण साहित्यकार नहीं थे; वे 'त्रिक' और 'कौल' संप्रदाय (Kashmir Shaivism) के सबसे बड़े तांत्रिक गुरु थे। उन्होंने देखा कि जब हम कोई नाटक देखते हैं या कविता पढ़ते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं और हम दुनिया के दुख-दर्द भूल जाते हैं। अभिनवगुप्त ने इस 'सौंदर्यानुभूति' (Aesthetic Experience) का गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया। उन्होंने भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' पर 'अभिनवभारती' और आनंदवर्धन के 'ध्वन्यालोक' पर 'लोचन' नामक टीका लिखकर भारतीय आलोचना-शास्त्र को उसके परम शिखर पर पहुँचा दिया।

📌 आचार्य अभिनवगुप्त: एक ऐतिहासिक एवं दार्शनिक प्रोफाइल
पूरा नाम एवं माता-पिता आचार्य अभिनवगुप्त। पिता का नाम नरसिंहगुप्त (चुखुलक) और माता का नाम विमलकला था। (वे स्वयं को 'योगिनीभू' - अर्थात् योगिनी के गर्भ से उत्पन्न - कहते थे)।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत: 10वीं शताब्दी का उत्तरार्ध और 11वीं का आरंभ (ल. 950 ई. - 1016 ई.)।
ऐतिहासिक प्रमाण: अभिनवगुप्त ने स्वयं अपने ग्रंथों के अंत में रचना-काल दिया है। उन्होंने अपना महान दार्शनिक ग्रंथ 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' लौकिक संवत 4090 (सन् 1014-15 ईस्वी) में पूर्ण किया था। उनके गुरुओं में भट्ट तौत और लक्ष्मणगुप्त शामिल थे।
जन्म स्थान / कर्मभूमि कश्मीर (Kashmir) - प्रवरपुर (वर्तमान श्रीनगर)।
महानतम साहित्यिक भाष्य 1. अभिनवभारती (Abhinavabharati) - भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' पर एकमात्र उपलब्ध और सर्वश्रेष्ठ टीका।
2. ध्वन्यालोक-लोचन (Locana) - आनंदवर्धन के 'ध्वन्यालोक' पर टीका।
महानतम दार्शनिक ग्रंथ तन्त्रालोक (Tantraloka) - कश्मीर शैव दर्शन का विश्वकोश।
मुख्य साहित्यिक सिद्धांत रस का 'अभिव्यक्तिवाद' (Theory of Manifestation) और 'साधारणीकरण' (Universalization)।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: एक 'योगिनी-भू' का जन्म

अभिनवगुप्त के पूर्वज अत्रिगुप्त मूलतः कन्नौज के थे, जिन्हें कश्मीर के राजा ललितादित्य अपने साथ ले गए थे। अभिनवगुप्त जन्म से ही एक असाधारण मेधावी बालक थे। শৈव परंपरा के अनुसार, जिस संतान का जन्म माता-पिता के 'आध्यात्मिक तांत्रिक-मिलन' से होता है, उसे 'योगिनीभू' कहा जाता है, और अभिनवगुप्त ऐसे ही थे।

उनके जीवन में ज्ञान की ऐसी प्यास थी कि उन्होंने न्याय, मीमांसा, बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन, नाट्यशास्त्र और तंत्र के लिए पंद्रह से अधिक गुरुओं की शरण ली। उनके सबसे प्रमुख गुरुओं में लक्ष्मणगुप्त (दर्शन के लिए) और भट्ट तौत (काव्यशास्त्र के लिए) का नाम आता है।

3. 'अभिनवभारती': भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' की एकमात्र चाबी

भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' (2रा शताब्दी ईसा पूर्व) भारतीय रंगमंच का सबसे पुराना ग्रंथ है। लेकिन 10वीं शताब्दी तक आते-आते उसकी भाषा और संकेत इतने क्लिष्ट हो गए थे कि लोग उसका सही अर्थ भूलने लगे थे।

अभिनवगुप्त ने 'अभिनवभारती' नामक टीका लिखकर 'नाट्यशास्त्र' को पुनर्जीवित किया। आज विश्व भर के विद्वान भरतमुनि के नाट्यशास्त्र को 'अभिनवभारती' के चश्मे से ही पढ़ते हैं। यदि अभिनवभारती न होती, तो भरतमुनि का 'रस-सूत्र' आज तक एक अनसुलझी पहेली ही रहता।

4. रस-सूत्र की व्याख्या: 'अभिव्यक्तिवाद' (Manifestation Theory)

भरतमुनि का प्रसिद्ध रस-सूत्र नाट्यशास्त्र का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है। अभिनवगुप्त ने इसी सूत्र की सबसे प्रामाणिक मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की:

विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः। (अर्थ: भरतमुनि के अनुसार—विभाव (कारण), अनुभाव (शारीरिक चेष्टाएं) और व्यभिचारी भावों (अस्थायी मनोभावों) के 'संयोग' से रस की 'निष्पत्ति' होती है।)

इस 'निष्पत्ति' (उत्पत्ति) का अर्थ क्या है? क्या रस बनाया जाता है? अभिनवगुप्त ने अपने 'अभिव्यक्तिवाद' (Abhivyaktivada) में इसे स्पष्ट किया:

रस 'बनता' नहीं, वह 'प्रकट' (Manifest) होता है

अभिनवगुप्त कहते हैं कि प्रेम, क्रोध, भय, शोक—ये सारे भाव (स्थायी भाव) मनुष्य के हृदय में जन्म से ही 'संस्कार' या 'वासना' के रूप में सोए हुए होते हैं।

जब हम नाटक में दुष्यंत और शकुंतला को (विभाव), उनके हाव-भाव (अनुभाव) और मौसम (उद्दीपन) को देखते हैं, तो हमारे हृदय में पहले से सोया हुआ वह 'प्रेम' जागृत (Manifest) हो जाता है। इसी जागृत हुई आनंदमयी अवस्था का नाम 'रस' है। जैसे मिट्टी के बर्तन में पानी डालने से मिट्टी की सोंधी महक अपने आप 'अभिव्यक्त' हो जाती है, वैसे ही काव्य से रस अभिव्यक्त होता है।

5. 'साधारणीकरण' (Universalization): मैं 'मैं' नहीं रहता

रस-सिद्धांत में अभिनवगुप्त का (और भट्ट नायक का) सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक योगदान 'साधारणीकरण' (Sadharanikarana) है।

जब आप सिनेमाघर में कोई दुखद दृश्य देखते हैं, तो आप क्यों रोने लगते हैं? वह दर्द आपका तो नहीं है! अभिनवगुप्त समझाते हैं:
जब हम कला का अनुभव कर रहे होते हैं, तो हमारे अहंकार (Ego) का पर्दा गिर जाता है। दर्शक यह भूल जाता है कि "मैं राम हूँ, या मैं अभिनवगुप्त हूँ, या मंच पर खड़ा व्यक्ति कोई एक्टर है।" उस समय मंच पर जो 'सीता' है, वह केवल एक विशेष स्त्री नहीं रहती, वह 'सार्वभौमिक स्त्री' (Universal Woman) बन जाती है, और दर्शक का 'शोक' एक 'सार्वभौमिक शोक' (Universal Grief) बन जाता है। व्यक्तिगत सीमाओं (I and Mine) का टूटकर 'सार्वभौमिक' (Universal) हो जाना ही साधारणीकरण है।

6. 'ब्रह्मानन्दसहोदरः': कला का आनंद और ईश्वर का आनंद

अभिनवगुप्त ने कला (Aesthetics) को योग और अध्यात्म (Mysticism) के स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया।

सत्त्वोद्रेकादखण्डस्वप्रकाशानन्दचिन्मयः।
... ब्रह्मानन्दसहोदरः॥
(अर्थ: रस की अनुभूति के समय मन में रजोगुण और तमोगुण शांत हो जाते हैं, और केवल 'सत्त्व' का प्रकाश रह जाता है। उस समय जो असीम आनंद प्राप्त होता है, वह 'ब्रह्मानन्दसहोदरः' (Brahmananda Sahodara - ईश्वर प्राप्ति/ब्रह्मानंद का सगा भाई) है।)

अंतर केवल इतना है: योगी का आनंद स्थायी (Permanent) होता है, जबकि दर्शक का आनंद तब तक रहता है जब तक नाटक चल रहा हो या कविता पढ़ी जा रही हो (Temporary)। लेकिन दोनों 'आनंद' की जाति (Quality) बिल्कुल एक है!

7. शांत रस की स्थापना: 9वाँ और सबसे महान रस

नाट्यशास्त्र में केवल 8 रस थे। अभिनवगुप्त ने 'अभिनवभारती' में अत्यंत प्रखर तर्कों के साथ 'शांत रस' (Shanta Rasa) को 9वें रस के रूप में स्थापित किया।

उन्होंने कहा: "शमो नवमो रसः" (शांति/वैराग्य ही नौवां रस है)। इसका स्थायी भाव 'तत्त्व-ज्ञान' (Knowledge of the Ultimate Truth) या निर्वेद है। अभिनवगुप्त के अनुसार, अन्य सभी आठ रस (शृंगार, रौद्र आदि) इसी शांत रस से पैदा होते हैं और अंततः इसी शांत रस में विलीन हो जाते हैं। महाभारत का मुख्य रस भी अभिनवगुप्त ने 'शांत रस' ही माना है।

8. 'ध्वन्यालोक लोचन': आनंदवर्धन के 'ध्वनि-सिद्धांत' को दी गई तीसरी आँख

आनंदवर्धन ने 9वीं सदी में 'ध्वनि' (Suggested Meaning) का सिद्धांत दिया था, लेकिन बाद के आलोचकों (जैसे भट्ट नायक) ने उस पर भयंकर प्रहार किए।

'लोचन' (Locana) का अर्थ है 'आँख'

अभिनवगुप्त ने उन सभी विरोधियों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए 'ध्वन्यालोक' पर 'लोचन' (Locana) नामक टीका लिखी। उन्होंने कहा कि "आनंदवर्धन का ग्रंथ तो प्रकाश (आलोक) के समान है, लेकिन उस प्रकाश को देखने के लिए एक आँख (लोचन) चाहिए, जो मैं आपको दे रहा हूँ।"

लोचन में अभिनवगुप्त ने 'रस-ध्वनि' को सर्वोपरि माना। उन्होंने सिद्ध किया कि जब तक कविता में 'व्यंजना' (Suggestion) के माध्यम से 'रस' की अनुभूति नहीं होती, तब तक वह श्रेष्ठ कविता नहीं है।

9. निष्कर्ष: 1200 शिष्यों के साथ भैरव गुफा में प्रस्थान

आचार्य अभिनवगुप्त का अंत भी उनके जीवन की तरह ही अत्यंत रहस्यमयी और अलौकिक माना जाता है।

कश्मीरी जनश्रुतियों के अनुसार, जब उनका कार्य पूर्ण हो गया, तो वे अपने 1200 शिष्यों के साथ 'भैरव स्तोत्र' (Bhairava Stotra) का गायन करते हुए श्रीनगर के पास बीरवा (भैरव गुफा) नामक एक गुफा में प्रविष्ट हुए और सदेह भगवान शिव में विलीन हो गए। वे फिर कभी बाहर नहीं आए।

अभिनवगुप्त भारतीय मेधा (Indian Intellect) के उस माउंट एवरेस्ट के समान हैं, जहाँ धर्म, दर्शन, तंत्र, व्याकरण और साहित्य आकर एक हो जाते हैं। 'अभिनवभारती' और 'लोचन' के बिना, हम न तो कालिदास का शृंगार समझ पाते और न ही भवभूति की करुणा!


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • अभिनवभारती (नाट्यशास्त्र की टीका) - आचार्य अभिनवगुप्त।
  • ध्वन्यालोक-लोचन - आचार्य अभिनवगुप्त।
  • Abhinavagupta: An Historical and Philosophical Study - K.C. Pandey (अभिनवगुप्त के जीवन और काल का प्रामाणिक शोध)।
  • भारतीय काव्यशास्त्र की रूपरेखा - आचार्य रामचंद्र शुक्ल (रस और साधारणीकरण)।
  • तन्त्रालोक - आचार्य अभिनवगुप्त (कश्मीर शैव दर्शन हेतु)।

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