आचार्य मम्मट: 'काव्यप्रकाश' के प्रणेता, समन्वयवादी आचार्य और काव्यशास्त्र के 'वाग्देवता-अवतार' | Acharya Mammata

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य मम्मट: 'काव्यप्रकाश' और काव्यशास्त्र के समन्वयवादी आचार्य

आचार्य मम्मट: 'काव्यप्रकाश' के प्रणेता और काव्यशास्त्र के 'वाग्देवता-अवतार'

एक अत्यंत विस्तृत दार्शनिक, काव्यशास्त्रीय और समन्वयवादी विश्लेषण: 11वीं शताब्दी के कश्मीर का वह परम मेधावी आचार्य, जिसने भामह से लेकर अभिनवगुप्त तक के सभी बिखरे हुए सिद्धांतों को मथकर एक ऐसा 'अकाट्य संविधान' (Constitution of Poetics) तैयार किया, जिसे आज तक कोई चुनौती नहीं दे सका।

संस्कृत साहित्य में कई आचार्य हुए हैं—भामह ने 'अलंकार' को बड़ा माना, वामन ने 'रीति' को, आनंदवर्धन ने 'ध्वनि' को और कुन्तक ने 'वक्रोक्ति' को। इन सभी संप्रदायों के बीच इतना वैचारिक संघर्ष था कि विद्यार्थियों के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया था कि वास्तव में 'कविता' है क्या?

इस वैचारिक उथल-पुथल को शांत करने के लिए 11वीं शताब्दी में आचार्य मम्मट (Acharya Mammata) का अवतरण हुआ। मम्मट ने किसी नए संप्रदाय की स्थापना नहीं की; इसके बजाय, उन्होंने एक निष्पक्ष 'न्यायाधीश' (Judge) की तरह सभी पूर्ववर्ती ग्रंथों का अध्ययन किया और 'काव्यप्रकाश' (Kavyaprakasha - The Light of Poetry) की रचना की। मम्मट ने 'ध्वनि' को ही काव्य की आत्मा माना, लेकिन अलंकार और गुणों को भी उनका उचित और सम्मानजनक स्थान दिया। उनकी विद्वत्ता इतनी प्रचंड थी कि उन्हें 'वाग्देवता-अवतार' (Incarnation of Goddess Saraswati) कहा जाता है।

📌 आचार्य मम्मट: एक ऐतिहासिक एवं काव्यशास्त्रीय प्रोफाइल
पूरा नाम एवं पिता आचार्य मम्मट (राजानक मम्मट)। इनके पिता का नाम जैयट था। इनके दो भाई 'कैयट' (महाभाष्य के टीकाकार) और 'औवट' (वेद-भाष्यकार) माने जाते हैं।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत: 11वीं शताब्दी ईस्वी का उत्तरार्ध (Late 11th Century CE / लगभग 1050 ई. - 1100 ई.)।
ऐतिहासिक प्रमाण: मम्मट ने अपने ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' में 11वीं शती के पूर्वार्ध में हुए आचार्य महिमभट्ट (व्यक्तिविवेक) और सम्राट भोजराज (सरस्वतीकंठाभरण - मृत्यु 1055 ई.) के मतों का खण्डन किया है। साथ ही 12वीं सदी के आचार्य रुय्यक ने मम्मट का उल्लेख किया है। अतः मम्मट का काल 11वीं सदी के अंतिम भाग में पूर्णतः सिद्ध है।
जन्म स्थान / क्षेत्र कश्मीर (Kashmir) - यह कश्मीरी पंडितों के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा हैं। बाद में इन्होंने काशी (बनारस) में शिक्षा प्राप्त की।
महानतम कृति काव्यप्रकाश (Kavyaprakasha) - 10 'उल्लासों' (अध्यायों) और 142 कारिकाओं का समन्वयवादी ग्रंथ।
समर्थित संप्रदाय ध्वनि संप्रदाय (Dhvani Sampradaya) के परम रक्षक (आनंदवर्धन के अनुयायी)।
उपाधि वाग्देवता-अवतार (सरस्वती के अवतार) और ध्वनिप्रस्थापनपरमाचार्य

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: कश्मीर की महान ज्ञान-परंपरा

आचार्य मम्मट का जन्म कश्मीर के एक अत्यंत सुशिक्षित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जनश्रुति है कि उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा वाराणसी (काशी) में प्राप्त की थी। वे स्वभाव से अत्यंत शांत, दार्शनिक और समन्वयवादी थे।

कहा जाता है कि 'काव्यप्रकाश' का अधिकांश भाग मम्मट ने स्वयं लिखा, लेकिन उनके निधन के कारण 10वें उल्लास (अलंकार प्रकरण) का कुछ अंतिम भाग 'अल्लट' (अलक) नामक विद्वान ने पूरा किया।

3. 'काव्यप्रकाश': 10 उल्लासों का महासागर

मम्मट का 'काव्यप्रकाश' 10 'उल्लासों' (Ullasas / Chapters) में विभक्त है। इस ग्रंथ में तीन भाग हैं: कारिका (सूत्र), वृत्ति (व्याख्या), और उदाहरण (श्लोक)

10 उल्लासों की वैज्ञानिक संरचना

- प्रथम उल्लास: काव्य का प्रयोजन, हेतु और काव्य-लक्षण।
- द्वितीय-तृतीय उल्लास: शब्द-शक्तियाँ (अभिधा, लक्षणा, व्यंजना)।
- चतुर्थ उल्लास: रस-सिद्धांत और ध्वनि के भेद। (यहाँ मम्मट ने अभिनवगुप्त के रस-सिद्धांत को पूर्णतः अपनाया है)।
- पंचम उल्लास: महिमभट्ट के 'अनुमानवाद' का भयंकर खण्डन।
- षष्ठ से दशम उल्लास: चित्रकाव्य, दोष-दर्शन, गुण-विवेचन और अलंकारों (शब्दालंकार व अर्थालंकार) का विस्तृत वर्णन।

4. काव्य-प्रयोजन (Purpose of Poetry): "कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे"

कविता क्यों लिखी जाती है और क्यों पढ़ी जाती है? मम्मट ने प्रथम उल्लास में 'काव्य के 6 प्रयोजन' (Six Purposes of Poetry) गिनाए हैं। यह श्लोक संस्कृत साहित्य का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है:

काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥
(अर्थ: काव्य (1) 'यश' (Fame) के लिए, (2) 'धन' (Wealth) प्राप्ति के लिए, (3) 'व्यावहारिक ज्ञान' (Social behavior) के लिए, (4) 'अमंगलों के नाश' (Destruction of evil) के लिए, (5) पढ़ते ही 'सद्यः परम आनंद' (Instant Supreme Bliss) की प्राप्ति के लिए, और (6) 'कान्ता' (प्रेमिका/पत्नी) के समान मधुर उपदेश देने के लिए होता है।)

मम्मट कहते हैं कि वेद 'प्रभु' (मालिक) की तरह आज्ञा देते हैं (करो या मरो); पुराण 'मित्र' की तरह सलाह देते हैं; लेकिन कविता 'प्रेमिका' (कान्ता) की तरह मीठे शब्दों में मन मोह कर सही मार्ग दिखाती है।

5. मम्मट का काव्य-लक्षण: "तददोषौ शब्दार्थौ..." (काव्य की अमर परिभाषा)

मम्मट ने भामह, वामन और अन्य आचार्यों की परिभाषाओं में जो कमियाँ थीं, उन्हें दूर करते हुए 'काव्य' की अत्यंत सधी हुई और नपी-तुली परिभाषा (Kavya Lakshana) दी:

तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङ्कृती पुनः क्वापि। (अर्थ: वह काव्य है जो दोषों से रहित हो (अदोषौ), गुणों से युक्त हो (सगुणौ), तथा सामान्यतः अलंकारों से सुसज्जित हो, किन्तु यदि कहीं-कहीं स्फुट (स्पष्ट) अलंकार न भी हों, तो भी वह काव्य ही रहता है।)

"अनलङ्कृती पुनः क्वापि": यह मम्मट का मास्टरस्ट्रोक था। पहले के आचार्य (जैसे भामह/जयदेव) कहते थे कि बिना अलंकार के कविता हो ही नहीं सकती। मम्मट ने कहा: "नहीं! यदि कविता में गहरा 'रस' है, तो बिना किसी बाहरी अलंकार (आभूषण) के भी वह कविता उत्तम कहलाएगी।"

6. काव्य के तीन भेद: उत्तम (ध्वनि), मध्यम और अधम (चित्रकाव्य)

मम्मट ने आनंदवर्धन के ध्वनि-सिद्धांत का अनुसरण करते हुए काव्य को तीन श्रेणियों (Three Tiers) में बाँटा:

काव्य का वर्गीकरण (Classification of Poetry)
  • 1. उत्तम काव्य (ध्वनि काव्य / First Rate): "इदममुत्तममतिशयिनि व्यङ्ग्ये वाच्याद् ध्वनिर्बुधैः कथितः।" जहाँ 'सीधे अर्थ' (वाच्यार्थ) से कहीं अधिक सुंदर उसका 'छिपा हुआ अर्थ' (व्यंग्यार्थ/ध्वनि) हो, वह उत्तम काव्य है।
  • 2. मध्यम काव्य (गुणीभूतव्यंग्य / Second Rate): जहाँ छिपा हुआ अर्थ (व्यंग्यार्थ) तो हो, लेकिन वह सीधे अर्थ (वाच्यार्थ) से अधिक सुंदर न हो (अर्थात् व्यंग्यार्थ दब जाए)।
  • 3. अधम काव्य (चित्रकाव्य / Third Rate): "शब्दचित्रं वाच्यचित्रमव्यङ्ग्यं त्ववरं स्मृतम्।" जहाँ कोई छिपा हुआ अर्थ (व्यंग्यार्थ) बिल्कुल न हो; केवल शब्दों की बाजीगरी (अनुप्रास/यमक) या अलंकारों का जाल हो, वह सबसे निम्न (अधम) कोटि का काव्य है।

7. समन्वयवाद: ध्वनि की सर्वोच्चता और विरोधियों (महिमभट्ट) का खण्डन

मम्मट का युग-प्रवर्तक कार्य 'समन्वय' (Synthesis) था। उन्होंने 'व्यक्तिविवेक' के रचयिता महिमभट्ट (जिन्होंने कहा था कि ध्वनि केवल एक 'अनुमान/Logic' है) की धज्जियां उड़ा दीं।

मम्मट ने 5वें उल्लास में अत्यंत तीखे तर्कों से सिद्ध किया कि 'काव्य' विज्ञान या गणित नहीं है कि उसमें आप धुआं देखकर आग का 'अनुमान' लगा लें। कविता का 'व्यंग्यार्थ' (ध्वनि) प्रसंग, वक्ता की नीयत और भावों (Emotions) पर निर्भर करता है, जो 'अनुमान' (Syllogism) की मशीनी प्रक्रिया से कोसों दूर है। मम्मट के इन तर्कों ने महिमभट्ट के अनुमानवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया और 'ध्वनि' को काव्यशास्त्र का निर्विवाद सम्राट घोषित कर दिया।

8. निष्कर्ष: सर्वाधिक टीकाओं वाला महान ग्रंथ

आचार्य मम्मट (11वीं शती) का 'काव्यप्रकाश' संस्कृत साहित्य का वह ग्रंथ है जिस पर श्रीमद्भगवद्गीता के बाद सबसे अधिक टीकाएँ (Commentaries) लिखी गई हैं (लगभग 70 से अधिक)।

संस्कृत विद्वानों में एक कहावत है: "काव्यप्रकाशस्य कृता गृहे-गृहे टीका तथाप्येष तथैव दुर्गमः" (काव्यप्रकाश की हर घर में एक नई टीका लिखी गई है, फिर भी यह उतना ही कठिन और गहरा है)। मम्मट ने अपने इस ग्रंथ से भारतीय आलोचना-शास्त्र को एक ऐसी 'मानक-पुस्तिका' (Standard Manual) दे दी, जिसके बाद सदियों तक किसी नए काव्यशास्त्रीय ग्रंथ की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • काव्यप्रकाश - आचार्य मम्मट (झलकीकर की 'बालबोधिनी' टीका एवं आचार्य विश्वेश्वर कृत हिंदी व्याख्या)।
  • History of Sanskrit Poetics - Dr. P.V. Kane (मम्मट का काल और समन्वयवाद)।
  • भारतीय काव्यशास्त्र की रूपरेखा - आचार्य रामचंद्र शुक्ल।
  • काव्यशास्त्र - डॉ. भगीरथ मिश्र।

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