श्री दुर्गा सप्तशती शापोद्धार | Durga Saptashati Chandika Shap Vimochan

Sooraj Krishna Shastri
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॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

अथ चण्डिका-शाप-विमोचनम् (शापोद्धार)
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्‌यर्थे जपे विनियोगः।
अर्थ: ॐ. इस श्री चण्डिका के ब्रह्मा-वशिष्ठ-विश्वामित्र शापविमोचन मन्त्र के वसिष्ठ-नारद संवाद और सामवेदाधिपति ब्रह्मा ऋषि हैं, सर्वैश्वर्यकारिणी श्री दुर्गा देवता हैं, तीनों चरित्र बीज हैं, ह्रीं शक्ति है और त्रिगुणात्मक स्वरूप वाली चण्डिका के शाप-मुक्ति द्वारा मेरे संकल्पित कार्य की सिद्धि के लिए इसके जप में विनियोग किया जाता है।
ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१॥
अर्थ: हे रेतःस्वरूपिणी! हे मधु-कैटभ का मर्दन करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥२॥
अर्थ: हे बुद्धिस्वरूपिणी! हे महिषासुर की सेना का नाश करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥३॥
अर्थ: हे रक्तस्वरूपिणी! हे महिषासुर का मर्दन करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥४॥
अर्थ: हे क्षुधास्वरूपिणी! हे देवताओं द्वारा वंदित देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥५॥
अर्थ: हे छायास्वरूपिणी! हे (शुम्भ के) दूत से संवाद करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥६॥
अर्थ: हे शक्तिस्वरूपिणी! हे धूम्रलोचन का वध करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥७॥
अर्थ: हे तृषास्वरूपिणी! हे चण्ड-मुण्ड का वध करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥८॥
अर्थ: हे क्षान्तिस्वरूपिणी! हे रक्तबीज का वध करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥९॥
अर्थ: हे जातिस्वरूपिणी! हे निशुम्भ का वध करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१०॥
अर्थ: हे लज्जास्वरूपिणी! हे शुम्भ का वध करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥११॥
अर्थ: हे शान्तिस्वरूपिणी! हे देवताओं द्वारा स्तुति की जाने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१२॥
अर्थ: हे श्रद्धास्वरूपिणी! हे सम्पूर्ण फल प्रदान करने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१३॥
अर्थ: हे कान्तिस्वरूपिणी! हे राजा (सुरथ) को वरदान देने वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१४॥
अर्थ: हे मातृस्वरूपिणी! हे बाधा रहित (अनर्गल) महिमा वाली देवि! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१५॥
अर्थ: हे सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करने वाली माँ दुर्गा! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१६॥
अर्थ: हे अभेद्य कवच स्वरूपिणी माँ शिवा! आपको नमस्कार है। आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१७॥
अर्थ: हे ऋग्वेद स्वरूपिणी माँ काली! आप ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र के शाप से मुक्त हों।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥१८॥
अर्थ: महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्वरूप वाली, तथा तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से युक्त हे दुर्गा देवी! आपको नमस्कार है।
इत्येवं हि महामन्त्रान् पठित्वा परमेश्वर।
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥१९॥

एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः।
आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥२०॥
अर्थ: हे परमेश्वर! इस प्रकार इन महामन्त्रों का पाठ करने के बाद ही दिन या रात में चण्डी-पाठ (सप्तशती का पाठ) करना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं है। जो व्यक्ति इन मन्त्रों को जाने बिना ही चण्डी-पाठ करता है, वह स्वयं को और (पाठ करवाने वाले) यजमान को क्षीण (नष्ट) कर देता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

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