​श्री दुर्गा सप्तशती पाठ विधि एवं सही क्रम | Bhagwat Darshan

Sooraj Krishna Shastri
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॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

प्रामाणिक पाठविधिः (भागवत दर्शन)
॥ आरम्भिक प्रस्तुतियाँ ॥
साधक स्नान करके पवित्र हो आसन-शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके शुद्ध आसन पर बैठे; साथ में शुद्ध जल, पूजन सामग्री और श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक रखे। पुस्तक को अपने सामने काष्ठ (लकड़ी) आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दे। ललाट में अपनी रुचि के अनुसार भस्म, चन्दन अथवा रोली लगा ले, शिखा बाँध ले।

॥ पाठ का सही क्रम ॥

तत्त्व-शुद्धि (आचमन)
पूर्वाभिमुख (पूर्व की ओर मुख) होकर तत्त्व-शुद्धि के लिये चार बार आचमन करे। उस समय निम्नांकित चार मन्त्रों को क्रमशः पढ़े—
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
प्राणायाम एवं पवित्री धारण
तत्पश्चात् प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करे; फिर 'पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ०' इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करे।
सङ्कल्प
हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से विस्तृत संकल्प करे—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकायने महामाङ्गल्यप्रदे मासानाम् उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम् अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ सकलशास्त्रश्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकशर्मा अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गाऽनुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुःपुष्टिधनधान्यसमृद्ध्‌यर्थं श्रीनवदुर्गाप्रसादेन सर्वापद्विनिवृत्तिसर्वाभीष्टफलावाप्तिधर्मार्थकाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकाली-महालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्सरं कवचार्गलाकीलकपाठ-वेदोक्ततन्त्रोक्तरात्रिसूक्तपाठदेव्यथर्वशीर्षपाठ-न्यासविधिसहितनवार्णजपसप्तशतीन्यास-ध्यानसहितचरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च 'मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।' इत्याद्यारभ्य 'सावर्णिर्भविता मनुः' इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदोक्ततन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च करिष्ये।
पुस्तक पूजन एवं पीठ स्थापन
इस प्रकार प्रतिज्ञा (संकल्प) करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की विधि से पुस्तक की पूजा करे। योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करे। फिर मूल नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करे।
शापोद्धार, उत्कीलन और मृतसंजीवनी
श्री दुर्गा सप्तशती के मन्त्रों को महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र और ब्रह्मा जी द्वारा शापित (कीलित) किया गया है। इसलिए कवच, अर्गला और कीलक के पाठ से पूर्व इन मन्त्रों द्वारा सप्तशती का शापोद्धार करना आवश्यक है:
१. शापोद्धार मन्त्र (७ बार जपें)
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा ॥
२. उत्कीलन मन्त्र (२१ बार जपें)
ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा ॥
३. मृतसंजीवनी विद्या (७ बार जपें)
ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा ॥
४. शापविमोचन मन्त्र - मारीचकल्प (१०८ बार जपें)
ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं ॥
नोट-१: इस शापोद्धार प्रक्रिया के पश्चात् ही साधक को 'देवी कवच' का पाठ आरम्भ करना चाहिए। पहले तीन मन्त्रों का जप पाठ के आरम्भ और अन्त दोनों में होता है, जबकि चौथे मन्त्र का केवल आरम्भ में।
नोट-२: इसके स्थान पर आरम्भ में केवल "रुद्रयामल तन्त्र" में वर्णित इस शापोद्धार स्तोत्र मन्त्र का पाठ करें 👉शापोद्धार स्तोत्र मन्त्र "रुद्रयामल तन्त्र"
कवच, अर्गला और कीलक पाठ
सुरक्षा और कामना पूर्ति हेतु सबसे पहले 'देवी कवच', फिर 'अर्गला स्तोत्र' और अंत में 'कीलक स्तोत्र' का पाठ करें।
अंगन्यास व करन्यास करके माता का ध्यान करें। 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' मन्त्र की एक माला (१०८ बार) जपें। फिर 'रात्रिसूक्त' (तन्त्रोक्त या वेदोक्त) का पाठ करें।
मुख्य सप्तशती पाठ (१ से १३ अध्याय)
अब दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय से लेकर त्रयोदश (१३वें) अध्याय तक का क्रमबद्ध पाठ करें। प्रत्येक चरित्र के आरम्भ में विनियोग और माता का ध्यान अवश्य पढ़ें।
Maa durga image
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नवार्ण मन्त्र जप एवं देवीसूक्त
अध्याय पूर्ण होने के पश्चात् पुनः नवार्ण मन्त्र का १०८ बार जप करें। फिर माता की स्तुति हेतु 'देवीसूक्त' का पाठ करें।
१० रहस्य त्रय, क्षमा प्रार्थना एवं कुंजिका स्तोत्र
समय अनुसार तीनों रहस्यों (प्राधानिक, वैकृतिक, मूर्ति) का पाठ करें। फिर 'देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र' पढ़कर माता से क्षमा मांगें। संपूर्ण फल प्राप्ति हेतु 'सिद्ध कुंजिका स्तोत्र' का पाठ करें। अंत में माता की आरती करें।

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