श्री नवार्ण मन्त्र विधि एवं सप्तशती न्यास व ध्यान | Navarna Mantra Saptashati Nyasa

Sooraj Krishna Shastri
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॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

नवार्ण मन्त्र विधि एवं सप्तशती न्यास
॥ अथ नवार्णविधिः ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्माविष्णुरुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
अर्थ: हाथ में जल लेकर इस मन्त्र का उच्चारण करें और जल को भूमि पर छोड़ दें।
॥ करन्यासः ॥
(दिए गए मन्त्र को बोलते हुए अपने हाथों की उंगलियों का स्पर्श करें)
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
(दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अंगूठों के मूल को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।
(अंगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः।
(अंगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः।
(अंगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
(अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका/छोटी उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
(हथेलियों और उनके पिछले भाग को आपस में स्पर्श करें)
॥ हृदयादि न्यासः ॥
(मन्त्र बोलते हुए दाहिने हाथ से शरीर के अंगों का स्पर्श करें)
ॐ ऐं हृदयाय नमः।
(दाहिने हाथ की पाँचों उंगलियों से हृदय को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।
(दाहिने हाथ से सिर को स्पर्श करें)
ॐ क्लीं शिखायै वषट्।
(दाहिने हाथ से शिखा/चोटी को स्पर्श करें)
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम्।
(दोनों हाथों को क्रॉस करके दोनों कंधों/छाती का स्पर्श करें)
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्।
(दाहिने हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से दोनों आँखों और मस्तक का स्पर्श करें)
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्।
(सिर के ऊपर से हाथ घुमाकर 'फट्' बोलते हुए ताली बजाएं)
॥ अक्षर न्यासः ॥
(नवार्ण मन्त्र के एक-एक अक्षर का शरीर में न्यास करें)
ॐ ऐं नमः शिखायाम्। (शिखा में)
ॐ ह्रीं नमः दक्षिणनेत्रे। (दाहिनी आँख में)
ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे। (बाईं आँख में)
ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे। (दाहिने कान में)
ॐ मुं नमः वामकर्णे। (बाएं कान में)
ॐ डां नमः दक्षिणनासापुटे। (दाहिनी नाक में)
ॐ यैं नमः वामनासापुटे। (बाईं नाक में)
ॐ विं नमः मुखे। (मुख में)
ॐ च्चें नमः गुह्ये। (गुह्य भाग में)
॥ नवार्ण ध्यानम् ॥
(हाथ में पुष्प लेकर माता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का ध्यान करें)
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं सन्दधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥१॥
अर्थ (महाकाली): भगवान विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिए ब्रह्माजी ने जिनकी स्तुति की थी, उन महाकाली देवी का मैं ध्यान करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं और शरीर की कांति नीलमणि के समान है।
अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुः कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रवालप्रभां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥२॥
अर्थ (महालक्ष्मी): मैं कमल के आसन पर विराजमान और महिषासुर का मर्दन करने वाली महालक्ष्मी देवी का सेवन करता हूँ। वे अपने हाथों में रुद्राक्ष माला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और सुदर्शन चक्र धारण करती हैं। उनके शरीर की कांति लाल मूंगे के समान है।
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् ।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ॥३॥
अर्थ (महासरस्वती): जो अपने हाथों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, जिनकी कांति शरत्काल के चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है, जो गौरी के शरीर से प्रकट हुई हैं और शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं, उन महासरस्वती देवी का मैं ध्यान करता हूँ।
(ध्यान के पश्चात् पुष्प माता को अर्पित कर दें।)
॥ माला पूजन एवं प्रार्थना ॥
(फिर 'ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः' इस मन्त्र से माला की पूजा करके प्रार्थना करे-)
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥

ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे ।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये ॥

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।
अर्थ: हे अक्षमाले! आपको नमस्कार है। हे महामाया स्वरूपिणी माले! आप सभी शक्तियों की स्वरूपा हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— ये चारों पुरुषार्थ आप में ही स्थित हैं, इसलिए आप मुझे सिद्धि प्रदान करने वाली हों। हे माले! आप मेरे कार्यों को निर्विघ्न करें, मैं आपको अपने दाहिने हाथ में ग्रहण कर रहा हूँ। जप के समय मेरी सिद्धि के लिए आप मुझ पर प्रसन्न हों।
(इसके पश्चात् 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' मन्त्र की 1 माला (108 बार) जप करें।)
॥ जप समर्पण ॥
(जप पूरा होने पर दाहिने हाथ में जल/अक्षत लेकर निम्न श्लोक पढ़ते हुए वह जल भगवती के दाहिने हाथ में अर्पित कर दें)
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥
अर्थ: हे परमेश्वरि! आप अत्यंत गुप्त से भी गुप्त रहस्यों की रक्षा करने वाली हैं। आप मेरे द्वारा किए गए इस जप को ग्रहण करें। हे देवि! आपकी कृपा से मुझे पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो।

॥ अथ सप्तशती-न्यासः ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ प्रथममध्यमोत्तरचरित्राणां ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, नन्दाशाकम्भरीभीमाः शक्तयः, रक्तदन्तिकादुर्गाभ्रामर्यो बीजानि, अग्निवायुसूर्यास्तत्त्वानि, ऋग्यजुःसामवेदा ध्यानानि, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठे विनियोगः।
अर्थ: हाथ में जल लेकर इस मन्त्र का उच्चारण करें और जल भूमि पर छोड़ दें।
॥ करन्यासः ॥
ॐ खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा। शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा॥ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
(दोनों अंगूठों का स्पर्श करें)
ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिस्वनेन च॥ तर्जनीभ्यां नमः।
(दोनों तर्जनी उंगलियों का स्पर्श करें)
ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे। भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥ मध्यमाभ्यां नमः।
(दोनों मध्यमा उंगलियों का स्पर्श करें)
ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते। यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥ अनामिकाभ्यां नमः।
(दोनों अनामिका उंगलियों का स्पर्श करें)
ॐ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥ कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
(दोनों कनिष्ठिका उंगलियों का स्पर्श करें)
ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
(हथेलियों और उनके पिछले भाग का स्पर्श करें)
॥ हृदयादि न्यासः ॥
ॐ खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा। शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा॥ हृदयाय नमः।
(हृदय का स्पर्श करें)
ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिस्वनेन च॥ शिरसे स्वाहा।
(सिर का स्पर्श करें)
ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे। भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥ शिखायै वषट्।
(शिखा/चोटी का स्पर्श करें)
ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते। यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥ कवचाय हुम्।
(दोनों हाथों को क्रॉस करके कंधों का स्पर्श करें)
ॐ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥ नेत्रत्रयाय वौषट्।
(दोनों आँखों और मस्तक का स्पर्श करें)
ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ अस्त्राय फट्।
(सिर के ऊपर से हाथ घुमाकर ताली बजाएं)
॥ ध्यानम् ॥
(सप्तशती न्यास के पश्चात् इस श्लोक से माता का ध्यान करें)
विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम् ।
हस्तैश्चक्रगदासिचर्मविशिखां चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ॥
अर्थ: मैं तीन नेत्रों वाली दुर्गा देवी का ध्यान करता हूँ, जिनकी प्रभा बिजली के समान है, जो सिंह के कंधे पर विराजमान हैं और भयंकर प्रतीत होती हैं। हाथों में तलवार और ढाल लिए हुए कन्याएं उनकी सेवा कर रही हैं। वे अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किए हुए हैं। उनका स्वरूप अग्नि के समान तेजोमय है और वे मस्तक पर चंद्रमा धारण करती हैं।

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