वेदोक्त एवं तन्त्रोक्त देवीसूक्त | Vedokta Tantrokta Devi Suktam

Sooraj Krishna Shastri
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॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

वेदोक्त एवं तन्त्रोक्त देवीसूक्तम्
॥ ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम् ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ अहमित्यष्टर्चस्य सूक्तस्य वागाम्भृणी ऋषिः, सच्चित्सुखात्मकः सर्वगतः परमात्मा देवता,द्वितीयाया ऋचो जगती, शिष्टानां त्रिष्टुप् छन्दः, देवीमाहात्म्यपाठे विनियोगः।
॥ ध्यानम् ॥
ॐ सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः
शङ्खं चक्रधनुःशराश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता ।
आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीगुणानूपुरा
दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला ॥
अर्थ: जो सिंह की पीठ पर विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है, जो मरकतमणि के समान कान्तिवाली अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, तीन नेत्रों से सुशोभित होती हैं; जिनके भिन्न-भिन्न अंग बाजूबंद, हार, कंगन, खनखनाती हुई करधनी और झंकार करते हुए नूपुरों से विभूषित हैं तथा जिनके कानों में रत्नजड़ित कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करने वाली हों।
ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरा-
म्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।
अहं मित्रावरुणावुभौ बिभ-
र्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ ॥१॥
अर्थ: [महर्षि अम्भृण की कन्या 'वाक्' नाम की ब्रह्मवादिनी थी, उसने ईश्वर के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लिया था। उसके ये उद्गार हैं—] मैं सच्चिदानन्दमयी सर्वेश्वर रूप होकर ग्यारह रुद्रों, आठ वसुओं, बारह आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में विचरती हूँ। मैं ही मित्र और वरुण दोनों को, इन्द्र और अग्नि को तथा दोनों अश्विनीकुमारों को धारण करती हूँ।
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं
त्वष्टारमुत पूषणं भगम् ।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते
सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ॥२॥
अर्थ: मैं ही शत्रुओं का नाश करने वाले सोम को, त्वष्टा को तथा प्रजापति और भग को धारण करती हूँ। जो हविष्य से सम्पन्न होकर देवताओं को उत्तम हवि अर्पण करता है तथा जो सोम रस तैयार करता है, उस यजमान के लिए मैं ही उत्तम यज्ञ का फल और धन प्रदान करती हूँ।
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां
चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा
भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥३॥
अर्थ: मैं सम्पूर्ण जगत् की अधीश्वरी, अपने उपासकों को धन की प्राप्ति कराने वाली, साक्षात् ब्रह्मरूप परमात्म-पद को अपने अभिन्न रूप में जानने वाली तथा पूजनीय देवताओं में प्रधान हूँ। मैं प्रपञ्च रूप से अनेक रूपों में स्थित हूँ। सम्पूर्ण भूतों में मेरा प्रवेश है। अनेक स्थानों पर रहने वाले देवता जहाँ-कहीं जो कुछ भी करते हैं, वह सब मेरे लिए करते हैं।
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति
यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् ।
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति
श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि ॥४॥
अर्थ: जो अन्न खाता है, वह मेरी शक्ति से ही खाता है। जो देखता है, जो साँस लेता है और जो कही हुई बात सुनता है, वह मेरी ही सहायता से सब कार्य करने में समर्थ होता है। जो मुझे इस रूप में नहीं जानते, वे न जानने के कारण ही दीन-दशा को प्राप्त होते हैं। हे बहुश्रुत! मैं तुम्हें श्रद्धा से प्राप्त होने वाले ब्रह्मतत्त्व का उपदेश करती हूँ, सुनो—
अहमेव स्वयमिदं वदामि
जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः ।
यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि
तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥५॥
अर्थ: मैं स्वयं ही देवताओं और मनुष्यों द्वारा सेवित इस सुलभ तत्त्व का वर्णन करती हूँ। मैं जिस-जिस पुरुष की रक्षा करना चाहती हूँ, उसको सबकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बना देती हूँ। उसे ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, परोक्ष ज्ञानसम्पन्न ऋषि तथा उत्तम मेधाशक्ति युक्त बनाती हूँ।
अहं रुद्राय धनुरा तनोमि
ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ ।
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं
द्यावापृथिवी आ विवेश ॥६॥
अर्थ: मैं ही ब्रह्मज्ञानियों से द्वेष करने वाले हिंसक असुरों का वध करने के लिए रुद्र के धनुष को चढ़ाती हूँ। मैं ही शरणागतों की रक्षा के लिए शत्रुओं से युद्ध करती हूँ तथा आकाश और पृथ्वी— सबमें व्याप्त होकर रहती हूँ।
अहं सुवे पितरमस्य मूर्ध-
न्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ।
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वो-
तामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ॥७॥
अर्थ: मैं ही इस जगत् के पिता (आकाश) को इसके मस्तक पर उत्पन्न करती हूँ। मेरा कारण समुद्र (ब्रह्म-चैतन्य) में है। वहीं से मैं समस्त भुवनों में व्याप्त हूँ और उस उच्च स्वर्ग को भी अपने विस्तार (शरीर) से स्पर्श करती हूँ।
अहमेव वात इव प्रवाम्या-
रभमाणा भुवनानि विश्वा ।
परो दिवा पर एना पृथिव्यै
तावती महिना सम्बभूव ॥८॥
अर्थ: जब मैं समस्त लोकों की रचना आरम्भ करती हूँ, तब दूसरों की प्रेरणा के बिना स्वयं ही वायु की भाँति चलती हूँ। मैं इस स्वर्ग और पृथ्वी से भी परे हूँ— ऐसी मैं अपनी महिमा से ही प्रकट हुई हूँ।
॥ तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीतन्त्रोक्तदेवीसूक्तस्य शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं पाठे विनियोगः।
अर्थ: ॐ. इस श्री तन्त्रोक्त देवीसूक्त के शिव ऋषि हैं, अनुष्टुप् छंद है, श्री महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता हैं, और श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए इसके पाठ का विनियोग किया जाता है।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥१॥

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः ।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥२॥
अर्थ: देवता बोले - देवी को नमस्कार है, महादेवी को नमस्कार है। कल्याणमयी शिवा को हमारा निरंतर नमस्कार है। मंगलकारिणी मूल प्रकृति को हम नियमपूर्वक प्रणाम करते हैं। रौद्रा (भयंकर रूपा) को नमस्कार है। नित्य, गौरी और धात्री (जगत को धारण करने वाली) को बारम्बार नमस्कार है। चांदनी, चन्द्ररूपिणी और सुखरूपा देवी को हमारा निरंतर नमस्कार है।
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः ।
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥३॥

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥४॥
अर्थ: कल्याणमयी, वृद्धि (समृद्धि) और सिद्धि रूपा देवी को हम प्रणाम करते हैं। नैर्ऋती (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाओं की राजलक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्नी) स्वरूपा आपको बार-बार नमस्कार है। दुर्गा, दुर्गपारा (कठिनाइयों से पार उतारने वाली), सारा (सबका सार), सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रा रूपा देवी को सदा नमस्कार है।
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः ।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥५॥
अर्थ: अत्यंत सौम्य और अत्यंत भयंकर (रौद्र) रूप वाली उन देवी को हम नमस्कार करते हैं। जगत् की प्रतिष्ठा (आधार) रूपा और कृति (कर्म) रूपा देवी को हमारा बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥६॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'विष्णुमाया' के नाम से कही जाती हैं, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार है, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥७॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'चेतना' (चेतन सत्ता) कहलाती हैं, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार है, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥८॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'बुद्धि' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार है, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥९॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'निद्रा' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१०॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'क्षुधा' (भूख) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥११॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'छाया' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१२॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'शक्ति' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१३॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'तृष्णा' (प्यास/इच्छा) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१४॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'क्षान्ति' (क्षमा) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१५॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'जाति' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१६॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'लज्जा' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१७॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'शान्ति' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१८॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'श्रद्धा' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥१९॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'कान्ति' (चमक/सौन्दर्य) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२०॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'लक्ष्मी' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२१॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'वृत्ति' (आजीविका/स्वभाव) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२२॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'स्मृति' (याद) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२३॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'दया' रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२४॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'तुष्टि' (संतोष) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२५॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'माता' के रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार है, उनको बारम्बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२६॥
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में 'भ्रान्ति' (भ्रम) रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार है, उनको बारम्बार नमस्कार है।
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या ।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः ॥२७॥
अर्थ: जो सभी प्राणियों की इन्द्रियों को वश में करने वाली (अधिष्ठात्री) हैं और जो सभी प्राणियों में सदा व्याप्त रहती हैं, उन व्याप्ति देवी को बारम्बार नमस्कार है।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२८॥
अर्थ: जो देवी चेतना (चिति) के रूप में इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार है, उनको नमस्कार है, उनको बारम्बार नमस्कार है।
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्
तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥२९॥
अर्थ: पूर्वकाल में अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए देवताओं ने जिनकी स्तुति की थी और देवराज इन्द्र ने भी बहुत दिनों तक जिनका सेवन (पूजन) किया था, वे कल्याण का कारणभूत ईश्वरी (भगवती) हमारा कल्याण करें, मंगल करें और हमारी सभी विपत्तियों को नष्ट कर दें।
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-
रस्माभिरीशा सुरैर्नम्यते ।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः
सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥३०॥
अर्थ: जिन परमेश्वरी को इस समय उद्दण्ड दैत्यों (शुम्भ-निशुम्भ) से सताए हुए हम सभी देवता नमस्कार कर रहे हैं, तथा भक्तिपूर्वक झुके हुए शरीरों वाले हम लोगों द्वारा स्मरण किए जाने पर जो इसी क्षण हमारी सभी विपत्तियों को नष्ट कर देती हैं (वे जगदम्बा हम पर प्रसन्न हों)।

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