सम्राट भोजराज: 'सरस्वतीकंठाभरण', 'शृंगारप्रकाश' और 'अहंकार' का रस-सिद्धांत | King Bhoja

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
सम्राट भोजराज: 'सरस्वतीकंठाभरण' और 'शृंगारप्रकाश' के प्रणेता

सम्राट भोजराज: 'सरस्वतीकंठाभरण', 'शृंगारप्रकाश' और 'अहंकार' का रस-सिद्धांत

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, काव्यशास्त्रीय और दार्शनिक विश्लेषण: मालवा का वह चक्रवर्ती सम्राट और 'पॉलीमैथ' (Polymath), जिसने केवल तलवार से युद्ध नहीं जीते, बल्कि जिसने योग, व्याकरण, वास्तुकला और काव्यशास्त्र पर विश्व के सबसे विशाल ग्रंथ रचे, और यह सिद्ध किया कि मानव का 'अहंकार' (Self-consciousness) ही समस्त भावनाओं (रसों) की एकमात्र जड़ है।

भारतीय इतिहास में अनेक राजा हुए जिन्होंने विद्वानों को आश्रय दिया (जैसे विक्रमादित्य, हर्षवर्धन)। लेकिन सम्राट भोजराज (King Bhoja of Dhar) का स्थान उन सबसे भिन्न है। वे केवल आश्रयदाता नहीं थे; वे स्वयं एक 'कविराज' और 'सर्वविद्या-विशारद' थे।

उन्होंने जलयान निर्माण (Ship-building) से लेकर आयुर्वेद तक और व्याकरण से लेकर काव्यशास्त्र तक 84 से अधिक ग्रंथों की रचना की। काव्यशास्त्र (Poetics) के क्षेत्र में उनके दो ग्रंथ—'सरस्वतीकंठाभरण' और 'शृंगारप्रकाश'—भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे विशाल महासागर हैं, जिनमें पूर्ववर्ती सभी आचार्यों (भामह, दण्डी, वामन, आनंदवर्धन) के विचार समाहित हो जाते हैं।

📌 सम्राट भोजराज: एक ऐतिहासिक एवं काव्यशास्त्रीय प्रोफाइल
पूरा नाम एवं वंश सम्राट भोजराज (राजा भोज)। वे मालवा के परमार (पंवार) वंश के सबसे प्रतापी शासक थे। उनके पिता का नाम राजा सिंधुराज और चाचा का नाम वाक्पति मुंज था।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत: 11वीं शताब्दी ईस्वी का पूर्वार्ध (First half of 11th Century CE / 1010 ई. - 1055 ई.)।
ऐतिहासिक प्रमाण: राजा भोज के अनेक दानपत्र और शिलालेख (Epigraphic records) प्राप्त हुए हैं (जैसे बांसवाड़ा और उज्जैन के शिलालेख), जो 1010 ई. से लेकर 1055 ई. तक उनके शासनकाल की अकाट्य पुष्टि करते हैं।
राजधानी धारानगरी (Dhar, Madhya Pradesh)
महानतम काव्यशास्त्रीय ग्रंथ 1. सरस्वतीकंठाभरण (Sarasvatikanthabharanam) - व्याकरण और काव्यशास्त्र का विश्वकोश।
2. शृंगारप्रकाश (Shringaraprakasha) - 36 प्रकाशों (अध्यायों) का संस्कृत का सबसे बड़ा लक्षण ग्रंथ।
अन्य प्रमुख विषयगत ग्रंथ समराङ्गणसूत्रधार (वास्तुकला/Architecture), पातञ्जलयोगसूत्रवृत्ति (योग), आयुर्वेदसर्वस्व (चिकित्सा)।
काव्यशास्त्र का महा-सिद्धांत अहंकार-रस सिद्धांत: "शृंगार (अहंकार) ही एकमात्र रस है।"

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: मालवा का स्वर्ण युग

राजा भोज का काल मध्यकालीन भारतीय इतिहास का 'स्वर्ण युग' (Golden Age of Malwa) माना जाता है। वे एक अजेय योद्धा थे जिन्होंने चालुक्यों, कलचुरियों और तुर्क आक्रमणकारियों (महमूद गजनवी के भतीजे सालार मसूद) के विरुद्ध भयंकर युद्ध लड़े।

लेकिन युद्ध के मैदान से लौटकर वे सीधे 'सरस्वती-उपासना' में लग जाते थे। उन्होंने अपनी राजधानी 'धारानगरी' को विद्वानों का मक्का (Mecca of Scholars) बना दिया था। एक प्रसिद्ध जनश्रुति है कि राजा भोज के राज्य में लकड़हारे और जुलाहे भी संस्कृत में श्लोक बोलते थे।

3. 'सरस्वतीकंठाभरण': देवी सरस्वती का आभूषण

भोजराज का पहला काव्यशास्त्रीय ग्रंथ 'सरस्वतीकंठाभरण' (The Necklace of Goddess Saraswati) है। यह 5 परिच्छेदों (अध्यायों) का ग्रंथ है।

काव्य की समग्र परिभाषा

भोजराज ने पूर्ववर्ती सभी आचार्यों (भामह, दण्डी, वामन) के सिद्धांतों को मिलाकर काव्य की एक 'परफेक्ट' (Perfect) परिभाषा दी:

निर्दोषं गुणवत् काव्यमलंकारैरलंकृतम्।
रसान्वितं कविः कुर्वन् कीर्तिं प्रीतिं च विन्दति॥
(अर्थ: जो काव्य दोषों से रहित हो, गुणों से युक्त हो, अलंकारों से सजा हुआ हो, और रस से पूर्ण हो—ऐसे काव्य की रचना करने वाला कवि इस संसार में 'कीर्ति' (Fame) और 'प्रीति' (Love/Joy) दोनों को प्राप्त करता है।)

इसमें भोजराज ने 'दोष-त्याग', 'गुण-ग्रहण', 'अलंकार-योजना' और 'रस-निष्पत्ति'—इन चारों को कविता के लिए अनिवार्य बताकर एक महान समन्वय (Synthesis) स्थापित किया।

4. 'शृंगारप्रकाश': संस्कृत काव्यशास्त्र का सबसे विशाल ग्रंथ

भोजराज की कीर्ति का सबसे बड़ा स्तंभ उनका 'शृंगारप्रकाश' (Shringaraprakasha) है। यह पूरे संस्कृत साहित्य का सबसे विशाल लक्षण-ग्रंथ है, जिसमें 36 प्रकाश (Chapters) हैं।

इसके पहले 8 अध्यायों में व्याकरण और भाषा-विज्ञान (व्याकरण-दर्शन) का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण है। 9वें से 12वें अध्याय तक नाट्यशास्त्र (नाटक के नियम) हैं, और शेष 24 अध्यायों में 'रस' (विशेषकर शृंगार रस) का विस्तृत मनोवैज्ञानिक वर्णन है। आधुनिक युग में डॉ. वी. राघवन (Dr. V. Raghavan) ने अपने जीवन के कई दशक केवल इस एक ग्रंथ को संपादित करने और समझने में लगा दिए थे।

5. भोजराज का क्रान्तिकारी दर्शन: 'अहंकार' ही 'शृंगार' है

भरतमुनि और अभिनवगुप्त ने 8 या 9 रस माने थे। लेकिन भोजराज ने एक अत्यंत क्रांतिकारी दार्शनिक सिद्धांत दिया। उन्होंने कहा: "शृङ्गार एव एको रसः" (शृंगार ही एकमात्र रस है)।

शृंगार का नया अर्थ: 'अहंकार' (Self-Consciousness)

भोजराज के लिए 'शृंगार' का अर्थ केवल 'स्त्री-पुरुष का प्रेम' नहीं है। वे 'शृंग' (Shringa - Peak/शिखर) शब्द को पकड़ते हैं।

वे कहते हैं कि मनुष्य के भीतर जो 'मैं' (Self/I-ness) का भाव है, जिसे दर्शनशास्त्र में 'अहंकार' (Ahamkara) या 'अभिमान' (Abhimana) कहते हैं, वही आत्मा का सर्वोच्च गुण है। यदि आपमें 'अहंकार' (चेतना) नहीं है, तो आप पत्थर के समान हैं।

जब आत्मा अपने इस 'अहंकार' (चेतना) के चरम शिखर पर पहुँचती है, तो उसे 'शृंगार' कहते हैं। इसी मूल 'अहंकार' से बाद में प्रेम (रति), क्रोध, करुणा आदि भाव पैदा होते हैं। इसलिए भोज कहते हैं:
"शृङ्गारमेवमेकमाभिमानिकमामनन्ति..." (मैं उस एकमात्र अभिमान/अहंकार को ही शृंगार और रस मानता हूँ)। यह फ्रायडियन मनोविज्ञान (Freudian Psychology of the Ego) से भी 800 साल पुरानी और गहरी थ्योरी है।

6. पूर्ववर्ती आचार्यों के सिद्धांतों का समन्वय (Synthesis)

भोजराज एक कट्टरतावादी (Dogmatic) आचार्य नहीं थे। जहाँ 'व्यक्तिविवेक' के रचयिता महिमभट्ट ने 'ध्वनि' का खण्डन किया, वहीं भोजराज ने बड़ी उदारता से अलङ्कार, रीति, रस और ध्वनि—इन सभी को अपने विशाल 'शृंगारप्रकाश' में स्थान दिया।

उन्होंने माना कि ध्वनि (व्यंजना) का अपना महत्व है, लेकिन वह 'अहंकार-रूपी रस' से बड़ी नहीं हो सकती। उन्होंने 'तात्पर्य' (कवि का मूल उद्देश्य) को भी एक वृत्ति माना। उनका ग्रंथ एक ऐसे महासागर के समान है जिसमें भारत की सभी नदियाँ (सिद्धांत) आकर मिल जाती हैं।

7. भोजशाला: धारानगरी का प्राचीन विश्वविद्यालय

राजा भोज के साहित्यिक योगदान को समझने के लिए 'भोजशाला' (Bhojshala) का उल्लेख अनिवार्य है। उन्होंने धारानगरी में देवी सरस्वती (वाग्देवी) का एक अत्यंत भव्य मंदिर और एक संस्कृत विश्वविद्यालय बनवाया था, जिसे भोजशाला कहा जाता था।

यहाँ पूरे भारत से विद्वान आकर शास्त्रार्थ करते थे। इसी भोजशाला की दीवारों पर 'पारिजातमंजरी' जैसे नाटक उकेरे गए थे। वाग्देवी (सरस्वती) की जो विश्वप्रसिद्ध मूर्ति आज लंदन के म्यूजियम में है, वह इसी भोजशाला की अधिष्ठात्री देवी थीं।

8. निष्कर्ष: "अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती"

सम्राट भोजराज (11वीं शती) भारतीय इतिहास के एक ऐसे 'आदर्श शासक' और 'आदर्श विद्वान' थे, जिनकी तुलना केवल मिथकीय राजा 'विक्रमादित्य' से की जा सकती है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि एक राजा केवल शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी 'प्रज्ञा' (Intellect) से युगों तक अमर रहता है।

जब राजा भोज का निधन हुआ, तो भारतीय विद्वत समाज अनाथ हो गया। उस समय एक कवि ने रोते हुए जो श्लोक कहा था, वह भारतीय साहित्य के इतिहास का सबसे रुला देने वाला श्रद्धांजलि-श्लोक (Tribute) है:

अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।
पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते॥
(अर्थ: राजा भोज के स्वर्ग सिधार जाने पर, आज धारानगरी 'निराधार' (बिना आधार की) हो गई है। स्वयं देवी सरस्वती 'निरालंब' (बिना सहारे की) हो गई हैं, और विश्व के सभी पंडित (विद्वान) खंडित (टूट कर बिखर) गए हैं।)

भोजराज का 'सरस्वतीकंठाभरण' और 'शृंगारप्रकाश' आज भी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वह धारानगरी और वह राजा भले ही समय के साथ मिट गए हों, लेकिन उनकी 'कीर्ति' और 'विद्या' आज भी भारतीय संस्कृति के कंठ का सबसे चमकता हुआ आभूषण है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • सरस्वतीकण्ठाभरणम् - सम्राट भोजराज (संस्कृत मूल एवं हिंदी अनुवाद)।
  • Bhoja's Sringara Prakasha - Dr. V. Raghavan (शृंगारप्रकाश पर विश्व का सबसे प्रामाणिक शोध ग्रंथ)।
  • History of Sanskrit Poetics - Dr. P.V. Kane (भोजराज का काल-निर्धारण और सिद्धांत)।
  • संस्कृत साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!