Shraddha Me Kela Khana Chahiye Ya Nahi: श्राद्ध में कदली फल (केला) का महत्त्व और शास्त्रीय प्रमाण

Sooraj Krishna Shastri
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श्राद्ध कर्म में केले का महत्त्व

"क्या श्राद्ध में कदली फल (केला) और कदली पत्र का उपयोग वर्जित है? जानें शास्त्रों का प्रामाणिक सत्य"

सम्मान्य धर्मनिष्ठ मित्रामित्रो! आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया (फेसबुक आदि) पर कई विद्वानों एवं अविद्वानों ने श्राद्धकर्म में 'कदलीफल' (केले) का विरोध किया है। शास्त्ररूपी कल्पवृक्ष में देश, काल, पात्र और परिस्थिति के भेद से विविध वचन प्राप्त होते हैं। आइए, पहले निषेधपरक वचनों (मनाही) को देखते हैं और फिर धर्मशास्त्रों के आधार पर इसके प्राशस्त्य (विधान) की स्थापना करते हैं।

🚫 श्राद्ध में केले का निषेध बताने वाले वचन (और उनका भ्रांति-निवारण)

कुछ विशेष पुस्तकों और श्लोकों के आधार पर यह भ्रांति फैली है कि श्राद्ध में केले का प्रयोग नहीं करना चाहिए:

१. अन्त्यकर्म श्राद्धप्रकाश (गीताप्रेस): इसके पृष्ठ 299 पर पार्वण श्राद्ध की सामग्री-सूची में बिना किसी मूल प्रमाण वाक्य के केले का निषेध लिखा है। इसे ही आधार मानकर कई लोग भ्रमित हो जाते हैं।
२. श्राद्धचन्द्रिका (भोजनपत्र प्रकरण पृ. 28): यहाँ एक श्लोक उद्धृत है— "असुराणां कुले जाता रम्भा पूर्वपरिग्रहे। तस्या दर्शनमात्रेण निराशा: पितरो गता:।।" अर्थात् असुरों के कुल में उत्पन्न होने से 'रम्भा' (केला) का निषेध है। (किंतु यदि ऐसा है, तो देवकर्म में भी इसका निषेध होना चाहिए, जो कि नहीं है!)
३. श्राद्धकल्पलता (पृ. 73): इसमें भी श्राद्धचन्द्रिका की ही पंक्तियाँ यथावत् रख दी गई हैं। पूर्वापर प्रसंग को देखे बिना निष्कर्ष निकालना अनुचित है।

✅ श्राद्ध में कदली फल/पत्र के प्राशस्त्य (विधान) के 22 महाप्रमाण

जिन ग्रंथों में आंशिक निषेध का भ्रम होता है, उन्हीं ग्रंथों और अन्य प्रमुख धर्मशास्त्रों में केले के उपयोग को अत्यंत श्रेष्ठ बताया गया है। प्रस्तुत हैं शास्त्रों के अकाट्य प्रमाण:

१. बोपदेव स्मृतिसंग्रह (श्राद्धचन्द्रिका) मुख्य पात्रों (स्वर्ण-रजत) के अभाव में कदलीपात्र पितृकर्म में पूर्णतः ग्राह्य है: "कदलीचूतपनसजम्बुपुन्नागचम्पका:। अलाभे मुख्यपात्राणां ग्राह्या: स्यु: पितृकर्मणि।।"
२. नृसिंहप्रसाद श्राद्धसार (पृ. 120 व 51) यहाँ 'रम्भा' के स्थान पर 'जाती' पुष्प का वैकल्पिक निषेध है। वहीं पृ. 51 पर "लकुचं मोचमेव च" लिखकर मोच (केला) को श्राद्ध में प्रशस्त बताया है।
३. पितृकर्मनिर्णय (पृ. 106-107) श्राद्ध में मोच (कदलीफल) देने से पितर मासपर्यन्त तृप्त रहते हैं। "लोचै: समोचैर्लकुचै: ... दत्तेषु मासं प्रीयन्ते श्राद्धेषु पितरो नृणाम्।।" और "पनसाम्रनारिकेलकदली ... फलानि श्राद्धे देयानि।"
४. श्राद्धमञ्जरी (पृ. 3) स्पष्ट रूप से वर्णित है: "कदलीफलानि ... श्राद्धे प्रशस्तानि" (कदलीफल श्राद्ध में प्रशस्त है)।
५. श्राद्धमयूख (पृ. 32) "कट्फलं काङ्कुणी द्राक्षा लकुचं मोचमेव च" अर्थात् श्राद्ध में मोचफल (केला) अत्यंत प्रशस्त है।
६. स्मृतिमुक्ताफल (श्राद्धखण्ड पृ. 781-783) स्पष्ट प्रमाण हैं: "केला श्राद्ध में अत्यन्त उन्नत और श्रेष्ठ है।" इसे मुन्यन्न के समान पवित्र माना गया है और इससे पितरों को एक मास की तृप्ति होती है: "आम्रांश्च कदलीभेदान् ... श्राद्धकालेऽपि दापयेत्", "कदलीजातीय: पञ्च ... श्राद्धे चात्यन्तमुन्नतम्", "कदलीफलानि ... मुन्यन्नानि च श्राद्धे प्रशस्यते", "मोचै: ... दत्तैस्तु मासं प्रीयन्ते श्राद्धेषु पितरो नृणाम्"।
७. श्राद्धक्रियाकौमुदी व वीरमित्रोदय "श्राद्धे मोचफलं देयम्" तथा "लकुचं मोचकं तथा"— दोनों ही ग्रंथों में श्राद्ध में केले का फल और पत्ता ग्राह्य बताया गया है।
८. चतुर्वर्गचिन्तामणि व श्राद्धतत्त्व "लकुचं मोचमेव च... शस्तानि श्राद्धकर्मणि।" कदलीफल श्राद्ध में निर्विवाद रूप से प्रशस्त है।
९. धर्मसिन्धु (पृ. 309) भोजन पात्रों के रूप में सोने-चांदी के साथ "पलाशकमलकदलीदलमधूकपत्रनिर्मितानि वा" कहकर केले के पत्ते को श्रेष्ठ बताया है।
१०. कृत्यसारसमुच्चय व श्राद्धचिन्तामणि "यत्नपक्वमपि ग्राह्यं कदलीफलमुत्तमम्"— पका हुआ कदलीफल श्राद्ध में अवश्य ग्रहण करना चाहिए।
११. शिवपुराण (६।१३।११-१२) भगवान शिव के पुराण में भी पितृकर्म में "पात्राणि कदलीपत्राणि" और "दत्वा पदार्थान्कदली" का स्पष्ट उल्लेख है।
१२. क्षेत्रीय परम्पराएँ व अन्य तथ्य मिथिला और बंगाल में श्राद्ध के लिए कदलीपत्र और कदलीफल की अनिवार्यता है। (ध्यान दें: धर्मशास्त्रों में केले के 'पुष्प' (फूल) का निषेध मिला है, फल या पत्ते का नहीं।)

।। निष्कर्ष ।।

उपर्युक्त विशाल शास्त्रीय प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि श्राद्ध कर्म में केले का फल (मोच/कदलीफल) और केले का पत्ता (कदलीपत्र) सर्वथा ग्राह्य, प्रशस्त और पितरों को तृप्ति देने वाला है। कुछ स्थानों पर जो निषेध है, वह पाठभेद या 'केले के पुष्प' से संबंधित हो सकता है। अतः शास्त्र सम्मत मार्ग पर चलें और भ्रांतियों से बचें।

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