6 Types of Sutras in Sanskrit Grammar: पाणिनीय अष्टाध्यायी और षड्विध सूत्र का वैज्ञानिक विश्लेषण

Sooraj Krishna Shastri
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पाणिनीय एवं अन्य व्याकरण परम्पराओं में सूत्र-लक्षण तथा षड्विध सूत्रों का विस्तृत वैज्ञानिक अनुशीलन
शास्त्र-प्रवेश एवं सूत्र-लक्षण की दार्शनिक पृष्ठभूमि
संस्कृत वाङ्मय में व्याकरण शास्त्र को वेदांगों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा केन्द्रीय स्थान प्राप्त है। 'मुखं व्याकरणं स्मृतम्' के उद्घोष के साथ व्याकरण को साक्षात् वेदपुरुष का मुख माना गया है, क्योंकि जिस प्रकार मुख के बिना किसी भी मन्त्र या ध्वनि का उच्चारण तथा उसकी अभिव्यक्ति असम्भव है, उसी प्रकार व्याकरण शास्त्र के ज्ञान के बिना भाषा के साधुत्व (शुद्धता) और असाधुत्व (अशुद्धता) का विवेचन नहीं किया जा सकता। विश्व के भाषाई इतिहास में भारतीय आचार्यों ने भाषा की संरचना, पदों की व्युत्पत्ति, प्रकृति-प्रत्यय विभाग और शब्दों के निर्वचन की जो वैज्ञानिक एवं गणितीय पद्धति विकसित की, वह आज भी आधुनिक भाषाविज्ञान और संगणक विज्ञान (Computational Linguistics) के लिए विस्मय और शोध का विषय है। इस विशाल ज्ञानराशि को अत्यन्त संक्षिप्त, किन्तु सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्राचीन महर्षियों ने एक विशिष्ट साहित्यिक और तार्किक विधा का आविष्कार किया, जिसे 'सूत्र' शैली कहा जाता है।
सूत्र की परिभाषा शास्त्रकारों ने अत्यन्त सूक्ष्मता से इस प्रकार दी है—
"अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम्।
अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥"
अर्थात्, जिसमें अक्षरों की संख्या न्यूनतम हो, जो किसी भी प्रकार के सन्देह से रहित हो, जो सारवान् और अर्थपूर्ण हो, जो सभी दिशाओं अर्थात् सम्पूर्ण लक्ष्य-समुदाय पर लागू होने वाला हो, और जो स्तोभ (व्यर्थ पदों) से रहित तथा दोषमुक्त हो, उस रचना को सूत्रवेत्ता आचार्य सूत्र कहते हैं। पाणिनीय व्याकरण तथा अन्य परवर्ती व्याकरण ग्रन्थों में सम्पूर्ण भाषाई ब्रह्माण्ड को इन्हीं सूत्रों के माध्यम से अनुशासित किया गया है।
शब्दों के निर्वचन हेतु, महर्षि पाणिनि एवं अन्य वैयाकरणों ने प्रकृति और प्रत्यय के आधार पर मुख्य रूप से छः प्रकार के सूत्रों की रचना की है। इन षड्विध सूत्रों का परिगणन व्याकरण परम्परा की एक अत्यन्त प्रसिद्ध कारिका में किया गया है:
"संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियम एव च ।
अतिदेशोऽधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम् ॥"
इस कारिका के अनुसार सम्पूर्ण व्याकरण तन्त्र को संचालित करने वाले सूत्र छह प्रकार के माने गए हैं: संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियम, अतिदेश और अधिकार। ये षड्विध सूत्र मात्र भाषिक नियम नहीं हैं, अपितु ये एक ऐसी तार्किक वास्तुकला (Logical Architecture) का निर्माण करते हैं जो भाषा के अनन्त और परिवर्तनशील प्रवाह को एक सुदृढ़ व्यवस्था में बाँधती है। प्रस्तुत शोध प्रबन्ध पाणिनीय अष्टाध्यायी तथा कातन्त्र, जैनेन्द्र आदि अन्य व्याकरण परम्पराओं के परिप्रेक्ष्य में इन्हीं षड्विध सूत्रों की संरचना, प्रयोजन, और उनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का विशद और सर्वांगीण अनुशीलन प्रस्तुत करता है।
पाणिनीय अष्टाध्यायी: संरचनात्मक एवं तार्किक वास्तुकला
महर्षि पाणिनि (लगभग ५वीं से ८वीं शताब्दी ईसा पूर्व) द्वारा रचित 'अष्टाध्यायी' संस्कृत व्याकरण का सर्वोत्कृष्ट, आधारभूत एवं सार्वभौम ग्रन्थ है। भारतीय अनुश्रुति और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार पाणिनि नन्द वंश के समकालीन थे और उनका काल ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास समीचीन प्रतीत होता है, क्योंकि उनके ग्रन्थ में शतमान, विंशतिक और कार्षापण आदि तत्कालीन मुद्राओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। पतञ्जलिकृत महाभाष्य में अष्टाध्यायी को "सर्ववेद-परिषद्-शास्त्र" कहा गया है, जिसका तात्पर्य है कि इसका सम्बन्ध किसी एक वेद-विशेष या शाखा तक सीमित न होकर सम्पूर्ण वैदिक संहिताओं तथा लौकिक वाङ्मय से है।
अष्टाध्यायी की संरचना एक जटिल गणितीय मॉडल के समान है। इसमें कुल आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं। इस प्रकार कुल ३२ पादों में लगभग ४००० (विभिन्न पाठ-भेदों के अनुसार ३१५५ से ३९९५ के मध्य) सूत्र निबद्ध हैं। अष्टाध्यायी का प्रथम सूत्र 'वृद्धिरादैच्' और अन्तिम सूत्र 'अ अ' है। ग्रन्थ के आरम्भ में १४ प्रत्याहार सूत्र हैं, जिन्हें शिवसूत्र या माहेश्वर सूत्र भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव ने नृत्तावसान (ताण्डव नृत्य के अन्त) के समय अपने डमरू से इन १४ सूत्रों (अइउण्, ऋऌक् आदि) को प्रकट किया था। इन सूत्रों का मुख्य उद्देश्य प्रत्याहारों (संक्षिप्त कूटों या Acronyms) का निर्माण करना है, जो व्याकरण शास्त्र के नियमों को अत्यन्त संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने में सहायक होते हैं।
पाणिनि ने अष्टाध्यायी के प्रकरणों तथा सूत्रों का विभाजन अत्यन्त वैज्ञानिक रीति से किया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ को उसकी तार्किक अनुप्रयुक्ति के आधार पर दो मुख्य भागों में विभक्त किया गया है। प्रथम भाग में पहले अध्याय से लेकर आठवें अध्याय के प्रथम पाद तक का समावेश होता है, जिसे 'सपाद सप्ताध्यायी' कहा जाता है। द्वितीय भाग में आठवें अध्याय के शेष तीन पाद आते हैं, जिन्हें 'त्रिपादी' कहा जाता है। इन दोनों भागों के मध्य पारस्परिकता और नियम-संघर्ष (Rule conflict) को सुलझाने हेतु पाणिनि ने "पूर्वत्रासिद्धम् (८-२-१)" सूत्र का विधान किया है। यह एक विशिष्ट अधिकार सूत्र है जो यह निर्देश देता है कि सपाद सप्ताध्यायी के सूत्रों की दृष्टि में त्रिपादी के सूत्र असिद्ध (अविद्यमान) माने जाते हैं। अर्थात्, यदि इन दोनों भागों के नियमों के मध्य कभी कार्य-सिद्धि को लेकर विरोध उत्पन्न हो जाए, तो पूर्व भाग (सपाद सप्ताध्यायी) का नियम ही बलवान् माना जाएगा और वही लागू होगा। इसी प्रकार सपाद सप्ताध्यायी के अन्तर्गत आने वाले सूत्रों में भी यदि समान बल वाले दो नियमों में विरोध दृष्टिगोचर हो, तो "विप्रतिषेधे परं कार्यम्" के सिद्धान्त से परवर्ती (बाद में आने वाले) सूत्र को प्राधान्य दिया जाता है।
पाणिनीय व्याकरण की प्रमुख विशेषताओं में वाक्य को भाषा की मूल इकाई मानना, ध्वनि-उत्पादन-प्रक्रिया का सूक्ष्म वर्णन एवं ध्वनियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण, सुबन्त एवं तिङन्त के रूप में सरल और सटीक पद-विभाग, तथा प्रकृति और प्रत्यय के आधार पर शब्दों का व्युत्पत्तिपरक विवेचन सम्मिलित है। सूत्रकार पाणिनि, वार्तिककार कात्यायन एवं भाष्यकार पतञ्जलि—इन तीनों आचार्यों को व्याकरण शास्त्र के 'त्रिमुनि' कहा जाता है, और इन तीनों के सम्मिलित योगदान से ही 'पाणिनीय व्याकरण' अपने पूर्ण और परिपक्व स्वरूप को प्राप्त हुआ। इस सम्पूर्ण यान्त्रिक और गणितीय सटीकता को संचालित करने वाले मुख्य यन्त्र उपर्युक्त छः प्रकार के सूत्र ही हैं, जिनका विस्तृत और सोदाहरण विवेचन आगे किया जा रहा है।
षड्विध सूत्रों का सूक्ष्म एवं विश्लेषणात्मक विवेचन
व्याकरण शास्त्र में प्रयुक्त छः प्रकार के सूत्र केवल भाषिक नियम नहीं हैं, अपितु ये आधुनिक कम्प्यूटर विज्ञान के 'प्रोग्रामिंग लॉजिक', 'वेरिएबल्स', 'फंक्शन्स', और 'कन्ट्रोल स्ट्रक्चर्स' के सर्वथा समतुल्य हैं। शास्त्र की लाघव-प्रवृत्ति (संक्षिप्तीकरण) को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक सूत्र का अपना एक सुनिश्चित कार्यक्षेत्र और प्रयोजन हो।
१. संज्ञा सूत्र (Samjna Sutra - Nomenclature Rules)
सूत्र-लक्षण की परम्परा में संज्ञा सूत्र का लक्षण है— "नामकरणं संज्ञा" अथवा तकनीकी शब्दों का नामकरण। जिस सूत्र से व्याकरण शास्त्र में किसी विशिष्ट तत्त्व, वर्ण, शब्द-समूह, अवस्था या प्रक्रिया का कोई एक पारिभाषिक नाम (Technical term) रखा जाता है, उसे संज्ञा सूत्र कहते हैं।
शास्त्र को अत्यन्त संक्षिप्त (लाघवपूर्ण) बनाने के लिए यह अपरिहार्य है कि बार-बार दुहराए जाने वाले वर्ण-समूहों या भाषिक प्रक्रियाओं को एक छोटा, संकेतात्मक नाम दे दिया जाए। संज्ञा सूत्र ठीक वही कार्य करते हैं जो बीजगणित में "X" या "Y" जैसे 'Variables' करते हैं। संज्ञाएँ प्रायः अल्पाक्षरी होती हैं। जिस सूत्र से किसी वस्तु का कोई एक विशिष्ट नाम रखा जाता है, उस नामकरण की प्रक्रिया को ही संज्ञा विधान कहते हैं।
  • प्रमुख उदाहरण एवं कार्य-प्रणाली:
    संज्ञा सूत्रों की कार्यप्रणाली को समझने के लिए अष्टाध्यायी का प्रथम सूत्र "वृद्धिरादैच्" (१-१-१) एक आदर्श उदाहरण है। इस सूत्र के अनुसार आ, ऐ, तथा औ — इन तीनों स्वरों की 'वृद्धि' संज्ञा होती है। अर्थात्, जहाँ कहीं भी पाणिनि अपने शास्त्र में 'वृद्धि' शब्द का प्रयोग करेंगे (जैसे 'मृजेर्वृद्धिः' सूत्र में), वहाँ उसका अर्थ आ, ऐ, अथवा औ ही ग्रहण किया जाएगा। चूँकि इस सूत्र ने आ, ऐ तथा औ इन तीनों स्वरों का नया नामकरण किया है, अतः यह एक संज्ञा सूत्र है।
  • अन्य महत्वपूर्ण संज्ञाएँ:
    "मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः" (१-१-८) सूत्र मुख तथा नासिका इन दोनों स्थानों से उच्चरित होने वाले वर्णों की 'अनुनासिक' संज्ञा करता है। "तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्" सूत्र के अनुसार जिन वर्णों के उच्चारण स्थान (कण्ठ, तालु आदि) और आभ्यन्तर प्रयत्न समान होते हैं, उनकी आपस में 'सवर्ण' संज्ञा होती है।
व्याकरण में संज्ञाओं का एक विस्तृत जाल है, जिनमें इत्, प्रत्याहार, टी, नदी, घु, पद, धातु, प्रत्यय, अङ्ग, निष्ठा, प्रगृह्य आदि प्रमुख हैं। उदाहरणार्थ, "क्तक्तवतू निष्ठा" सूत्र से 'क्त' तथा 'क्तवतु' प्रत्ययों की 'निष्ठा' संज्ञा होती है। स्वरों के काल-निर्धारण हेतु भी संज्ञाएँ हैं। "ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः" सूत्र के अनुसार एक मात्रा के उच्चारण काल वाले अच् (स्वर) की ह्रस्व, द्विमात्रिक की दीर्घ, और त्रिमात्रिक की प्लुत संज्ञा होती है। छन्दशास्त्र और व्याकरण में 'लघु' और 'गुरु' संज्ञाएँ भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं; ह्रस्व वर्णों की लघु संज्ञा होती है, जबकि संयुक्त अक्षरों के पूर्व विद्यमान वर्ण की गुरु संज्ञा होती है।
प्रत्याहार निर्माण के लिए इत्-संज्ञा का होना परम आवश्यक है। माहेश्वर सूत्रों के अन्त में स्थित 'ण्', 'क्', 'ङ्' आदि व्यञ्जनों की "हलन्त्यम्" सूत्र से इत्-संज्ञा होती है। उपदेश अवस्था (पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि के प्रथम उच्चारण) में विद्यमान अन्त्य हल् इत्संज्ञक होता है। जिसकी इत्-संज्ञा होती है, उसका "तस्य लोपः" सूत्र से लोप (अदर्शन) हो जाता है। इन इत्-संज्ञक वर्णों की सहायता से "आदिरन्त्येन सहेता" सूत्र प्रत्याहार (यथा- अण्, अक्, अच्) बनाता है, जो स्वयं में एक संज्ञा विधान है। इस प्रकार संज्ञा सूत्र सम्पूर्ण व्याकरण की पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण करते हैं, जिसके बिना शास्त्र का एक पग भी आगे बढ़ना असम्भव है।
२. परिभाषा सूत्र (Paribhasha Sutra - Metarules and Conflict Resolution)
परिभाषा सूत्र का लक्षण है— "अनियमे नियमकारिणी परिभाषा"। जब शास्त्र में अनियम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, अर्थात् जब विधि-सूत्रों के अनुप्रयोग में संभ्रम, अनिर्णय या विरोधाभास की परिस्थिति निर्माण हो जाती है, तब जो सूत्र एक निश्चित नियम बनाकर मार्गदर्शन करता है, उसे परिभाषा सूत्र कहते हैं।
परिभाषा सूत्र शास्त्र के 'ट्रबलशूटर' (Troubleshooter) या 'मेटा-रूल्स' (Meta-rules) हैं। जब किसी एक कार्य को करने के लिए कई विकल्प एक साथ प्राप्त हो जाएँ, या यह स्पष्ट न हो कि विधीयमान कार्य किस विशेष स्थान पर किया जाना चाहिए, तब परिभाषा सूत्र आकर व्यवस्था स्थापित करते हैं। इनका अपना कोई स्वतन्त्र लक्ष्य नहीं होता, अपितु ये विधि सूत्रों के सहायक बनकर उनकी प्रवृत्ति को नियन्त्रित करते हैं।
  • प्रमुख उदाहरण एवं कार्य-प्रणाली:
    इस सन्दर्भ में "स्थानेऽन्तरतमः" (१-१-५०) एक अत्यन्त प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण परिभाषा सूत्र है। अष्टाध्यायी के सूत्रों के उपयोग से प्रक्रिया करते समय प्रायः यह दुविधा आती है कि एक ही स्थान पर बैठने के लिए कई आदेश (विकल्प) प्राप्त हो जाते हैं। यह सूत्र नियम बनाता है कि यदि एक स्थानी (जिसके स्थान पर आदेश होना है) की जगह पर अनेक आदेश प्राप्त हो रहे हों, तो जो आदेश स्थानी के सर्वाधिक सादृश्य (अन्तरतम) होता है, केवल वही आदेश उस स्थान पर बैठने योग्य होता है।
  • प्रायोगिक उदाहरण:
    'सुधी + उपास्य' की सन्धि प्रक्रिया में "इको यणचि" सूत्र की सहायता से 'ई' (इक्) के स्थान पर यण् (य्, र्, ल्, व्) ये चार आदेश प्राप्त होते हैं। चूँकि स्थानी एक ('ई') है और आदेश चार हैं, यह घोर अनियम है। इस दुविधा से बाहर निकालने के लिए "स्थानेऽन्तरतमः" परिभाषा प्रवृत्त होती है। तालु-स्थान से उच्चरित होने वाले 'ई' के सर्वाधिक निकट (समान उच्चारण स्थान वाला) आदेश 'य्' है। अतः 'ई' के स्थान पर केवल 'य्' का आदेश होकर अन्तिम उत्तर 'सुध्युपास्य' सिद्ध होता है।
  • षष्ठी स्थानेयोगा:
    एक अन्य महत्त्वपूर्ण परिभाषा सूत्र "षष्ठी स्थानेयोगा" (१-१-४९) है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने इस पर विशद विमर्श किया है। यह सूत्र यह नियम बनाता है कि जहाँ शास्त्र में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग हुआ हो, और कोई अन्य सम्बन्ध स्पष्ट न हो, वहाँ उसका अर्थ "के स्थान पर" (In place of) समझना चाहिए।
इसी प्रकार "अलोऽन्त्यस्य" यह परिभाषा देती है कि षष्ठी से निर्दिष्ट आदेश सम्पूर्ण शब्द के स्थान पर न होकर केवल उसके अन्तिम अल् (वर्ण) के स्थान पर होता है। परिभाषाओं के विषय में टीकाकारों का योगदान अविस्मरणीय है। नागेशभट्ट (नागोजीभट्ट) रचित 'परिभाषेन्दुशेखर' में महाभाष्य में आई हुई १३३ परिभाषाओं का प्रकरण सहित अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन किया गया है। नागेशभट्ट ने परिभाषाओं की प्रवृत्ति, उनके बाध-बाधक भाव, और उनके ज्ञापक (ज्ञापक = जो सूत्र साक्षात् नियम न बताकर किसी अन्य नियम के होने का परोक्ष संकेत देते हैं) पर गम्भीर विचार प्रस्तुत किया है। परिभाषा सूत्र शास्त्र में एक नियामक शक्ति के रूप में कार्य करते हैं।
३. विधि सूत्र (Vidhi Sutra - Operational Rules)
विधि सूत्र का लक्षण है— "विषय का विधान" अथवा अपूर्व कार्यबोधकत्वम् विधिः। जिस सूत्र के द्वारा किसी नए कार्य—जैसे आदेश (Substitution), आगम (Augmentation), लोप (Deletion), प्रकृति-प्रत्यय संयोजन आदि—का सीधा विधान किया जाता है, वह विधि सूत्र कहलाता है।
अष्टाध्यायी में सर्वाधिक संख्या विधि सूत्रों की ही है। यही शास्त्र के मुख्य 'ऑपरेटिव' (Operative) सूत्र हैं, जो शब्दों के वास्तविक और प्रयोगात्मक स्वरूप का निर्माण करते हैं। संज्ञा, परिभाषा, अधिकार आदि सूत्र वस्तुतः विधि सूत्रों के ही उपकारक (सहायक) होते हैं। विधि सूत्र सदैव किसी अप्राप्त कार्य की प्राप्ति कराते हैं। व्याकरण शास्त्र का मुख्य ढाँचा इन्हीं आदेशों और प्रत्ययों (जैसे कृत्, तद्धित, सुप्, तिङ्) के विधान पर खड़ा है।
  • इको यणचि (६-१-७७):
    यह एक साक्षात् विधि सूत्र है। इसका विधान है कि अच् (स्वर) परे रहते इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर यण् (य्, र्, ल्, व्) आदेश हो। यह एक सन्धि-विधि है।
  • कालार्थेषूपपदेषु तुमुन् (३-३-१६७):
    यह सूत्र कृदन्त प्रक्रिया का एक विधि सूत्र है। इसका अर्थ है कि काल, समय और वेला वाचक शब्दों के उपपद रहते धातु से 'तुमुन्' प्रत्यय का विधान होता है (जैसे- कालः भोक्तुम्, समयः भोक्तुम्)। यहाँ साक्षात् प्रत्यय का विधान किया गया है।
  • अतो भिस ऐस् (७-१-९):
    अकारान्त अङ्ग से परे भिस (तृतीया बहुवचन) के स्थान पर 'ऐस्' आदेश हो (जैसे- राम + भिस् = रामैः)। यह सुबन्त प्रक्रिया की एक आदेश-विधि है।
भारतीय दार्शनिक परम्परा में वृत्ति (पदों का अर्थबोधक सामर्थ्य) का बड़ा महत्त्व है। वृत्ति दो प्रकार की मानी जाती है—जहत्स्वार्था (जहाँ अवयव अपना अर्थ छोड़ देते हैं) और अजहत्स्वार्था (जहाँ अवयवार्थ मिश्रित रहता है)। पदविधि (जैसे समास) में समर्थ पदों का ही विधान होता है ("समर्थः पदविधिः")। विधि सूत्र इन वृत्तियों का निर्माण करते हैं। शाब्दबोध में अर्थ की उपस्थिति कराने के लिए विधि सूत्रों द्वारा प्रत्ययों का सटीक विधान आवश्यक है।
४. नियम सूत्र (Niyama Sutra - Restrictive Rules)
नियम सूत्र का लक्षण है— "सिद्धे सति आरभ्यमाणो विधिर्नियमाय भवति"। अर्थात्, जब कोई कार्य किसी अन्य सामान्य विधि सूत्र से पहले ही प्राप्त (सिद्ध) हो, फिर भी उसके लिए कोई नया सूत्र बनाया जाए, तो वह नया सूत्र 'नियम' के लिए होता है। इसका मुख्य कार्य बहुत्र प्राप्ति (Over-application) का संकोचन करना है।
व्याकरण और मीमांसा शास्त्र में दार्शनिक दृष्टि से विधि और नियम में सूक्ष्म भेद है। विधि वहाँ प्रवृत्त होती है जहाँ कार्य सर्वथा अप्राप्त हो (अपूर्व विधि), जबकि नियम वहाँ प्रवृत्त होता है जहाँ कार्य वैकल्पिक रूप से या व्यापक रूप से प्राप्त हो, किन्तु इष्ट-सिद्धि के लिए उसे किसी विशेष परिधि में बाँधना या संकोचित करना आवश्यक हो। नियम सूत्रों का मूल उद्देश्य अतिव्याप्ति दोष (Over-extension of a rule) का वारण करना है।
  • प्रमुख उदाहरण एवं कार्य-प्रणाली:
    इस सन्दर्भ में "पतिः समास एव" (१-४-८) एक उत्कृष्ट नियम सूत्र है। सामान्य विधि सूत्र "शेषो घ्यसखि" के अनुसार, सखि शब्द को छोड़कर शेष सभी ह्रस्व इकारान्त और उकारान्त शब्दों की 'घि' संज्ञा होती है। इस विधि के अनुसार 'पति' शब्द की भी सर्वत्र (समास और असमास दोनों में) 'घि' संज्ञा प्राप्त थी। चूँकि यह कार्य पहले से ही सिद्ध था, फिर भी पाणिनि ने "पतिः समास एव" नामक एक पृथक् सूत्र बनाया। यह व्यर्थ नहीं हो सकता। अतः यह सिद्ध करता है कि यह सूत्र 'नियम' के लिए है—अर्थात् यह नियम बनाता है कि यदि पति शब्द की घि संज्ञा होगी, तो वह केवल समास (जैसे- भूपति, सेनापति) में ही होगी, स्वतन्त्र रूप से (जैसे- पत्या, पत्ये के रूप में) नहीं। यहाँ नियम सूत्र ने घि संज्ञा की व्यापक प्राप्ति को केवल समास तक संकोचित कर दिया।
इसी प्रकार "कृत्तद्धितसमासाश्च" (१-२-४६) सूत्र अर्थवत् प्रातिपदिकों की प्राप्ति के संकोचन हेतु प्रवृत्त होता है। नियम सूत्र शास्त्र को विशृंखल होने से बचाते हैं और भाषा के अपवादों को एक तार्किक ढाँचे में समेटते हैं।
५. अतिदेश सूत्र (Atidesha Sutra - Rules of Analogical Transfer)
अतिदेश सूत्र का लक्षण है— "जो अपने गुणधर्म को दूसरे सूत्रों पर लागू करते हैं" (Transfer of properties / Analogical extension)। जिस तत्त्व में जो गुण या धर्म वास्तव में विद्यमान नहीं है, उसमें शास्त्र की प्रक्रिया-सिद्धि के लिए उस गुण या धर्म का आरोप कर देना (To treat X as Y) 'अतिदेश' कहलाता है। आधुनिक प्रोग्रामिंग की भाषा में इसे 'Inheritance', 'Polymorphism' या 'Typecasting' के समकक्ष समझा जा सकता है।
अतिदेश बोधित स्थलों में वस्तुस्थिति का समाश्रयण नहीं होता, अपितु शास्त्र-कार्य के लिए एक शास्त्रीय भ्रम या आरोप उत्पन्न किया जाता है। अतिदेश मुख्य रूप से पाँच या छः प्रकार का माना जाता है, यथा—रूपातिदेशः, कार्यातिदेशः, शास्त्रातिदेशः, निमित्तातिदेशः, अर्थातिदेशः।
  • रूपातिदेशः (रूप का आरोप): "तृज्वत्क्रोष्टुः" सूत्र से 'क्रोष्टु' शब्द को 'तृच्' प्रत्ययान्त के समान रूप का अतिदेश होता है।
  • शास्त्रातिदेशः (शास्त्र या नियम का आरोप): "कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रियः" सूत्र से कर्मकर्ता में कर्म के शास्त्र का अतिदेश होता है।
  • निमित्तातिदेशः (निमित्त का आरोप)।
  • कार्यातिदेशः (कार्य का आरोप)।
विस्तृत महाभाष्य विमर्श एवं "स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ": अष्टाध्यायी के अतिदेश प्रकरण का सर्वप्रमुख और आधारभूत सूत्र है— "स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ" (१-१-५६)। इसका अर्थ है कि विधीयमान आदेश अपने स्थानी (Original entity) के समान (स्थानिवत्) व्यवहार करता है, सिवाय उन विधियों के जो किसी एक 'अल्' (वर्ण) पर साक्षात् आश्रित हों (अनल्विधौ)। यह सूत्र आदेश को स्थानी के गुण प्रदान करता है, जिससे कि स्थानी के कारण प्राप्त होने वाले प्रत्यय, आगम आदि आदेश में भी सुगमता से लग सकें।
महाभाष्य में महर्षि पतञ्जलि ने इस सूत्र पर विशद और अत्यन्त गम्भीर चर्चा की है। "अनल्विधौ" पद के अर्थ-निर्धारण हेतु भाष्य में "अला विधिः" (अल् के द्वारा विधि), "अलः विधिः" (अल् से परे विधि), "अलि विधिः" (अल् के परे रहते विधि), और "अल् के स्थान में विधि" इत्यादि चार प्रकार के समासों की सम्भावनाओं (पूर्वपक्ष) पर विचार किया गया है। अन्ततः सिद्धान्त पक्ष स्थापित किया गया कि जहाँ पर किसी अल्/प्रत्यय/धातु/प्रातिपदिक आदि पर अलादेश हो, और वह कार्य केवल अल् (वर्ण-मात्र) के स्वरूप पर निर्भर हो, वहाँ वह अल् स्थानिवत् नहीं होगा।
उदाहरणार्थ, 'प्रकृत्य' शब्द में 'प्र+क्त्वा' की स्थिति में "समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्" सूत्र से 'क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर 'ल्यप्' आदेश होता है। 'ल्यप्' यद्यपि साक्षात् कृत्-प्रत्यय के रूप में निर्दिष्ट नहीं है, तथापि "स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ" सूत्र के अतिदेश से 'ल्यप्' में अपने स्थानी 'क्त्वा' के समस्त गुण आरोपित हो जाते हैं, और वह कृत्-प्रत्यय मान लिया जाता है। इसके विपरीत, 'द्यौः' की सिद्धि में 'दिव औत्' से वकार के स्थान पर 'औ' आदेश होता है। यदि यहाँ 'औ' को अतिदेश द्वारा 'व्' (व्यञ्जन) मान लिया जाता, तो सुप्-लोप आदि कार्य बाधित हो जाते क्योंकि 'औ' वास्तव में स्वर है। इसलिए 'अनल्विधौ' कहकर वर्ण-विशिष्ट अतिदेश का निषेध कर दिया गया, जो पाणिनि की गणितीय बुद्धिमत्ता का परिचायक है। नागेशभट्ट ने 'परिभाषेन्दुशेखर' में भी इस सिद्धान्त की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया है कि अलमात्र वृत्ति धर्म का अतिदेश कैसे प्रवृत्त और निवृत्त होता है।
६. अधिकार सूत्र (Adhikara Sutra - Domain and Jurisdiction Rules)
अधिकार सूत्र का लक्षण है— "एकत्र उपात्तस्य अन्यत्र व्यापारः अधिकारः"। जहाँ किसी एक सूत्र में कहा गया पद, प्रकरण या शब्द, आगे आने वाले अनेक सूत्रों में अनुवृत्ति (Carry-over) के रूप में प्रवृत्त होता है, उसे अधिकार सूत्र कहते हैं। पाणिनीय व्याकरण की अनुवृत्ति शैली में अधिकार सूत्रों का सर्वाधिक महत्त्व है। यह बार-बार होने वाले दुहराव (Repetition) को रोककर शास्त्र में अपार लाघव (Brevity) उत्पन्न करते हैं।
अधिकार के विषय में महाभाष्य का दार्शनिक मत: महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलि ने अधिकार सूत्र की व्याख्या करते हुए एक अत्यन्त सटीक और काव्यात्मक उपमा दी है: "अधिकारो नाम त्रिप्रकारः। कश्चिदेकदेशस्थः सर्वं शास्त्रमभिज्वलयति। यथा प्रदीपः..." अर्थात्, अधिकार तीन प्रकार का होता है। जिस प्रकार एक कोने में रखा हुआ दीपक (प्रदीप) पूरे कक्ष को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार कुछ अधिकार सूत्र ग्रन्थ के एक देश (स्थान) में स्थित होकर सम्पूर्ण शास्त्र या एक विशाल प्रकरण को अभिज्वलित (प्रभावित) करते हैं।
महाभाष्य (१-१-४९) के विमर्श के अनुसार अधिकार के अन्य दो स्वरूप मण्डूकप्लुति (मेंढक की उछाल) और नदी-प्रवाह के समान माने गए हैं। मण्डूकप्लुति (चण्डालिका) में अधिकार बीच के कुछ असम्बद्ध सूत्रों को छोड़कर आगे के सूत्रों में कूद जाता है, जबकि नदी-प्रवाह में अधिकार निरन्तर एक धारा में बहता रहता है।
  • प्रत्ययः (३-१-१):
    यह अष्टाध्यायी का एक विशाल अधिकार सूत्र है। इस सूत्र का अर्थ केवल इतना है कि इसके बाद तीसरे, चौथे और पाँचवें अध्याय के अन्त तक जो भी विधान किए जाएँगे, वे सभी 'प्रत्यय' कहलाएँगे। इस एक शब्द के अधिकार ने सहस्रों सूत्रों में 'प्रत्यय' शब्द को दुहराने का श्रम और पृष्ठ बचा लिए।
  • पूर्वत्रासिद्धम् (८-२-१):
    जैसा कि पूर्व में विवेचित है, यह अधिकार सूत्र सम्पूर्ण त्रिपादी (अंतिम तीन पादों) पर अपना अधिकार रखता है और नियम-संघर्ष का समाधान करता है।
षड्विध सूत्रों का सारांश एवं तुलनात्मक दृष्टि:
सूत्र प्रकार (Sutra Type) मुख्य कार्य (Function) अष्टाध्यायी का प्रातिनिधिक उदाहरण प्रयोजन एवं स्वरूप (Purpose & Nature)
संज्ञा नामकरण (Nomenclature) वृद्धिरादैच् (१.१.१) पारिभाषिक शब्दों और चरों (Variables) का निर्माण कर लाघव लाना।
परिभाषा नियमन (Conflict Resolution) स्थानेऽन्तरतमः (१.१.५०) अनियम, विरोधाभास या विकल्पों की स्थिति में निश्चित मार्गदर्शन करना।
विधि विधान (Prescription) इको यणचि (६.१.७७) अपूर्व कार्य (आदेश, आगम, लोप, प्रत्यय आदि) का साक्षात् और प्रत्यक्ष विधान।
नियम संकोचन (Restriction) पतिः समास एव (१.४.८) अतिव्याप्ति (Over-application) रोककर पूर्व-प्राप्त नियम को सीमित करना।
अतिदेश आरोपण (Analogical Transfer) स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ (१.१.५६) कार्य-सिद्धि हेतु अन्य के धर्म या गुण को किसी अन्य में आरोपित (Inherit) करना।
अधिकार प्रसरण (Domain/Jurisdiction) प्रत्ययः (३.१.१) एक स्थान पर कहे गए पद का आगे के सूत्रों में प्रसरण कर पुनरावृत्ति रोकना।
अन्य व्याकरण परम्पराओं में सूत्र-प्रकार एवं विन्यास
यद्यपि पाणिनीय व्याकरण (अष्टाध्यायी) सर्वशिरोमणि और सर्वाधिक वैज्ञानिक माना जाता है, तथापि समय के साथ-साथ भिन्न-भिन्न प्रयोजनों, भौगोलिक क्षेत्रों और साम्प्रदायिक मान्यताओं के आधार पर अनेक नवीन व्याकरण तन्त्र उदित हुए। इनमें कातन्त्र और जैनेन्द्र व्याकरण प्रमुख हैं, जिनमें सूत्र-प्रकारों (संज्ञा, परिभाषा आदि) का मौलिक स्वरूप तो प्रायः समान रहा, किन्तु उनकी प्रस्तुति, लाघव की प्रविधि, और शैक्षणिक दृष्टिकोण में पर्याप्त भिन्नता परिलक्षित होती है।
१. कातन्त्र व्याकरण (Katantra Vyakaran)
कातन्त्र व्याकरण की रचना आचार्य शर्ववर्मन् ने की थी। अनुश्रुति और कथासरित्सागर के अनुसार, शर्ववर्मन् प्रथम शताब्दी (लगभग २०-२४ ई०) में सातवाहन वंश के राजा (राजा हाल) के दरबार में मन्त्री थे। राजा को संस्कृत का अल्प ज्ञान था और वे शीघ्र तथा सरलता से संस्कृत सीखना चाहते थे। इसी उद्देश्य से, पाणिनीय व्याकरण की जटिलताओं से बचते हुए, इस 'शीघ्रबोधक' व्याकरण की रचना की गई। इसे कालाप, कालापक, कुमार, दौर्गसिंह, और शार्ववार्मिक आदि नामों से भी जाना जाता है। त्रिविष्टपी परम्परा के अनुसार इसका उपदेश मयूरपच्छियों (मोर पंख धारियों) के मध्य किया गया, इसलिए इसे कलाप कहा गया। यह व्याकरण मुख्यतः बंगाल, कश्मीर, आन्ध्र, उत्कल, नेपाल, तिब्बत और श्रीलंका में बौद्धों और जैनों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हुआ।
कातन्त्र व्याकरण की विशेषताएँ एवं सूत्र-प्रकार:
  • प्रत्याहारों का अभाव:
    पाणिनीय व्याकरण में शिवसूत्रों के आधार पर प्रत्याहार (अण्, अक्, इण् आदि) बनाए गए, जो अत्यधिक संक्षिप्त हैं किन्तु प्रारम्भिक विद्यार्थियों के लिए स्मरण करने में क्लिष्ट होते हैं। कातन्त्र ने प्रत्याहार-प्रक्रिया का पूर्णतः त्याग कर दिया। यद्यपि इस कारण इसके सूत्र पाणिनीय सूत्रों की भाँति अत्यधिक संक्षिप्त नहीं रह पाए, किन्तु वे स्मरण रखने में अत्यन्त सरल हो गए, जिससे प्रत्याहारों के कण्ठस्थीकरण से मुक्ति मिली।
  • अर्थकृत लाघव:
    पाणिनि ने "शब्दकृत लाघव" (अक्षरों की कमी) पर बल दिया, जबकि कातन्त्र ने "अर्थकृत लाघव" (समझने में सरलता और लोक-व्यवहार का अनुसरण) को अपनाया, जिससे यह प्रयोक्ता के प्रति अधिक मित्रवत् (User-friendly) सिद्ध हुआ।
  • वर्णों की संख्या:
    कातन्त्र में १४ स्वर माने गए हैं और कुल ५२ वर्ण माने गए हैं (पाणिनि में केवल ९ स्वर और ४२ वर्ण माने जाते हैं)।
  • संरचना एवं सूत्र शैली:
    यह ग्रन्थ मुख्य रूप से चार अध्यायों में विभक्त है—सन्धि, नाम्नि, चतुष्ठय, और आख्यात। इसके मङ्गलाचरण और आरम्भिक संज्ञा सूत्रों की शैली अत्यन्त स्पष्ट है। इसका प्रथम सूत्र है: "सिद्धो वर्ण समाम्नायः" (वर्णों का समूह स्वतः सिद्ध है)। इसमें स्वरों को "दश समाना" (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ये दस समान हैं) और सन्ध्यक्षरों को "एकारादिनाम् सांध्याक्षराणि" कहकर पारिभाषिक संज्ञाएँ दी गई हैं। "पूर्वो ह्रस्वः परो दीर्घाः" जैसे परिभाषा सूत्र अत्यन्त स्पष्ट और बोधगम्य हैं, जो बिना किसी गूढ़ार्थ के सीधा नियम बताते हैं।
२. जैनेन्द्र व्याकरण (Jainendra Vyakaran)
जैनेन्द्र व्याकरण की रचना विक्रम की छठी शताब्दी (लगभग ४५०-५०० ई०) में दिगम्बर सम्प्रदाय के महान् आचार्य देवनन्दि द्वारा की गई, जिनका नामान्तर पूज्यपाद तथा जिनेन्द्रबुद्धि भी है। जैन धर्म की मान्यतानुसार, सौधर्म देवलोक के देवराज इन्द्र ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर बालक महावीर (जिन) से व्याकरण के कुछ अत्यन्त कठिन प्रश्न पूछे थे। भगवान महावीर द्वारा उन प्रश्नों का दिया गया उत्तर ही कालान्तर में संकलित होकर 'जैनेन्द्र व्याकरण' कहलाया (जिन + इन्द्र = जैनेन्द्र)। यद्यपि इसके प्रणेता जैन आचार्य थे और इसके प्रथम सूत्र में 'सिद्ध' शब्द का प्रयोग है (जो जैन कर्तृत्व को प्रमाणित करता है), फिर भी इसमें जैन धार्मिक तत्त्वों का प्रत्यक्ष या आग्रहपूर्ण समावेश नहीं है; यह शुद्ध रूप से एक धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक व्याकरण ही है।
जैनेन्द्र व्याकरण की विशेषताएँ एवं सूत्र-प्रकार:
  • पञ्चाध्यायी:
    इस व्याकरण में अष्टाध्यायी के विपरीत केवल पाँच अध्याय हैं, अतः इसे 'पञ्चाध्यायी' भी कहते हैं।
  • अल्पाक्षरी संज्ञाएँ:
    आचार्य देवनन्दि ने पाणिनीय परम्परा को ही आधार बनाया और प्रत्याहार शैली का भी उपयोग किया, किन्तु अक्षरों को बचाने (लाघव) के प्रयास में उन्होंने पाणिनीय संज्ञाओं को और भी अधिक संक्षिप्त (अल्पाक्षरी) कर दिया। इस अर्थगौरव और अति-संक्षिप्तीकरण के कारण यह व्याकरण पाणिनीय तन्त्र की अपेक्षा अधिक क्लिष्ट और गूढ़ बन गया।
  • अनेकशेष रचना:
    यह व्याकरण एकशेष-प्रकरण-रहित है (अनेकशेष रचना), जो इसकी एक विशिष्टता है।
  • सूत्र-संख्या:
    इसके दो सूत्रपाठ मिलते हैं—औदीच्य संस्करण (जिसमें लगभग ३००० सूत्र हैं) तथा दाक्षिणात्य संस्करण (जिसमें ३७०० सूत्र उपलब्ध हैं)।
जैनेन्द्र व्याकरण में भी पाणिनीय परम्परा के समान संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियम आदि षड्विध सूत्रों की अवधारणा को ही अङ्गीकार किया गया है। आचार्य अभयनन्दि (८वीं-९वीं शताब्दी) द्वारा रचित 'महावृत्ति' इस व्याकरण की सबसे प्रमुख टीका है, जो सूत्रों के अर्थ को विशद शैली में स्फुट करती है और काशिका वृत्ति के समान ही प्रामाणिक मानी जाती है।
विभिन्न व्याकरण परम्पराओं का संरचनात्मक तुलनात्मक अध्ययन:
व्याकरण सम्प्रदाय (Grammar Tradition) रचयिता (Author) अध्याय संख्या (Chapters) मुख्य विशेषता एवं लाघव प्रविधि (Key Feature & Brevity Method) सूत्र प्रकृति एवं प्रभाव (Nature of Sutras & Impact)
पाणिनीय (अष्टाध्यायी) महर्षि पाणिनि ८ अध्याय प्रत्याहार, शब्दकृत लाघव, अनुवृत्ति, षड्विध सूत्र वैज्ञानिक, गणितीय, अल्पाक्षर किन्तु सर्वसमावेशी। टीका-परम्परा का मुख्य आधार।
कातन्त्र (कालापक) आचार्य शर्ववर्मन् ४ अध्याय प्रत्याहार-रहित, अर्थकृत लाघव, १४ स्वर अत्यन्त सरल, प्रारम्भिक अध्येताओं एवं बौद्ध/जैन परम्पराओं हेतु सुगम।
जैनेन्द्र (पञ्चाध्यायी) आचार्य देवनन्दि (पूज्यपाद) ५ अध्याय अल्पाक्षरी पारिभाषिक संज्ञाएँ, प्रत्याहार युक्त अत्यधिक क्लिष्ट, पाणिनीय शैली का अनुकरण एवं अति-संक्षिप्तीकरण।
टीका-परम्परा और षड्विध सूत्रों का व्यावहारिक विश्लेषण
षड्विध सूत्रों के तात्विक अर्थ, उनके पारस्परिक सम्बन्ध और प्रक्रिया को समझने के लिए भारतीय मनीषा ने एक विशाल टीका-वाङ्मय का सृजन किया है। मुनित्रय (पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि) के पश्चात् टीकाकारों ने इन सूत्रों के रहस्यों का उद्घाटन किया और उन्हें व्यावहारिक रूप दिया।
  • १. काशिका वृत्ति:
    जयादित्य और वामन (लगभग ६००-६५० ई.) द्वारा रचित 'काशिका वृत्ति' अष्टाध्यायी की सबसे प्रामाणिक और विशद वृत्ति है। भारवि के किरातार्जुनीयम् के उद्धरणों से इसका काल-निर्धारण होता है। काशिका में पाणिनीय सूत्रों की अनुवृत्ति और निवृत्ति को अत्यन्त स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है, जिससे अधिकार सूत्रों का भ्रम दूर होता है। परिभाषा सूत्रों के सन्दर्भ में "अनियमे नियमकारिणी परिभाषा" जैसी व्याख्याएँ काशिका और उसके परवर्ती बौद्ध आचार्य जिनेन्द्रबुद्धि कृत 'न्यास' (काशिकाविवरणपञ्जिका) तथा हरदत्त कृत 'पदमञ्जरी' में सुस्पष्ट की गई हैं।
  • २. वैयाकरण सिद्धान्तकौमुदी एवं प्रक्रिया ग्रन्थ:
    १७वीं शताब्दी में भट्टोजि दीक्षित ने अष्टाध्यायी के अध्याय-क्रम (जो विषय-वस्तु की दृष्टि से बिखरा हुआ था) को तोड़कर उसे 'प्रक्रिया-क्रम' में व्यवस्थित किया। "वैयाकरण सिद्धान्तकौमुदी" नामक इस युगान्तरकारी ग्रन्थ में ३९७५ सूत्रों को संज्ञा, परिभाषा, सन्धि, सुबन्त, तिङन्त, कृदन्त, तद्धित आदि प्रकरणों में विभक्त किया गया। इस नवीन क्रम ने षड्विध सूत्रों के अन्वय को और अधिक व्यावहारिक बना दिया, क्योंकि अब छात्र को एक ही शब्द की व्युत्पत्ति के लिए पूरी अष्टाध्यायी में नहीं भटकना पड़ता था, अपितु विधि, नियम और अतिदेश सूत्र एक ही स्थान पर उपलब्ध हो जाते थे। भट्टोजि दीक्षित के शिष्य वरदराज ने इसी आधार पर 'लघुसिद्धान्तकौमुदी', 'मध्यसिद्धान्तकौमुदी' और 'सारसिद्धान्तकौमुदी' की रचना की, जो आज भी संस्कृत शिक्षण के प्राथमिक प्रवेश-द्वार माने जाते हैं।
  • ३. परिभाषेन्दुशेखर:
    नागोजीभट्ट (नागेशभट्ट) का यह ग्रन्थ व्याकरण दर्शन का शिखर है, जो केवल 'परिभाषा' सूत्रों और व्याकरणिक ज्ञापकों पर केन्द्रित है। नागेशभट्ट ने अतिदेश और परिभाषा के मध्य के सूक्ष्म सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए यह सिद्ध किया है कि अलमात्र वृत्ति धर्म का अतिदेश कैसे प्रवृत्त और निवृत्त होता है। उन्होंने महाभाष्य के सिद्धान्तों के प्रकाश में नियमों के बलाबल (Strength of rules) का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया।
इन सभी ग्रन्थों में "संज्ञा च परिभाषा च..." कारिका को व्याकरण की मूलभूत कुंजी माना गया है। सिद्धान्तकौमुदी और लघुसिद्धान्तकौमुदी के संज्ञा-प्रकरण का आरम्भ ही 'अइउण्' आदि शिवसूत्रों से होता है, जहाँ "हलन्त्यम्", "उपदेशेऽजनुनासिक इत्" और "आदिरन्त्येन सहेता" जैसे संज्ञा और परिभाषा सूत्र सम्पूर्ण तन्त्र की आधारशिला रखते हैं।
निष्कर्ष
"संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियम एव च । अतिदेशोऽधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम् ॥" — यह श्लोक मात्र छह प्रकार के सूत्रों का परिगणन नहीं है, अपितु यह उस सम्पूर्ण संज्ञानात्मक वास्तुकला (Cognitive Architecture) का ब्लूप्रिंट है, जिस पर संस्कृत व्याकरण का प्रासाद खड़ा है।
महर्षि पाणिनि और उनके परवर्ती आचार्यों (शर्ववर्मन्, देवनन्दि आदि) ने भाषा के अनन्त प्रवाह को जिस गणितीय सटीकता के साथ इन षड्विध सूत्रों में निबद्ध किया है, वह आधुनिक भाषाविज्ञान (Linguistics) और संगणक विज्ञान (Computer Science) के लिए भी विस्मय का विषय है।
  • संज्ञा सूत्रों ने भाषा को पारिभाषिक चर (Variables) दिए, जिससे ग्रन्थ का आकार अत्यन्त सूक्ष्म हो गया।
  • परिभाषा सूत्रों ने विरोधाभासों को सुलझाने का तन्त्र (Exception handling) प्रदान किया।
  • विधि सूत्रों ने मुख्य कार्यान्वयन (Execution of morphological changes) किया।
  • नियम सूत्रों ने अतिव्याप्ति को रोककर सीमाएँ (Constraints) तय कीं।
  • अतिदेश सूत्रों ने एक तत्त्व के गुणों का दूसरे में आरोपण कर (Inheritance) प्रक्रिया को सुगम बनाया।
  • अधिकार सूत्रों ने पुनरावृत्ति को रोककर नियमों के कार्यक्षेत्र (Scope and Global domain) का निर्धारण किया।
महाभाष्यकार पतञ्जलि के शब्दों में अधिकार सूत्र सचमुच उस 'प्रदीप' की भाँति हैं जो एक देश में स्थित होकर सम्पूर्ण शास्त्र को प्रकाशित करते हैं (कश्चिदेकदेशस्थः सर्वं शास्त्रमभिज्वलयति)। चाहे वह पाणिनीय अष्टाध्यायी का विशद विवेचन हो, कातन्त्र व्याकरण की जनसुलभ सरलता हो, या जैनेन्द्र व्याकरण का क्लिष्ट संक्षिप्तीकरण हो, सभी व्याकरण सम्प्रदायों में इन्हीं षड्विध सूत्र-प्रकारों ने भाषा के यथार्थ और व्यावहारिक स्वरूप को अक्षुण्ण बनाए रखा है। यह सूत्र-प्रणाली भारतीय प्रज्ञा का वह अद्वितीय आविष्कार है जिसने न केवल संस्कृत भाषा को अमरत्व प्रदान किया, अपितु विश्व के समक्ष ज्ञान के संरचनात्मक संरक्षण की एक दोषरहित पद्धति भी प्रस्तुत की। यह शोध प्रमाणित करता है कि प्राचीन भारतीय व्याकरण परम्परा केवल शब्दों का अनुशासन नहीं है, अपितु यह मानव-मस्तिष्क की सर्वोच्च तार्किक क्षमता का मूर्त रूप है।

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