नीतिवचनानि (Nitivachanani) - Class 9 Sanskrit Chapter 4 Solutions | श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद

Sooraj Krishna Shastri
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नीतिवचनानि - संस्कृत पाठ ४ (कक्षा ९)

चतुर्थः पाठः - नीतिवचनानि

कक्षा ९ | इरावती (NCERT) | श्लोक, हिन्दी अनुवाद, शब्दार्थ एवं सम्पूर्ण अभ्यास कार्य

पाठ का परिचय: प्राचीन आचार्यों ने अपने अनुभवों एवं जीवन-मूल्यों को संक्षिप्त, सरल तथा प्रभावशाली वचनों के माध्यम से प्रस्तुत किया है, जिन्हें नीतिवचन कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ 'नीतिवचनानि' के श्लोक मुख्यतः नारायणपण्डित रचित हितोपदेश तथा भर्तृहरि प्रणीत नीतिशतकम् से संकलित हैं।

मूल श्लोक, अन्वय एवं हिन्दी अनुवाद

सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये यथा ॥१॥
अन्वयः: यथा सविता उदये रक्तः अस्तमये च रक्तः (भवति), तथा महतां सम्पत्तौ च विपत्तौ च एकरूपता (भवति)।
भावार्थ / अनुवाद: जिस प्रकार सूर्य उदय के समय लाल रंग का होता है और अस्त के समय भी लाल ही रहता है, ठीक उसी प्रकार महान (सज्जन) लोग सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) दोनों स्थितियों में एक समान (समभाव) रहते हैं। सुख-दुःख का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता।
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ॥२॥
अन्वयः: यौवनम्, धनसम्पत्तिः, प्रभुत्वम्, अविवेकिता च एतेषु एकैकम् अपि अनर्थाय भवति; यत्र चतुष्टयम् (तत्र) किमु (कथनीयम्) ?
भावार्थ / अनुवाद: युवावस्था, धन-सम्पत्ति, प्रभुत्व (अधिकार/सत्ता) और अविवेक (अज्ञानता/मूर्खता) — ये चारों मनुष्य के पतन का कारण होते हैं। इनमें से एक-एक भी बहुत बड़ा अनर्थ पैदा करता है। फिर जहाँ ये चारों एक साथ इकट्ठे हो जाएँ, वहाँ के विनाश के बारे में तो क्या ही कहना!
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥३॥
अन्वयः: 'दातव्यम्' इति यत् दानम् अनुपकारिणे देशे काले च पात्रे च दीयते, तत् दानम् सात्त्विकम् स्मृतम्।
भावार्थ / अनुवाद: 'दान देना हमारा कर्त्तव्य है', ऐसा मानकर जो दान बिना किसी प्रत्युपकार (बदले में कुछ पाने) की आशा के, उचित स्थान, उचित समय और योग्य व्यक्ति (सुपात्र) को दिया जाता है, विद्वानों द्वारा उस दान को सात्त्विक दान कहा गया है।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥४॥
अन्वयः: कुलस्य अर्थे एकं त्यजेत्। ग्रामस्य अर्थे कुलं त्यजेत्। जनपदस्य अर्थे ग्रामं त्यजेत्। आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।
भावार्थ / अनुवाद: कुल (परिवार) की भलाई के लिए एक व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए। गाँव की भलाई के लिए कुल (परिवार) का त्याग कर देना चाहिए। जनपद (देश/राज्य) की भलाई के लिए गाँव का त्याग कर देना चाहिए, और अपनी आत्मा (आत्म-कल्याण) के लिए पूरी पृथ्वी का भी त्याग कर देना चाहिए।
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यश्च विश्वासघातकः ।
ते नराः नरकं यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥५॥
अन्वयः: यः मित्रद्रोही, कृतघ्नः च, विश्वासघातकः च (भवति), ते नराः चन्द्रदिवाकरौ यावत् नरकं यान्ति।
भावार्थ / अनुवाद: जो मनुष्य मित्र से द्रोह (धोखा) करने वाला है, जो कृतघ्न (किए गए उपकार को न मानने वाला) है, और जो विश्वासघाती है, ऐसे पापी मनुष्य जब तक सूर्य और चन्द्रमा विद्यमान हैं, तब तक नरक की यातनाएँ भुगतते हैं।

शब्दार्थ (Word Meanings)

शब्दः (Sanskrit) हिंदी अर्थ (Hindi) English Meaning
यौवनम्युवावस्थाYouth
धनसम्पत्तिःधन-संपत्तिWealth, Prosperity
प्रभुत्वम् / आधिपत्यम्अधिकार, शासनAuthority
अविवेकिताविवेक का अभावLack of wisdom / Rashness
अनर्थाय / अहितायहानि के लिए (अनर्थ)For harm
दानम्दानCharity
अनुपकारिणेजो बदले में उपकार न करेTo one who cannot repay
देशेस्थान मेंPlace
कालेसमय परTime
पात्रेयोग्य व्यक्ति मेंWorthy person
सात्त्विकम्सत्त्वगुण से युक्त / शुद्धPure, Virtuous
कुलम्वंश / परिवारFamily, Lineage
ग्रामःगाँवVillage
मित्रद्रोहीमित्र से द्वेष करने वालाTraitor to a friend
कृतघ्नःउपकार न मानने वालाUngrateful person
विश्वासघातकःविश्वास तोड़ने वालाTraitor / Betrayer
सम्पत्तौसमृद्धि में (सुख में)In prosperity
विपत्तौविपत्ति में (दुःख में)In adversity
महताम्महान व्यक्तियों काOf great persons

अभ्यास कार्य (प्रश्न-उत्तर)

१. एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर)

क. यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वम् अविवेकिता च किमर्थं भवन्ति?
उत्तरम्: अनर्थाय
ख. सात्त्विकं दानं कस्मै दीयते?
उत्तरम्: अनुपकारिणे (अथवा पात्रे)
ग. ग्रामस्यार्थे किं त्यजेत्?
उत्तरम्: कुलम्
घ. मित्रद्रोही कुत्र गच्छति?
उत्तरम्: नरकम्
ङ. सम्पत्तौ विपत्तौ च केषाम् एकरूपता भवति?
उत्तरम्: महताम्

२. पट्टिकातः चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत

(मञ्जूषा: अविवेकिता, अनुपकारिणे, आत्मार्थे, अस्तमये, नरकं)

क. यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वम् अविवेकिता

ख. दातव्यमिति यद्दानं दीयते अनुपकारिणे

ग. ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।

घ. ते नराः नरकं यान्ति ।

ङ. उदये सविता रक्तः रक्तश्च अस्तमये यथा।

३. श्लोकांशान् मेलयत (सही मिलान कीजिए)

क (खंड) ख (खंड) - सही मिलान
क. यौवनं धनसम्पत्तिः ५. प्रभुत्वमविवेकिता
ख. दातव्यमिति यद्दानम् ४. दीयतेऽनुपकारिणे
ग. त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ३. ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्
घ. मित्रद्रोही कृतघ्नश्च २. यश्च विश्वासघातकः
ङ. सम्पत्तौ च विपत्तौ च १. महतामेकरूपता

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