|| बालोऽहं भो ! ||
(संस्कृत बाल-गीत)
भूमिका
बचपन जीवन का सबसे निश्छल और मधुर पड़ाव है। चाहे वे अयोध्या के राजकुमार श्री राम हों या कोई सामान्य बालक, बाल-सुलभ क्रीड़ाएं सभी की एक जैसी होती हैं। आचार्य सूरज कृष्ण शास्त्री जी द्वारा रचित यह संस्कृत गीत एक शिशु के मन के भावों को व्यक्त करता है—घुटनों के बल दौड़ना, माँ की गोद में बैठना और खिलौनों से खेलना।
बालोऽहं भो ! बालोऽहम् ।
क्रीडाकरणे निष्णातः ।।
जननी अङ्के तिष्ठामि ।
जानुभ्यां सह धावामि ।।
दुग्धाहारं परं प्रियम् ।
जलमपि पातुं इच्छामि ।।
मधुरं गीतं गायामि ।
मित्रैः सार्धं क्रीडामि ।।
शकटे रज्जुबन्धनं कृत्वा ।
त्वरितं-त्वरितं गच्छामि ।।
।। जय रघुनन्दन ।।
