|| गङ्गागीतम् ||
भागीरथि तव विमलं तोयम्
भूमिका
माँ गंगा का जल (तोयम्) केवल जल नहीं, बल्कि साक्षात अमृत है। जो भी इसके तट पर आता है, उसके दैहिक, दैविक और भौतिक ताप नष्ट हो जाते हैं। प्रस्तुत 'गङ्गागीतम्' में आचार्य सूरज कृष्ण शास्त्री जी ने माँ भागीरथी की चंचल लहरों और उनकी मोक्षदायिनी शक्ति का अत्यंत मनोहर वर्णन किया है।
भागीरथि ! तव विमलं तोयम् ।।
भागीरथि ! तव विमलं तोयम् ।।१।।
कलयति नादं भञ्जति तापम् ।
तरलतरङ्गैः धुन्वति पापम् ।।
चपलविलासैः स्फुरति मनोऽयम् ।
(भागीरथि ! तव विमलं तोयम्..।।२।।)
जय भागीरथि ! स्वर्गप्रदायिनि !
विबुधजनानां मोक्षप्रदायिनि ।।
कथं विस्मरति तव दासोऽहम् ।
(भागीरथि ! तव विमलं तोयम्..।।३।।)
।। हर हर गंगे ।।
