लक्ष्मण रेखा

Sooraj Krishna Shastri
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लक्ष्मण रेखा


कंत समुझि मन तजहु कुमतिही।

सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥

रामानुज    लघु     रेख    खचाई।

 सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥

  राम चरित मानस एवं शायद वाल्मीकि रामायण में भी कहीं पर भी लक्ष्मण रेखा का जिक्र नहीं है। मात्र लंका काण्ड में यही थोड़ा सा जिक्र है ।

   महारानी मंदोदरी रावण को समझती है कि हे कान्त! मन में समझकर (विचारकर) कुबुद्धि को छोड़ दो। आप से और श्री रघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है।

काल   दंड  गहि  काहु न मारा।

हरइ  धर्म  बल  बुद्धि  बिचारा ॥

निकट काल जेहि आवत साईं ।

तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं ॥

  हे प्राणनाथ ! काल किसी को लाठी लेकर नहीं मारता. वह व्यक्ति की बुद्धि, विचार, धर्म, बल को हर लेता है. जिसका काल निकट आ जाता है, उसे इसी प्रकार भ्रम हो जाता है. हर प्राणी की अंतरात्मा उसे अवश्य चेतावनी देती है. हाँ, यह दूसरी बात है कि अपने अहंकार और जय-जयकार में उसे वह आवाज सुनाई नहीं देती. "

नारी अपने सत्य धर्म के पालन में हिमालय से भी अधिक अविचल है । 

  "महाबली! आप चर-अचर, देव, दानव, मानव, यम, कुबेर, दिक्पाल और यहां तक कि साक्षात् काल को भी अपने बाहुबल से जीत सकते हैं, लेकिन एक सती-सतवंती नारी के मन को नहीं जीत सकते. नारी का हृदय दया, ममता और स्नेह का अगाध सागर है. स्त्री प्रेम में पंखुड़ी के समान कोमल है, पर अपने सत्य धर्म के पालन में वह हिमालय से भी अधिक अविचल है. पर्वत तो भूचाल से दहल सकते हैं, पर नारी का हृदय बड़े से बड़े प्रलोभन और भीषण भय से भी अपने धर्म से कण भर भी विचलित नहीं होता.।

पत्नी से बड़ा मित्र और कोई नहीं होता

  यदि इस समय मैं आपकी आँखों पर बंधी अहंकार की पट्टी खोलकर वास्तविक सत्य के दर्शन न कराऊँ तो मैं अपने कर्तव्य पालन से वंचित रह जाऊंगी, क्योंकि हर पत्नी का यह धर्म है कि कुमार्ग पर भटके पति को सत्य की राह पर ले आये. जैसे हर अच्छे मित्र का कर्तव्य होता है कि वह अपने मित्र से गाली सुनकर भी उसे कुमार्ग से बचाकर ले जाए, ऐसा ही पत्नी का भी धर्म है।

दुइ  सुत  मरे  दहेउ पुर  अजहुँ  पूर  पिय  देहु ।

कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु ॥

  हे नाथ ! यह दुराग्रह करने का अवसर नहीं है. आपके दो पुत्र मारे गए, नगर जल गया, अब भी अपनी भूल का सुधार कर लीजिये. यदि आप चाहें तो इतिहास और काल के धारे को मृत्यु से जीवन की ओर मोड़ सकते हैं. आपकी आने वाली पीढ़ियां आपकी ऋणी रहेंगी. श्रीराम ने स्वयं आपको संधि का प्रस्ताव भेजा है, ताकि लंका महाविनाश से बच जाए. भीषण युद्ध होने और युद्ध में होने वाली जनहानि को रोका जा सके. सीता जी को सम्मान सहित लौटाकर उनके संधि प्रस्ताव को स्वीकार कर लीजिये नाथ।

   तब रावण क्रोध में भरकर मंदोदरी से कहता है, "बूढ़े कायरों की बातों में आकर तुम क्या कह रही हो, यह तुम नहीं जानती. तुम मुझे उस तुच्छ वनवासी मानव के चरणों में शीश झुकाकर उससे क्षमा मांगने को कह रही हो? उस रावण को जो तीनों लोकों को जीत चुका है, उस रावण को जो कैलाश को भी उठाने की शक्ति रखता है. उस रावण को जो नवग्रहों को भी अपने दरबार में खड़ा रखता है. उस रावण को एक तुच्छ नर के सामने गिड़गिड़ाने को कह रही हो तुम ?

रामानुज    लघु    रेख     खचाई।

सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ॥

आज के परिवेश में क्या है यह लक्ष्मण रेखा ?

 कहा यही जाता है कि जीवन के विभिन्न कार्य-व्यापारों में मनुष्य को कुछेक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए, उन सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए जो नैतिकता, वैधानिकता, अथवा स्थापित परंपरा के आधार पर समाज में स्वीकारी गयी हैं।

  जब भी कोई ऐसे प्रतिबंधों का उल्लंघन कर बैठता है तो उस पर "लक्ष्मण रेखा पार कर दी' का आरोप लगा दिया जाता है। आजकल अपने देश की राजनीति के संदर्भ में भी इस 'रेखा' का उल्लेख बहुधा देखा जाता है। यह बात अलग है कि उसका उल्लंघन करना राजनेताओं का अधिकार या विशिष्टाधिकार बन चुका है । मतलब यह कि 'लक्ष्मण रेखा' प्रायः सभी के लिए एक सुपरिचित पदबंध अथवा सामासिक शब्द है। 

 प्रायः सभी इसका संबंध उस कथा से जोड़ते हैं, जिसमें रावण द्वारा सीता का अपहरण न होने पाए इस उद्येश्य से सीता की पर्णकुटी के चारों ओर लक्ष्मण ने 'कथित तौर पर अभिमंत्रित सुरक्षा घेरा खींचा था। वैसे गोस्वामी तुलसीदास जी गीतावली में लिखते हैं।

कहे  कटु  वचन  रेख  लाघी  मै  तात   क्षमा  सो  कीजै ।

परी बधिक बस राज मरालिन लखन लाल छिनि लीजै॥

 रावण के रथ पर बिलाप करती हुई सीता जी का कथन जो लक्ष्मण को संबोधित है । उसका विवरण है। वैसे तो लक्ष्मण रेखा का वर्णन हमारे वेदों में वर्णित है। इस विद्या को सोमतिती विद्या या लक्ष्मण रेखा कहा गया। महर्षि वशिष्ठ जी के चार गुरुकुलों में यह विद्या सिखाई जाती थी।इसका विस्तृत वर्णन है ।

 पृथ्वी के केन्द्र बिन्दु पर यंत्र लगाते थे इसके द्वारा वायु अग्नि जल को शोषित करने की क्षमता होती थी। पृथ्वी पर जिस स्थान पर गोलाकार रेखा खींच दी जाती थी जैसे ही इसका स्पर्श किसी के द्वारा होता था तब लेजर की तरह कार्य करना प्रारम्भ कर देती थी। और विद्युत करेंट जैसा झटका लगता था।

तुलसी असमय  के  सखा, साहस धर्म विचार।

सुकृत, सील, सुभाव रिजु, राम-चरन-आधार॥

   तुलसी दास जी कहते हैं कि भगवान् राम के चरण भक्तों के लिए दु:ख के दिनों में साथी हैं। ये उत्साह, धर्म, विचार, पुण्य, सुशीलता और सरल स्वभाव के आधार हैं, अत: उन्हीं के चरणों का आश्रय लो।

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