कारक प्रकरणम् (कारक परिचय)
क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्। अथवा 'क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्'
परिभाषा: संस्कृत व्याकरण में जो शब्द साक्षात् रूप से क्रिया (Verb) के सम्पादन में सहायक होता है, अर्थात् जिसका क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध होता है, उसे 'कारक' कहते हैं। वाक्य में क्रिया के बिना कारक का कोई अस्तित्व नहीं होता।
कर्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणं इत्याहुः कारकाणि षट् ॥
पाणिनि के अनुसार संस्कृत में मुख्य रूप से छः (6) कारक होते हैं: कर्तृ, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण।
षट् कारक एवं उनके पाणिनीय सूत्र
नीचे सभी छः कारकों के 'संज्ञा सूत्र' (जो कारक का नाम तय करते हैं) और 'विभक्ति विधायक सूत्र' (जो उनमें विभक्ति लगाते हैं) का विस्तृत वर्णन दिया गया है:
१. कर्तृ कारक (प्रथमा विभक्ति)
व्याख्या: क्रिया को करने में जो स्वतन्त्र होता है (अर्थात् जिसकी प्रधानता होती है), उसे कर्ता कहते हैं। कर्तृवाच्य में कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है।
२. कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)
व्याख्या: कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिसे सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है (ईप्सिततम), उसकी कर्म संज्ञा होती है और अनुक्त कर्म में द्वितीया विभक्ति लगती है।
३. करण कारक (तृतीया विभक्ति)
व्याख्या: क्रिया की सिद्धि में जो साधन सबसे अधिक सहायक (प्रकृष्ट उपकारक) होता है, उसकी करण संज्ञा होती है और उसमें तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
४. सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)
व्याख्या: दान कर्म के द्वारा कर्ता जिसे संतुष्ट करना चाहता है (या जिसे कुछ दिया जाता है), उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और उसमें चतुर्थी विभक्ति लगती है।
५. अपादान कारक (पञ्चमी विभक्ति)
व्याख्या: अपाय (अलग होने) के अर्थ में जो ध्रुव (स्थिर या अवधिभूत) होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है और उसमें पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।
६. अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति)
व्याख्या: कर्ता और कर्म के द्वारा होने वाली क्रिया का जो आधार (Base/Location) होता है, उसकी अधिकरण संज्ञा होती है और उसमें सप्तमी विभक्ति लगती है।
संस्कृत कारकों की विस्तृत सारणी (चार्ट)
| क्र० | कारक | विभक्ति | कारक चिह्न (हिन्दी) | महत्वपूर्ण उदाहरण (५-५ वाक्य) |
|---|---|---|---|---|
| १ | कर्तृ | प्रथमा | ने |
१. रामः गच्छति। २. सीता गायति। ३. बालकः पठति। ४. पक्षी उड्डयते। ५. गौः चरति। |
| २ | कर्म | द्वितीया | को |
१. रामः पुस्तकं पठति। २. सीता फलं खादति। ३. बालकः गृहं गच्छति। ४. कृषकः क्षेत्रं कर्षति। ५. गुरुः शिष्यं पाठयति। |
| ३ | करण | तृतीया | से, के द्वारा |
१. रामः हस्तेन खादति। २. कृषकः हलेन कर्षति। ३. बालकः कन्दुकेन क्रीडति। ४. सः नेत्राभ्यां पश्यति। ५. सीता लेखन्या लिखति। |
| ४ | सम्प्रदान | चतुर्थी | को, के लिए |
१. माता बालकाय फलम् ददाति। २. पिता पुत्राय धनं यच्छति। ३. सः पठनाय विद्यालयं गच्छति। ४. सीता भिक्षुकाय वस्त्रं ददाति। ५. गुरुवे नमः (उपपद विभक्ति)। |
| ५ | अपादान | पञ्चमी | से (अलग होना) |
१. फलं वृक्षात् पतति। २. अश्वारोही अश्वात् पतति। ३. गङ्गा हिमालयात् प्रभवति। ४. शिष्यः गुरुकुलात् आगच्छति। ५. मुनिः ग्रामात् गच्छति। |
| ६ | अधिकरण | सप्तमी | में, पर |
१. रामः ग्रामे वसति। २. खगाः वृक्षेषु कूजन्ति। ३. बालकः उद्याने क्रीडति। ४. मीनाः जले तरन्ति। ५. मुनिः आसने तिष्ठति। |

