कारक प्रकरण (संस्कृत व्याकरण) - परिभाषा, पाणिनीय सूत्र, भेद एवं उदाहरण | Karaka in sanskrit

Sooraj Krishna Shastri
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कारक प्रकरणम् (कारक परिचय)

क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्। अथवा 'क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्'

परिभाषा: संस्कृत व्याकरण में जो शब्द साक्षात् रूप से क्रिया (Verb) के सम्पादन में सहायक होता है, अर्थात् जिसका क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध होता है, उसे 'कारक' कहते हैं। वाक्य में क्रिया के बिना कारक का कोई अस्तित्व नहीं होता।

कर्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च ।
अपादानाधिकरणं इत्याहुः कारकाणि षट् ॥

पाणिनि के अनुसार संस्कृत में मुख्य रूप से छः (6) कारक होते हैं: कर्तृ, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण।

महत्वपूर्ण तथ्य (प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु): संस्कृत में 'सम्बन्ध' (षष्ठी विभक्ति) और 'सम्बोधन' को कारक नहीं माना जाता है। क्योंकि इनका साक्षात् सम्बन्ध क्रिया से नहीं होता है (जैसे- 'रामस्य पुत्रः गच्छति' में जाने की क्रिया पुत्र कर रहा है, राम नहीं, अतः 'रामस्य' कारक नहीं है)।

षट् कारक एवं उनके पाणिनीय सूत्र

नीचे सभी छः कारकों के 'संज्ञा सूत्र' (जो कारक का नाम तय करते हैं) और 'विभक्ति विधायक सूत्र' (जो उनमें विभक्ति लगाते हैं) का विस्तृत वर्णन दिया गया है:

१. कर्तृ कारक (प्रथमा विभक्ति)

कारक संज्ञा सूत्र: स्वतन्त्रः कर्ता (१.४.५४) विभक्ति विधायक सूत्र: प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा (२.३.४६)

व्याख्या: क्रिया को करने में जो स्वतन्त्र होता है (अर्थात् जिसकी प्रधानता होती है), उसे कर्ता कहते हैं। कर्तृवाच्य में कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है।

रामः गच्छति। (राम जाता है)
गौः चरति। (गाय चरती है)

२. कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)

कारक संज्ञा सूत्र: कर्तुरीप्सिततमं कर्म (१.४.४९) विभक्ति विधायक सूत्र: कर्मणि द्वितीया (२.३.२)

व्याख्या: कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिसे सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है (ईप्सिततम), उसकी कर्म संज्ञा होती है और अनुक्त कर्म में द्वितीया विभक्ति लगती है।

रामः पुस्तकं पठति। (राम पुस्तक पढ़ता है)
बालकः ओदनं खादति। (बालक चावल खाता है)

३. करण कारक (तृतीया विभक्ति)

कारक संज्ञा सूत्र: साधकतमं करणम् (१.४.४२) विभक्ति विधायक सूत्र: कर्तृकरणयोस्तृतीया (२.३.१८)

व्याख्या: क्रिया की सिद्धि में जो साधन सबसे अधिक सहायक (प्रकृष्ट उपकारक) होता है, उसकी करण संज्ञा होती है और उसमें तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।

सः कलमेन लिखति। (वह कलम से लिखता है)
रामः बाणेन रावणं हन्ति। (राम बाण से रावण को मारते हैं)

४. सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)

कारक संज्ञा सूत्र: कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् (१.४.३२) विभक्ति विधायक सूत्र: चतुर्थी सम्प्रदाने (२.३.१३)

व्याख्या: दान कर्म के द्वारा कर्ता जिसे संतुष्ट करना चाहता है (या जिसे कुछ दिया जाता है), उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और उसमें चतुर्थी विभक्ति लगती है।

नृपः विप्राय गां ददाति। (राजा ब्राह्मण को गाय देता है)
माता बालकाय मोदकं यच्छति। (माता बालक को लड्डू देती है)

५. अपादान कारक (पञ्चमी विभक्ति)

कारक संज्ञा सूत्र: ध्रुवमपायेऽपादानम् (१.४.२४) विभक्ति विधायक सूत्र: अपादाने पञ्चमी (२.३.२८)

व्याख्या: अपाय (अलग होने) के अर्थ में जो ध्रुव (स्थिर या अवधिभूत) होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है और उसमें पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।

वृक्षात् पत्रं पतति। (वृक्ष से पत्ता गिरता है)
गङ्गा हिमालयात् प्रभवति। (गंगा हिमालय से निकलती है)

६. अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति)

कारक संज्ञा सूत्र: आधारोऽधिकरणम् (१.४.४५) विभक्ति विधायक सूत्र: सप्तम्यधिकरणे च (२.३.३६)

व्याख्या: कर्ता और कर्म के द्वारा होने वाली क्रिया का जो आधार (Base/Location) होता है, उसकी अधिकरण संज्ञा होती है और उसमें सप्तमी विभक्ति लगती है।

पक्षी वृक्षे तिष्ठति। (पक्षी वृक्ष पर बैठा है)
वयं ग्रामे वसामः। (हम गाँव में रहते हैं)

संस्कृत कारकों की विस्तृत सारणी (चार्ट)

क्र० कारक विभक्ति कारक चिह्न (हिन्दी) महत्वपूर्ण उदाहरण (५-५ वाक्य)
कर्तृ प्रथमा ने १. रामः गच्छति।
२. सीता गायति।
३. बालकः पठति।
४. पक्षी उड्डयते।
५. गौः चरति।
कर्म द्वितीया को १. रामः पुस्तकं पठति।
२. सीता फलं खादति।
३. बालकः गृहं गच्छति।
४. कृषकः क्षेत्रं कर्षति।
५. गुरुः शिष्यं पाठयति।
करण तृतीया से, के द्वारा १. रामः हस्तेन खादति।
२. कृषकः हलेन कर्षति।
३. बालकः कन्दुकेन क्रीडति।
४. सः नेत्राभ्यां पश्यति।
५. सीता लेखन्या लिखति।
सम्प्रदान चतुर्थी को, के लिए १. माता बालकाय फलम् ददाति।
२. पिता पुत्राय धनं यच्छति।
३. सः पठनाय विद्यालयं गच्छति।
४. सीता भिक्षुकाय वस्त्रं ददाति।
५. गुरुवे नमः (उपपद विभक्ति)।
अपादान पञ्चमी से (अलग होना) १. फलं वृक्षात् पतति।
२. अश्वारोही अश्वात् पतति।
३. गङ्गा हिमालयात् प्रभवति।
४. शिष्यः गुरुकुलात् आगच्छति।
५. मुनिः ग्रामात् गच्छति।
अधिकरण सप्तमी में, पर १. रामः ग्रामे वसति।
२. खगाः वृक्षेषु कूजन्ति।
३. बालकः उद्याने क्रीडति।
४. मीनाः जले तरन्ति।
५. मुनिः आसने तिष्ठति।
॥ इति कारक-परिचय-प्रकरणम् सविस्तारं सम्पूर्णम् ॥

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