Bhaddari: Famine Signs
महँगी और अकाल के लक्षण (सम्पूर्ण संग्रह: 1-86)
तै दिन सावन धूरि उड़ाई ॥ १ ॥
अर्थ: जेठ के महीने में जितने दिन तक पुरवा हवा चलेगी, सावन के महीने में उतने ही दिनों तक सूखा पड़ेगा (वर्षा नहीं होगी)।
चार मास सूखा रहे, कहें भड्डरी देख ॥ २ ॥
अर्थ: यदि भादों बदी एकादशी को बादल टुकड़े-टुकड़े न हों (घने रहें), तो लगातार चार महीनों तक बारिश न होगी।
तुम जाओ पिय मालवा, हम जायें पितुसार ॥ ३ ॥
अर्थ: यदि सावन कृष्ण पंचमी को जोरों की हवा चले तो अकाल पड़ेगा। पत्नी कहती है—तुम कमाने मालवा जाओ, मैं मायके (पितुसार) जाती हूँ।
अर्थ: यदि रात में आकाश साफ हो और दिन में बादल घिरें, तो भड्डर कहते हैं कि बारिश नहीं होगी।
पानी परै न धरनि पर, जीवे बिरला कोय ॥ ५ ॥
अर्थ: यदि जेठ बदी दसमी को शनिवार हो, तो भीषण सूखा पड़ता है। शायद ही कोई जिन्दा रह सके।
पशू बेच कन संचय कीजै, अवसि दुकाली होय ॥ ६ ॥
अर्थ: फाल्गुन और चैत्र की अमावस्या मंगलवार को पड़े तो अकाल पक्का है। पशु बेचकर अनाज इकट्ठा कर लो।
भड्डर जोसी कहत हैं, नाज किरानो लोय ॥ ७ ॥
अर्थ: माघ सुदी सप्तमी को मङ्गलवार पड़े तो अनाजों में कीड़े लग जाते हैं (नाश होता है)।
तो जानों की भादवों, बिन जल कोरो जाय ॥ ८ ॥
अर्थ: माघ सुदी पंचमी को अच्छी हवा चले तो भादों का महीना बिना पानी के सूखा चला जाएगा।
मूल विसाखा पूर्वाषाढ़ । सूरा जानो नियरे ठाढ़ ॥ ९ ॥
अर्थ: यदि पौष की अमावस्या को मूल, विशाखा या पूर्वाषाढ़ नक्षत्र हो तो समझ लो कि अकाल (सूरा) सिर पर खड़ा है।
भड्डर कहें अकाल पड़तु हैं, बीज बये नहिं कोय ॥ १० ॥
अर्थ: फाल्गुन में पाँच मङ्गल और पौष में पाँच शनिवार पड़ें तो अकाल पड़ता है। खेत में बीज नहीं बोना चाहिए।
घोड़ा रोड़ा टिड्डी उड़े, राजा मरै कि धरती जरै ॥ ११ ॥
अर्थ: सोमवार/मंगलवार को शिवरात्रि हो और पछुवाँ हवा चले तो टिड्डियाँ उड़ेंगी, राजा मरेगा या धरती जल जाएगी (सूखा)।
तो सरवर भी सूखिहैं, सब जल जैहैं खोय ॥ १२ ॥
अर्थ: माघ सुदी नवमी को आकाश साफ (बादल रहित) हो तो तालाब भी सूख जायेंगे, भीषण अकाल पड़ेगा।
हम जाऊँ पिय मायके, तुम जाओ गुजरात ॥ १३ ॥
अर्थ: सावन बदी एकादशी को बादल केवल गरजें (बरसें नहीं), तो अकाल पड़ेगा। मैं मायके जाती हूँ, तुम गुजरात जाओ।
हाली अन्ने संग्रहौ, दूनो भाव बढ़न्त ॥ १४ ॥
अर्थ: सावन में चित्रा, स्वाती और विशाखा में पानी न बरसे तो अन्न इकट्ठा कर लो, भाव दुगुना बढ़ेगा।
अर्थ: आगे मघा नक्षत्र हो और पीछे सूर्य हो, तो वर्षा ओस के समान (बहुत कम) होती है।
चौपद नासै चहुँ दिशा, जीवन की नहिं आस ॥ १६ ॥
अर्थ: आषाढ़ में मंगल आगे और सूर्य पीछे हो तो चौपायों का नाश होता है और जीवन की आशा नहीं रहती।
काल पड़े राजा लड़ें, मनई सकल भ्रमन्त ॥ १७ ॥
अर्थ: माघ सुदी सप्तमी को सोमवार हो तो अकाल पड़ता है, राजा लड़ते हैं और लोग परेशान रहते हैं।
जौ गेहूँ संग्रह करें, महँगी होसी पेख ॥ १८ ॥
अर्थ: माघ सुदी तीज को बादल-बिजली दिखें तो जौ-गेहूँ इकट्ठा कर लो, महँगाई होगी।
तो भड्डर यों कहत हैं, कालहिं आवे कूद ॥ १९ ॥
अर्थ: कृतिका खाली गई और आर्द्रा में भी बूँद न पड़ी, तो समझो अकाल कूदकर आ गया।
जोतिसी भड्डर कहत हैं, काल पड़े चहुँ ओर ॥ २० ॥
अर्थ: आषाढ़ बदी नवमी को घनघोर गर्जना हो तो चारों ओर अकाल पड़ता है।
अल्प वृष्टि तब जानिये, सकलै पड़सी झूर ॥ २१ ॥
अर्थ: जब मंगल आगे और सूर्य पीछे हो तो बहुत थोड़ी बारिश होती है और सूखा पड़ता है।
तेज अन्न अरु मन्द जल, बिरला बिहरै कोय ॥ २२ ॥
अर्थ: सावन कृष्ण दशमी को रोहिणी नक्षत्र हो तो अन्न महँगा और वर्षा कम होती है।
इन मंगल आँधी चले, होवे बरखा हीन ॥ २३ ॥
अर्थ: मंगलवार के दिन आर्द्रा, भरणी, रोहिणी, मघा या तीनों उत्तरा में आँधी चले तो वर्षा नहीं होती।
भाखै जोसी भड्डरी, दुर्भिछ अवसि परन्त ॥ २४ ॥
अर्थ: ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को आर्द्रा नक्षत्र बरसे तो अवश्य ही दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ता है।
हाथ में खपरा मेदिना दर-दर माँगै भीख ॥ २५ ॥
अर्थ: चैत्र में एक घड़ी भी रोहिणी हो तो ऐसा अकाल पड़ता है कि लोग भीख माँगते फिरते हैं।
मूल असाढ़ी जो रहे, धरती कम्पन होय ॥ २६ ॥
अर्थ: ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा को बुधवार और आषाढ़ पूर्णिमा को मूल नक्षत्र हो तो भूचाल आता है।
गोरी बीनत काँकरी, खड़ी खेजड़ी हेठ ॥ २७ ॥
अर्थ: मृगशिरा में हवा न चले और जेठ में रोहिणी न तपे, तो सूखा पड़ता है। (किसान की स्त्री कंकड़ बीनती है)।
जाओ तुम पिय मालवा, आया दुख का फन्दा ॥ २८ ॥
अर्थ: आषाढ़ पूर्णिमा को यदि चाँद निर्मल (साफ) दिखे (बादल न हों), तो मालवा चले जाओ, यहाँ दुख का फंदा आ गया है।
जो पच्छिम से पूरब जाय । तो जानो वर्षा घट जाय ॥ २९ ॥
अर्थ: पूरब से पश्चिम जाते बादल भारी वर्षा करते हैं, लेकिन पश्चिम से पूरब जाने पर वर्षा घट जाती है।
गेहूँ, गोरस, गोरड़ा, यह सब जावे खोय ॥ ३० ॥
अर्थ: मीन का शनि, कर्क का गुरु और तुला का मंगल हो तो गेहूँ, दूध और ईख नष्ट हो जाते हैं।
भाखै भड्डर जोतिसी, निहचै होय अकाल ॥ ३१ ॥
अर्थ: रात में कौवा और दिन में सियार बोले, तो निश्चय ही अकाल पड़ता है।
एक बूँद कृतिका पड़े, बिनसै तीनों तूर ॥ ३२ ॥
अर्थ: रोहिणी की वर्षा बेकार है, लेकिन कृतिका नक्षत्र में एक बूँद भी पड़ जाए तो तीनों फसलें नष्ट हो जाती हैं।
चौथे या पाँचों दिवस, रुंड-मुँड महि मान ॥ ३३ ॥
अर्थ: सूर्योदय के समय पश्चिम में इन्द्रधनुष दिखे तो 4-5 दिन में पृथ्वी पर शवों के ढेर (रुंड-मुंड) लग जाते हैं (युद्ध/महामारी)।
पिया जाइके मालवा, माँगि के खइहें भीख ॥ ३४ ॥
अर्थ: आषाढ़ बदी अष्टमी को चन्द्रमा निर्मल (साफ) दिखे तो अकाल पड़ता है। पति को मालवा जाकर भीख माँगनी पड़ेगी।
अर्थ: एक महीने में दो ग्रहण (सूर्य/चंद्र) लगें तो अनाज बहुत महँगा होता है।
खप्पर ले डोलत फिरै, भीख न देने कोय ॥ ३६ ॥
अर्थ: संक्रान्ति और अमावस्या एक ही दिन पड़ें तो ऐसा अकाल पड़ता है कि खप्पर लेकर घूमने पर भी भीख नहीं मिलती।
पान और नारियल तै, निहचै महँग बिकान ॥ ३७ ॥
अर्थ: माघ सुदी चौथ को बादल हों और पानी बरसे तो पान और नारियल महँगा बिकता है।
की फागुन रोली पढ़ें, की महँगी सावन होय ॥ ३८ ॥
अर्थ: माघ शुक्ल अष्टमी को कृतिका नक्षत्र हो तो फागुन में अकाल या सावन में महँगाई होती है।
रहे सातवें निर्मली, बीत गई सब आस ॥ ३९ ॥
अर्थ: माघ शुक्ल षष्ठी को बादल न गरजें तो कपास महँगी होती है; और सप्तमी को आकाश साफ रहे तो सारी आशा खत्म।
छत्रिय सों क्षत्रिन मिलि जूझै, निहचें काल पड़न्त ॥ ४० ॥
अर्थ: आषाढ़ बदी परिवा को बादल गरजें तो क्षत्रियों में युद्ध होता है और अकाल पड़ता है।
जाय बसो परदेश में, परिहैं काल सुगाढ़ ॥ ४१ ॥
अर्थ: आषाढ़ में चित्रा, स्वाती और विशाखा नक्षत्र बरसें तो भीषण अकाल पड़ता है। परदेस चले जाना ही बेहतर है।
राजा विग्रह प्रजा छय, मरण सभी का होय ॥ ४२ ॥
अर्थ: शनि मीन या तुला राशि में हो तो राजाओं में लड़ाई, प्रजा का नाश और सबका मरण होता है।
घीव तेल की जानिये, महँगी होय दुचन्द ॥ ४३ ॥
अर्थ: माघ सुदी अष्टमी को सोमवार हो तो घी और तेल का भाव दुगुना हो जाता है।
तो जल मिलिहें कूप में, या गंगा असनान ॥ ४४ ॥
अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को सूर्य साफ निकले (बादल न हों) तो अकाल पड़ता है। पानी केवल कुओं या गंगा में मिलता है।
सवन बिना हो स्रवनी, निकलै आधा बीज ॥ ४५ ॥
अर्थ: अमावस को मूल, अक्षयतृतीया को रोहिणी और सावन पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र न हो, तो बीज आधा ही जमता है।
धनुष उगन्ते पच्छिम दुःख से करे पुकार ॥ ४६ ॥
अर्थ: भादों की अमावस्या को रविवार हो और सूर्योदय के समय पश्चिम में इन्द्रधनुष दिखे, तो प्राणी दुःख से पुकार उठते हैं।
समया नीको नीखरो, भड्डर करें विचार ॥ ४७ ॥
अर्थ: कुआर बदी अमावस्या को शनिवार हो तो समय सामान्य रहता है (न बहुत अच्छा, न बहुत बुरा)।
हाली बेंचो बधिया, खेती गुन न लखाय ॥ ४८ ॥
अर्थ: मूल और रोहिणी गल जाएँ (बरसें) और आर्द्रा में हवा चले, तो बैल बेच दो। खेती में कोई लाभ नहीं होगा।
घना गयन्दा रन चढ़े, उपजी खेती जाय ॥ ४९ ॥
अर्थ: स्वाती में दिवाली और कार्तिक सुदी परिवा (गोवर्धन) को विशाखा हो तो युद्ध होता है और फसल नष्ट हो जाती है।
तो यों भाखें भड्डरी, महँगा अन्न बिकाय ॥ ५० ॥
अर्थ: माघ शुक्ल द्वितीया को बादल-बिजली हो तो अनाज बहुत महँगा बिकेगा।
तो जानो मन माँहि यह, गर्भ गला सब जोय ॥ ५१ ॥
अर्थ: चैत्र बदी दशमी को बादल-बिजली हो तो 'वर्षा का गर्भ' गल जाता है, यानी बारिश बहुत कम होगी।
राखी श्रवणो हीन विचारो । कातिक पूनो कृतिका टारो ॥
धरती पर खल बलहिं प्रकासै । भड्डर कहते धानै नासै ॥ ५२ ॥
अर्थ: अक्षयतृतीया को रोहिणी, पूस अमावस को मूल, सावन पूर्णिमा को श्रवण और कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका न हो, तो दुष्टों का उपद्रव बढ़ता है और धान का नाश होता है।
अर्थ: जेठ के तपने वाले दिनों (दसतपा) में थोड़ी भी बारिश हो जाए, तो आगे के सारे नक्षत्र कमजोर (ओछे) पड़ जाते हैं।
सुक्र अस्त सावन रहे, महाकाल अवरेख ॥ ५४ ॥
अर्थ: आषाढ़ शुक्ल में बुध का उदय और सावन में शुक्र अस्त हो, तो महाकाल (भयंकर अकाल) पड़ता है।
अर्थ: आगे मघा और पीछे सूर्य हो तो सूखा पड़ता है, किसान पानी के लिए तरसते हैं।
की बल पावे कूप में, की कामिनी सीस धरै ॥ ५६ ॥
अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को चाँद साफ निकले तो पानी की कमी हो जाती है, पानी केवल कुएँ में मिलता है।
पिया जाब तू मालवा, हम जायें गुजरात ॥ ५७ ॥
अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को आधी रात में वर्षा हो तो अकाल पड़ेगा। पति मालवा और पत्नी गुजरात जाने की बात करते हैं।
दिवस जु चौथे पाँचवें, रकत बहन्तो देस ॥ ५८ ॥
अर्थ: सूर्य के पहले गुरु हो और चन्द्रमा शुक्र में प्रवेश करे तो 4-5 दिन में देश में खून बहेगा (लड़ाई होगी)।
अद्रा में बरसै नहीं, सहै कौन अलसेठ ॥ ५९ ॥
अर्थ: मृगशिरा में हवा/बादल न हो, जेठ में रोहिणी न तपे और आर्द्रा में न बरसे, तो खेती करना बेकार है (सिरदर्दी है)।
जो संक्रम तो जानिये, संवत्त महँगो जात ॥ ६० ॥
अर्थ: रिक्ता तिथि और क्रूर दिन (शनि/मंगल) को संक्रान्ति पड़े तो पूरा साल महँगा जाता है।
चाँदी सोना बेंचकर, नाज बेसाहो आज ॥ ६१ ॥
अर्थ: जिस साल दो भादों, दो कुआर या दो आषाढ़ (अधिक मास) पड़ें, तो सोना-चाँदी बेचकर अनाज खरीद लो (महँगाई आएगी)।
बैलन को पिय बेंच के, लरिका जाय जियाय ॥ ६२ ॥
अर्थ: सावन में पुरुवा और भादों में पछुवाँ बहे तो सूखा पड़ता है। बैल बेचकर बच्चों का पेट पालना पड़ेगा।
अर्थ: जिस महीने में तेरह दिनों का पक्ष पड़े, उस साल बैशाख में अनाज महँगा होगा।
हम जायें पिय मायके, तुम करलो गुजरान ॥ ६४ ॥
अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को सूर्य साफ दिखे तो सूखा पड़ेगा। पत्नी मायके जाने को कहती है।
संक्रम हो तो जानिये, महँगा नाज बिकाहिं ॥ ६५ ॥
अर्थ: ज्येष्ठा, आर्द्रा, शतभिषा, स्वाती या आश्लेषा में संक्रान्ति पड़े तो अनाज महँगा होता है।
अर्थ: भादों में जितने दिन पछुवाँ हवा चलेगी, माघ में उतने ही दिन पाला (ठारी) पड़ेगा।
तो यों भाखें भड्डरी, परची न होय ॥ ६७ ॥
अर्थ: मघा आदि पाँच नक्षत्रों में यदि शुक्र पश्चिम दिशा में हो तो वर्षा नहीं होती।
पंद्रह महुरत की हो जोय, पूरत देश विरानो होय ॥ ७९ ॥
अर्थ: कर्क संक्रान्ति मंगलवार और मकर शनिवार को हो (और 15 मुहूर्त की हो), तो पूरा देश वीरान हो जाता है (अकाल)।
बुध, बिहफै सुक्रे भरै कोठार । सनि मंगल बीजन आवै द्वार ॥ ८० ॥
अर्थ: रविवार को खेती शुरू करने वाला धनवान, सोम को सेवक, बुध-गुरु-शुक्र को करने वाला समृद्ध होता है। शनि-मंगल को करने से बीज भी वापस नहीं आता।
अर्थ: एक ही राशि पर छह ग्रह आ जाएँ तो महाकाल (प्रलय जैसा संकट) आता है।
सजल होय निरजल कहत, निरजल सजल प्रत्यक्ष ॥ ८२ ॥
अर्थ: जेठ सुदी में आर्द्रा आदि 10 नक्षत्रों में बारिश हो जाए तो सूखा पड़ता है। न बरसे तो आगे अच्छी वर्षा होती है।
सरसो अरु तेलन की, नित्ते महंगी होय ॥ ८३ ॥
अर्थ: माघ सुदी परिवा को बादल और बिजली हो तो सरसों और तेल का भाव रोज बढ़ता है।
दूना विगुना, चौगुना, अन्न की बढ़ती होय ॥ ८४ ॥
अर्थ: पौष अमावस को शनि, रवि या मंगल हो तो अन्न का भाव दुगुना-चौगुना बढ़ जाता है।
स्वाति नखत अरु आयुष जोगा । पढ़ें काल नासै सब लोगा ॥ ८५ ॥
अर्थ: दिवाली को शनि, रवि या मंगल हो, साथ ही स्वाति नक्षत्र और आयुष्य योग हो तो काल (अकाल) पड़ता है और लोग मरते हैं।
तो फिर भाखै भड्डरी, कीड़ा लगि लगि आय ॥ ८६ ॥
अर्थ: कर्क राशि में ककड़ी बोने और सिंह राशि तक न तोड़ने से उसमें कीड़े लग जाते हैं।

