Bhaddari Ki Kahawat: Famine & Inflation (Complete) - अकाल के लक्षण

Sooraj Krishna Shastri
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Bhaddari Ki Kahawat: Famine & Inflation (Complete) - अकाल के लक्षण

Bhaddari: Famine Signs

महँगी और अकाल के लक्षण (सम्पूर्ण संग्रह: 1-86)

#1
जै दिन जेठ चलै पुरवाई ।
तै दिन सावन धूरि उड़ाई ॥ १ ॥

अर्थ: जेठ के महीने में जितने दिन तक पुरवा हवा चलेगी, सावन के महीने में उतने ही दिनों तक सूखा पड़ेगा (वर्षा नहीं होगी)।

#2
भादों कृष्ण एकादशी, जो नहिं छिटकै मेघ ।
चार मास सूखा रहे, कहें भड्डरी देख ॥ २ ॥

अर्थ: यदि भादों बदी एकादशी को बादल टुकड़े-टुकड़े न हों (घने रहें), तो लगातार चार महीनों तक बारिश न होगी।

#3
सावन कृष्णा पंचमी, जोर को चले बयार ।
तुम जाओ पिय मालवा, हम जायें पितुसार ॥ ३ ॥

अर्थ: यदि सावन कृष्ण पंचमी को जोरों की हवा चले तो अकाल पड़ेगा। पत्नी कहती है—तुम कमाने मालवा जाओ, मैं मायके (पितुसार) जाती हूँ।

#4
रात सफाई दिन को छाहीं । महर कहें कि पानी नाहीं ॥ ४ ॥

अर्थ: यदि रात में आकाश साफ हो और दिन में बादल घिरें, तो भड्डर कहते हैं कि बारिश नहीं होगी।

#5
जेठ बदी दसमी तिथि, जो शनिवासर होय ।
पानी परै न धरनि पर, जीवे बिरला कोय ॥ ५ ॥

अर्थ: यदि जेठ बदी दसमी को शनिवार हो, तो भीषण सूखा पड़ता है। शायद ही कोई जिन्दा रह सके।

#6
मंगलवार अमावसी, फागुन चैती जोय ।
पशू बेच कन संचय कीजै, अवसि दुकाली होय ॥ ६ ॥

अर्थ: फाल्गुन और चैत्र की अमावस्या मंगलवार को पड़े तो अकाल पक्का है। पशु बेचकर अनाज इकट्ठा कर लो।

#7
माघ शुक्ल की सप्तमी, मङ्गलवार जो होय ।
भड्डर जोसी कहत हैं, नाज किरानो लोय ॥ ७ ॥

अर्थ: माघ सुदी सप्तमी को मङ्गलवार पड़े तो अनाजों में कीड़े लग जाते हैं (नाश होता है)।

#8
माघ उजाली पंचमी, चले जो उत्तम बाय ।
तो जानों की भादवों, बिन जल कोरो जाय ॥ ८ ॥

अर्थ: माघ सुदी पंचमी को अच्छी हवा चले तो भादों का महीना बिना पानी के सूखा चला जाएगा।

#9
पण्डित केतिक पढ़ि पढ़ि मरौ । पूस अमावस की सुध करौ ॥
मूल विसाखा पूर्वाषाढ़ । सूरा जानो नियरे ठाढ़ ॥ ९ ॥

अर्थ: यदि पौष की अमावस्या को मूल, विशाखा या पूर्वाषाढ़ नक्षत्र हो तो समझ लो कि अकाल (सूरा) सिर पर खड़ा है।

#10
पाँच मंगरो फागुनो, पौष पाँच शनि जोय ।
भड्डर कहें अकाल पड़तु हैं, बीज बये नहिं कोय ॥ १० ॥

अर्थ: फाल्गुन में पाँच मङ्गल और पौष में पाँच शनिवार पड़ें तो अकाल पड़ता है। खेत में बीज नहीं बोना चाहिए।

#11
मंगल सोम पढ़ें सिवराती, पछुवाँ बाउ बहै दिनराती ।
घोड़ा रोड़ा टिड्डी उड़े, राजा मरै कि धरती जरै ॥ ११ ॥

अर्थ: सोमवार/मंगलवार को शिवरात्रि हो और पछुवाँ हवा चले तो टिड्डियाँ उड़ेंगी, राजा मरेगा या धरती जल जाएगी (सूखा)।

#12
माघ सुदी नवमी तिथि, बादर रेख न होय ।
तो सरवर भी सूखिहैं, सब जल जैहैं खोय ॥ १२ ॥

अर्थ: माघ सुदी नवमी को आकाश साफ (बादल रहित) हो तो तालाब भी सूख जायेंगे, भीषण अकाल पड़ेगा।

#13
सावन बदी एकादशी, मेघ गर्जि घहरात ।
हम जाऊँ पिय मायके, तुम जाओ गुजरात ॥ १३ ॥

अर्थ: सावन बदी एकादशी को बादल केवल गरजें (बरसें नहीं), तो अकाल पड़ेगा। मैं मायके जाती हूँ, तुम गुजरात जाओ।

#14
चित्रा स्वाति विसाखहूँ, सावन नहिं बरसन्त ।
हाली अन्ने संग्रहौ, दूनो भाव बढ़न्त ॥ १४ ॥

अर्थ: सावन में चित्रा, स्वाती और विशाखा में पानी न बरसे तो अन्न इकट्ठा कर लो, भाव दुगुना बढ़ेगा।

#15
आगे मेघा पीछे भान । होवे बरखा ओस समान ॥ १५ ॥

अर्थ: आगे मघा नक्षत्र हो और पीछे सूर्य हो, तो वर्षा ओस के समान (बहुत कम) होती है।

#16
आगे मंगल पीठ रवि, जो असाढ़ के मास ।
चौपद नासै चहुँ दिशा, जीवन की नहिं आस ॥ १६ ॥

अर्थ: आषाढ़ में मंगल आगे और सूर्य पीछे हो तो चौपायों का नाश होता है और जीवन की आशा नहीं रहती।

#17
माघ उजाली सप्तमी, सोमवार दीसन्त ।
काल पड़े राजा लड़ें, मनई सकल भ्रमन्त ॥ १७ ॥

अर्थ: माघ सुदी सप्तमी को सोमवार हो तो अकाल पड़ता है, राजा लड़ते हैं और लोग परेशान रहते हैं।

#18
माघ उजारी तीज को, बादर बिज्जू देख ।
जौ गेहूँ संग्रह करें, महँगी होसी पेख ॥ १८ ॥

अर्थ: माघ सुदी तीज को बादल-बिजली दिखें तो जौ-गेहूँ इकट्ठा कर लो, महँगाई होगी।

#19
कृतिका तो कोरी गई, अद्रा मेंहू न बूँद ।
तो भड्डर यों कहत हैं, कालहिं आवे कूद ॥ १९ ॥

अर्थ: कृतिका खाली गई और आर्द्रा में भी बूँद न पड़ी, तो समझो अकाल कूदकर आ गया।

#20
नौमी असाढ़ी कृष्ण को, जो गरजै घनघोर ।
जोतिसी भड्डर कहत हैं, काल पड़े चहुँ ओर ॥ २० ॥

अर्थ: आषाढ़ बदी नवमी को घनघोर गर्जना हो तो चारों ओर अकाल पड़ता है।

#21
मंगल रथ आगे चलै, पीछे चलै जो सूर ।
अल्प वृष्टि तब जानिये, सकलै पड़सी झूर ॥ २१ ॥

अर्थ: जब मंगल आगे और सूर्य पीछे हो तो बहुत थोड़ी बारिश होती है और सूखा पड़ता है।

#22
सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिणी होय ।
तेज अन्न अरु मन्द जल, बिरला बिहरै कोय ॥ २२ ॥

अर्थ: सावन कृष्ण दशमी को रोहिणी नक्षत्र हो तो अन्न महँगा और वर्षा कम होती है।

#23
आर्द्रा भरणी रोहिणी, मघा उत्तरा तीन ।
इन मंगल आँधी चले, होवे बरखा हीन ॥ २३ ॥

अर्थ: मंगलवार के दिन आर्द्रा, भरणी, रोहिणी, मघा या तीनों उत्तरा में आँधी चले तो वर्षा नहीं होती।

#24
जेठ उजारी तीज को, आद्रा रिष बरसन्त ।
भाखै जोसी भड्डरी, दुर्भिछ अवसि परन्त ॥ २४ ॥

अर्थ: ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को आर्द्रा नक्षत्र बरसे तो अवश्य ही दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ता है।

#25
रोहिणी माहीं रोहिणी, घड़ी एक जो दीख ।
हाथ में खपरा मेदिना दर-दर माँगै भीख ॥ २५ ॥

अर्थ: चैत्र में एक घड़ी भी रोहिणी हो तो ऐसा अकाल पड़ता है कि लोग भीख माँगते फिरते हैं।

#26
जेठ पहिल परिवा दिवस, बुधवासर जो होय ।
मूल असाढ़ी जो रहे, धरती कम्पन होय ॥ २६ ॥

अर्थ: ज्येष्ठ कृष्ण प्रतिपदा को बुधवार और आषाढ़ पूर्णिमा को मूल नक्षत्र हो तो भूचाल आता है।

#27
वायु न बाजै मृगसिरा, रोहिणी तपै न जेठ ।
गोरी बीनत काँकरी, खड़ी खेजड़ी हेठ ॥ २७ ॥

अर्थ: मृगशिरा में हवा न चले और जेठ में रोहिणी न तपे, तो सूखा पड़ता है। (किसान की स्त्री कंकड़ बीनती है)।

#28
असाढ़ी के पूनो दिना, निरमल होय जो चन्दा ।
जाओ तुम पिय मालवा, आया दुख का फन्दा ॥ २८ ॥

अर्थ: आषाढ़ पूर्णिमा को यदि चाँद निर्मल (साफ) दिखे (बादल न हों), तो मालवा चले जाओ, यहाँ दुख का फंदा आ गया है।

#29
पुरुवा बादर पश्छिम जाय । वासे वृष्टि अधिक बरसाय ॥
जो पच्छिम से पूरब जाय । तो जानो वर्षा घट जाय ॥ २९ ॥

अर्थ: पूरब से पश्चिम जाते बादल भारी वर्षा करते हैं, लेकिन पश्चिम से पूरब जाने पर वर्षा घट जाती है।

#30
मीन शनीचर कर्क गुरु, तुला जो मंगल होय ।
गेहूँ, गोरस, गोरड़ा, यह सब जावे खोय ॥ ३० ॥

अर्थ: मीन का शनि, कर्क का गुरु और तुला का मंगल हो तो गेहूँ, दूध और ईख नष्ट हो जाते हैं।

#31
रात को बोलै कागला, दिन में बोलै स्याल ।
भाखै भड्डर जोतिसी, निहचै होय अकाल ॥ ३१ ॥

अर्थ: रात में कौवा और दिन में सियार बोले, तो निश्चय ही अकाल पड़ता है।

#32
क्या रोहिणी बरसा करे, बचै जेठ नित मुर ।
एक बूँद कृतिका पड़े, बिनसै तीनों तूर ॥ ३२ ॥

अर्थ: रोहिणी की वर्षा बेकार है, लेकिन कृतिका नक्षत्र में एक बूँद भी पड़ जाए तो तीनों फसलें नष्ट हो जाती हैं।

#33
उगे सूर पच्छिम दिसा, धनुष उगन्तो जान ।
चौथे या पाँचों दिवस, रुंड-मुँड महि मान ॥ ३३ ॥

अर्थ: सूर्योदय के समय पश्चिम में इन्द्रधनुष दिखे तो 4-5 दिन में पृथ्वी पर शवों के ढेर (रुंड-मुंड) लग जाते हैं (युद्ध/महामारी)।

#34
अषाढ़ कृष्ण की अष्टमी, ससि निर्मल जो दीख ।
पिया जाइके मालवा, माँगि के खइहें भीख ॥ ३४ ॥

अर्थ: आषाढ़ बदी अष्टमी को चन्द्रमा निर्मल (साफ) दिखे तो अकाल पड़ता है। पति को मालवा जाकर भीख माँगनी पड़ेगी।

#35
एक मास ग्रहण हो दोय । नाज जानियो महँगा होय ॥ ३५ ॥

अर्थ: एक महीने में दो ग्रहण (सूर्य/चंद्र) लगें तो अनाज बहुत महँगा होता है।

#36
जिन बारा रवि संक्रमै, तिनै अमावस होय ।
खप्पर ले डोलत फिरै, भीख न देने कोय ॥ ३६ ॥

अर्थ: संक्रान्ति और अमावस्या एक ही दिन पड़ें तो ऐसा अकाल पड़ता है कि खप्पर लेकर घूमने पर भी भीख नहीं मिलती।

#37
माघ उजाली चौथ को, मेघ बादलो जान ।
पान और नारियल तै, निहचै महँग बिकान ॥ ३७ ॥

अर्थ: माघ सुदी चौथ को बादल हों और पानी बरसे तो पान और नारियल महँगा बिकता है।

#38
माघ उजेरी अष्टमी, जो कृतिका नखत होय ।
की फागुन रोली पढ़ें, की महँगी सावन होय ॥ ३८ ॥

अर्थ: माघ शुक्ल अष्टमी को कृतिका नक्षत्र हो तो फागुन में अकाल या सावन में महँगाई होती है।

#39
माघ छठी गरजे नहीं, महँगा होय कपास ।
रहे सातवें निर्मली, बीत गई सब आस ॥ ३९ ॥

अर्थ: माघ शुक्ल षष्ठी को बादल न गरजें तो कपास महँगी होती है; और सप्तमी को आकाश साफ रहे तो सारी आशा खत्म।

#40
अषाढ़ कृष्ण परिवा दिवस, जो मेघा गरजन्त ।
छत्रिय सों क्षत्रिन मिलि जूझै, निहचें काल पड़न्त ॥ ४० ॥

अर्थ: आषाढ़ बदी परिवा को बादल गरजें तो क्षत्रियों में युद्ध होता है और अकाल पड़ता है।

#41
चित्रा स्वाती और विसाखा, जो बरसे आषाढ़ ।
जाय बसो परदेश में, परिहैं काल सुगाढ़ ॥ ४१ ॥

अर्थ: आषाढ़ में चित्रा, स्वाती और विशाखा नक्षत्र बरसें तो भीषण अकाल पड़ता है। परदेस चले जाना ही बेहतर है।

#42
कै जु सनीचर मीन को, कै जु तुला को होय ।
राजा विग्रह प्रजा छय, मरण सभी का होय ॥ ४२ ॥

अर्थ: शनि मीन या तुला राशि में हो तो राजाओं में लड़ाई, प्रजा का नाश और सबका मरण होता है।

#43
माघ शुक्ल आठें दिवस, बार पड़े जो चन्द ।
घीव तेल की जानिये, महँगी होय दुचन्द ॥ ४३ ॥

अर्थ: माघ सुदी अष्टमी को सोमवार हो तो घी और तेल का भाव दुगुना हो जाता है।

#44
सावन उजली सप्तमी, उवत जो निकलै भान ।
तो जल मिलिहें कूप में, या गंगा असनान ॥ ४४ ॥

अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को सूर्य साफ निकले (बादल न हों) तो अकाल पड़ता है। पानी केवल कुओं या गंगा में मिलता है।

#45
कुही अमावस मूल बिन, बिन रोहणी अखतीज ।
सवन बिना हो स्रवनी, निकलै आधा बीज ॥ ४५ ॥

अर्थ: अमावस को मूल, अक्षयतृतीया को रोहिणी और सावन पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र न हो, तो बीज आधा ही जमता है।

#46
सूर उगन्ते भादवाँ, अमावस हो रविवार ।
धनुष उगन्ते पच्छिम दुःख से करे पुकार ॥ ४६ ॥

अर्थ: भादों की अमावस्या को रविवार हो और सूर्योदय के समय पश्चिम में इन्द्रधनुष दिखे, तो प्राणी दुःख से पुकार उठते हैं।

#47
आश्विन कृष्ण अमावसी, दिवस रहे संनिवार ।
समया नीको नीखरो, भड्डर करें विचार ॥ ४७ ॥

अर्थ: कुआर बदी अमावस्या को शनिवार हो तो समय सामान्य रहता है (न बहुत अच्छा, न बहुत बुरा)।

#48
मूल गल्यो रोहणी गली, अद्रा बाजे बाय ।
हाली बेंचो बधिया, खेती गुन न लखाय ॥ ४८ ॥

अर्थ: मूल और रोहिणी गल जाएँ (बरसें) और आर्द्रा में हवा चले, तो बैल बेच दो। खेती में कोई लाभ नहीं होगा।

#49
स्वाती दीपक जो जरै, खेल विसाखा गाय ।
घना गयन्दा रन चढ़े, उपजी खेती जाय ॥ ४९ ॥

अर्थ: स्वाती में दिवाली और कार्तिक सुदी परिवा (गोवर्धन) को विशाखा हो तो युद्ध होता है और फसल नष्ट हो जाती है।

#50
माघ उजारी दूज दिन, बादर बिज्जु समाय ।
तो यों भाखें भड्डरी, महँगा अन्न बिकाय ॥ ५० ॥

अर्थ: माघ शुक्ल द्वितीया को बादल-बिजली हो तो अनाज बहुत महँगा बिकेगा।

#51
चैत मास की पहिली दसमी, बादल बिजुरी होय ।
तो जानो मन माँहि यह, गर्भ गला सब जोय ॥ ५१ ॥

अर्थ: चैत्र बदी दशमी को बादल-बिजली हो तो 'वर्षा का गर्भ' गल जाता है, यानी बारिश बहुत कम होगी।

#52
अखै तीज रोहिणी न होय । पूस अमावस मूल न जोय ॥
राखी श्रवणो हीन विचारो । कातिक पूनो कृतिका टारो ॥
धरती पर खल बलहिं प्रकासै । भड्डर कहते धानै नासै ॥ ५२ ॥

अर्थ: अक्षयतृतीया को रोहिणी, पूस अमावस को मूल, सावन पूर्णिमा को श्रवण और कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका न हो, तो दुष्टों का उपद्रव बढ़ता है और धान का नाश होता है।

#53
तपा जेठ में नखत चुई जाय । नखत सभी ओछे परि जाय ॥ ५३ ॥

अर्थ: जेठ के तपने वाले दिनों (दसतपा) में थोड़ी भी बारिश हो जाए, तो आगे के सारे नक्षत्र कमजोर (ओछे) पड़ जाते हैं।

#54
सुदी असाढ़ में बुध को, उदय भयो जो पेख ।
सुक्र अस्त सावन रहे, महाकाल अवरेख ॥ ५४ ॥

अर्थ: आषाढ़ शुक्ल में बुध का उदय और सावन में शुक्र अस्त हो, तो महाकाल (भयंकर अकाल) पड़ता है।

#55
आगे मेवा पीछे भान । पानी की रट करे किसान ॥ ५५ ॥

अर्थ: आगे मघा और पीछे सूर्य हो तो सूखा पड़ता है, किसान पानी के लिए तरसते हैं।

#56
सावन उजली सप्तमी, चन्दा छिटिक परै ।
की बल पावे कूप में, की कामिनी सीस धरै ॥ ५६ ॥

अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को चाँद साफ निकले तो पानी की कमी हो जाती है, पानी केवल कुएँ में मिलता है।

#57
सावन शुक्ला सप्तमी, बरसे जो अधिरात ।
पिया जाब तू मालवा, हम जायें गुजरात ॥ ५७ ॥

अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को आधी रात में वर्षा हो तो अकाल पड़ेगा। पति मालवा और पत्नी गुजरात जाने की बात करते हैं।

#58
रवि के पहिले गुरु चले, ससि सुक्रा परवेस ।
दिवस जु चौथे पाँचवें, रकत बहन्तो देस ॥ ५८ ॥

अर्थ: सूर्य के पहले गुरु हो और चन्द्रमा शुक्र में प्रवेश करे तो 4-5 दिन में देश में खून बहेगा (लड़ाई होगी)।

#59
मृगसिर बाय न बादरी, रोहिणी तपै न जेठ ।
अद्रा में बरसै नहीं, सहै कौन अलसेठ ॥ ५९ ॥

अर्थ: मृगशिरा में हवा/बादल न हो, जेठ में रोहिणी न तपे और आर्द्रा में न बरसे, तो खेती करना बेकार है (सिरदर्दी है)।

#60
रिक्ता तिथि अरु क्रूर दिन, दुपहर हो या प्रात ।
जो संक्रम तो जानिये, संवत्त महँगो जात ॥ ६० ॥

अर्थ: रिक्ता तिथि और क्रूर दिन (शनि/मंगल) को संक्रान्ति पड़े तो पूरा साल महँगा जाता है।

#61
दो भादों दो आश्विनी, दो असाद के माँह ।
चाँदी सोना बेंचकर, नाज बेसाहो आज ॥ ६१ ॥

अर्थ: जिस साल दो भादों, दो कुआर या दो आषाढ़ (अधिक मास) पड़ें, तो सोना-चाँदी बेचकर अनाज खरीद लो (महँगाई आएगी)।

#62
सावन में पुरुवा बहे, भादों में पछियाँव ।
बैलन को पिय बेंच के, लरिका जाय जियाय ॥ ६२ ॥

अर्थ: सावन में पुरुवा और भादों में पछुवाँ बहे तो सूखा पड़ता है। बैल बेचकर बच्चों का पेट पालना पड़ेगा।

#63
तेरह दिन का होवे पाख । अन्न महँग जानो वैसाख ॥ ६३ ॥

अर्थ: जिस महीने में तेरह दिनों का पक्ष पड़े, उस साल बैशाख में अनाज महँगा होगा।

#64
सावन शुष्छा सप्तमी, उवत जो दीखे भान ।
हम जायें पिय मायके, तुम करलो गुजरान ॥ ६४ ॥

अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को सूर्य साफ दिखे तो सूखा पड़ेगा। पत्नी मायके जाने को कहती है।

#65
ज्येष्ठा आर्द्रा सतभिखा, स्वाती सुलेखा माँहि ।
संक्रम हो तो जानिये, महँगा नाज बिकाहिं ॥ ६५ ॥

अर्थ: ज्येष्ठा, आर्द्रा, शतभिषा, स्वाती या आश्लेषा में संक्रान्ति पड़े तो अनाज महँगा होता है।

#66
भादों जै दिन पछुवाँ व्यारी । तै दिन माघै पड़ती ठारी ॥ ६६ ॥

अर्थ: भादों में जितने दिन पछुवाँ हवा चलेगी, माघ में उतने ही दिन पाला (ठारी) पड़ेगा।

#67
मघादि पंच नहत्तरा, सुक होय पच्छिम दिसि जोय ।
तो यों भाखें भड्डरी, परची न होय ॥ ६७ ॥

अर्थ: मघा आदि पाँच नक्षत्रों में यदि शुक्र पश्चिम दिशा में हो तो वर्षा नहीं होती।

#79
कर्क संक्रमी मंगलवार, मकर संक्रमी सनिहि विचार ।
पंद्रह महुरत की हो जोय, पूरत देश विरानो होय ॥ ७९ ॥

अर्थ: कर्क संक्रान्ति मंगलवार और मकर शनिवार को हो (और 15 मुहूर्त की हो), तो पूरा देश वीरान हो जाता है (अकाल)।

#80
रविवार करै धनवाना होय । सोम करै सेवा फल होय ।
बुध, बिहफै सुक्रे भरै कोठार । सनि मंगल बीजन आवै द्वार ॥ ८० ॥

अर्थ: रविवार को खेती शुरू करने वाला धनवान, सोम को सेवक, बुध-गुरु-शुक्र को करने वाला समृद्ध होता है। शनि-मंगल को करने से बीज भी वापस नहीं आता।

#81
एक राशि छः ग्रह अवलोके । महाकाल को दीन्हों कोके ॥ ८१ ॥

अर्थ: एक ही राशि पर छह ग्रह आ जाएँ तो महाकाल (प्रलय जैसा संकट) आता है।

#82
सुदी जेठ के पाल में, आद्रादिक दस रिच्छ ।
सजल होय निरजल कहत, निरजल सजल प्रत्यक्ष ॥ ८२ ॥

अर्थ: जेठ सुदी में आर्द्रा आदि 10 नक्षत्रों में बारिश हो जाए तो सूखा पड़ता है। न बरसे तो आगे अच्छी वर्षा होती है।

#83
माघ जु परिवा उजरों, बादर विज्जु जो होय ।
सरसो अरु तेलन की, नित्ते महंगी होय ॥ ८३ ॥

अर्थ: माघ सुदी परिवा को बादल और बिजली हो तो सरसों और तेल का भाव रोज बढ़ता है।

#84
शनि सूर या मंगल, पूस अमावस होय ।
दूना विगुना, चौगुना, अन्न की बढ़ती होय ॥ ८४ ॥

अर्थ: पौष अमावस को शनि, रवि या मंगल हो तो अन्न का भाव दुगुना-चौगुना बढ़ जाता है।

#85
कातिक मावस देखो जोसी । शनि रवि भौमवार जो होसी ॥
स्वाति नखत अरु आयुष जोगा । पढ़ें काल नासै सब लोगा ॥ ८५ ॥

अर्थ: दिवाली को शनि, रवि या मंगल हो, साथ ही स्वाति नक्षत्र और आयुष्य योग हो तो काल (अकाल) पड़ता है और लोग मरते हैं।

#86
कर्क रासि में बोवै ककरी, सिंह अचोनो जाय ।
तो फिर भाखै भड्डरी, कीड़ा लगि लगि आय ॥ ८६ ॥

अर्थ: कर्क राशि में ककड़ी बोने और सिंह राशि तक न तोड़ने से उसमें कीड़े लग जाते हैं।

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