पानी नहीं, 40,000 किलो घी से बना है यह मंदिर! 😲 Bhandasar Jain Temple Bikaner History

Sooraj Krishna Shastri
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भांडासर जैन मंदिर (बीकानेर)

विश्व का एकमात्र मंदिर जिसकी नींव पानी से नहीं, देशी घी से भरी गई

अद्भुत वास्तुकला और इतिहास
राजस्थान के बीकानेर में स्थित श्री सुमतिनाथ जी का मंदिर (भांडासर जैन मंदिर) अपनी अनोखी निर्माण शैली के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण १५वीं शताब्दी में एक घी व्यापारी भांडाशाह ओसवाल द्वारा करवाया गया था।
  • समर्पण: यह मंदिर जैन धर्म के पांचवे तीर्थंकर श्री सुमतिनाथ जी को समर्पित है।
  • संरचना: तीन मंज़िला यह मंदिर लाल और पीले पत्थरों से बना है।
  • कारीगरी: दीवारों और छतों पर पत्ती-नुमा चित्रकारी, फ्रेसको पेंटिंग और शीशे का अद्भुत काम देखने को मिलता है।
नींव में ४०,००० किलो घी का प्रयोग
इस मंदिर की सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इसके निर्माण के समय गारे (मिश्रण) में पानी की जगह शुद्ध देशी घी का उपयोग किया गया था।
चमत्कार: कहा जाता है कि आज भी तेज गर्मी के दिनों में इस मंदिर की दीवारों और फर्श से घी रिसता है, जिसे देखकर पर्यटक अचंभित रह जाते हैं। कुल मिलाकर लगभग ४०,००० किलो घी का प्रयोग किया गया था।
रोचक कथा: कंजूसी या दानवीरता?
इस मंदिर निर्माण से जुडी एक प्रचलित कथा है। जब मंदिर निर्माण की बात चल रही थी, तब सेठ भांडाशाह की दुकान पर एक मक्खी घी के पात्र में गिरकर मर गई। सेठ जी ने मक्खी को बाहर निकाला और उसे अपने जूतों पर रगड़ कर जूते चमका लिए।
पास बैठे मिस्त्री ने सोचा कि यह सेठ कितना कंजूस है! उसने सेठ की परीक्षा लेने के लिए कहा -

"सेठ जी, यदि मंदिर को सदियों तक सुरक्षित रखना है तो निर्माण में पानी की जगह घी का प्रयोग करना होगा।"
सेठ ने बिना देर किये घी का प्रबंध करवा दिया। मिस्त्री ने अपनी गलती मानी और कहा कि मैं आपकी परीक्षा ले रहा था। लेकिन सेठ जी ने कहा - "अब यह घी प्रभु के नाम निकल चुका है, इसका उपयोग मंदिर निर्माण में ही होगा।"
सामाजिक सरोकार: पानी की बचत
एक अन्य मत के अनुसार, राजस्थान के बीकानेर और आस-पास के इलाकों में शताब्दियों से पानी की भारी कमी रही है। जब सेठ भांडाशाह ने मंदिर निर्माण की बात ग्रामीणों से की, तो लोगों ने कहा कि यहाँ पीने के लिए पानी नहीं है, मंदिर निर्माण में पानी व्यर्थ न करें।
समाधान: पानी की समस्या और जनभावना को देखते हुए सेठ जी ने ऐतिहासिक निर्णय लिया और पानी की जगह देशी घी का प्रयोग कर मंदिर का निर्माण करवाया।

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