ब्राह्मण का धन विष समान है: श्री कृष्ण की चेतावनी | Brahma Sva Punishment in Hindi

Sooraj Krishna Shastri
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ब्राह्मण का धन: हलाहल विष से भी घातक

"भगवान श्री कृष्ण की क्षत्रियों को अंतिम चेतावनी"

राजा नृग के गिरगिट योनि से मुक्त होकर स्वर्ग जाने के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परिजनों और समस्त क्षत्रियों को शिक्षा देने के लिए 'ब्रह्मस्व' (ब्राह्मण की संपत्ति) की भयंकरता के बारे में बताया।
नाहं हालाहलं मन्ये विषं यस्य प्रतिक्रिया।
ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्तं नास्य प्रतिविधिर्भुवि।।
अर्थ: मैं हलाहल विष को विष नहीं मानता, क्योंकि उसकी चिकित्सा (औषधि) संभव है। परंतु ब्राह्मण का धन ही 'परम विष' है; उसे पचा लेने के लिए पृथ्वी पर कोई औषधि या उपाय नहीं है।
पूरे कुल का नाश
भगवान कहते हैं कि साधारण विष केवल खाने वाले के प्राण लेता है और अग्नि को पानी से बुझाया जा सकता है। किन्तु ब्राह्मण के धन रूपी अरणि (लकड़ी) से जो अग्नि पैदा होती है, वह सारे कुल को जड़ से जला डालती है।
  • बिना आज्ञा उपभोग: यदि ब्राह्मण की सम्मति के बिना उसका धन भोगा जाए, तो वह तीन पीढ़ियों (पुत्र और पौत्र) को नष्ट कर देता है।
  • बलपूर्वक अपहरण: यदि बलपूर्वक या हठ से ब्राह्मण का धन छीना जाए, तो पूर्वजों की १० पीढ़ियाँ और आगे आने वाली १० पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं।
नरक और विष्ठा का कीड़ा
जो राजा या शक्तिशाली मनुष्य अहंकार में अंधे होकर ब्राह्मण की वृत्ति (रोजी-रोटी) छीनते हैं, उनका पतन निश्चित है।
स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेच्च यः।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि विष्ठायां जायते कृमिः।।
भयंकर परिणाम: जो मनुष्य अपनी दी हुई या दूसरों की दी हुई ब्राह्मण की वृत्ति (जीविका) को छीन लेते हैं, वे ६०,००० (साठ हजार) वर्षों तक विष्ठा (मल) के कीड़े बनकर रहते हैं।
कुम्भीपाक नरक: ब्राह्मण के रोने पर उसके आंसू की बूंदों से जितनी धूल भीगती है, उतने वर्षों तक उसका धन छीनने वाले को 'कुम्भीपाक' नरक में पकाया जाता है।
श्री कृष्ण का आदेश: 'दण्ड दूंगा'
भगवान ने अपने कुल के लोगों को स्पष्ट शब्दों में सावधान किया:
  • क्षमा और नमन: यदि ब्राह्मण अपराध भी करे, गालियां दे या मारे, तो भी उसे नमन ही करो, उससे द्वेष मत करो।
  • मेरी प्रतिज्ञा: "जिस प्रकार मैं तीनों समय ब्राह्मणों को प्रणाम करता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी करो। जो मेरी इस आज्ञा का उल्लंघन करेगा, उसे मैं दण्ड दूँगा।"
विप्रं कृतागसमपि नैव द्रुह्यत मामकाः।
घ्नन्तं बहु शपन्तं वा नमस्कुरुत नित्यशः।।
अर्थ: हे मेरे आत्मीय जनों! ब्राह्मण अपराधी हो, मारता हो या शाप देता हो, फिर भी तुम उसे नित्य नमस्कार ही करो।

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