General Category के खिलाफ False Cases की विस्तृत रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले
1. प्रस्तावना: विधायी मंशा बनाम कार्यान्वयन की वास्तविकता
भारत के सामाजिक और विधिक इतिहास में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (जिसे सामान्यतः एससी/एसटी एक्ट या पीओए एक्ट कहा जाता है) का एक विशिष्ट स्थान है। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य सदियों से शोषण, भेदभाव और हिंसा का शिकार रहे दलित और आदिवासी समुदायों को सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए एक सशक्त कानूनी कवच उपलब्ध कराना था।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) की भावनाओं को मूर्त रूप देने के लिए यह कानून लाया गया। इसके अंतर्गत कठोर प्रावधान किए गए, जैसे कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) पर रोक (धारा 18) और एफआईआर दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान, ताकि प्रभावशाली वर्ग पीड़ितों को डरा-धमका न सके।
तथापि, पिछले तीन दशकों में, विशेषकर पिछले कुछ वर्षों में, इस अधिनियम के कार्यान्वयन के दौरान एक समानांतर और चिंताजनक प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है- इसका दुरुपयोग। अनुसंधान और न्यायिक अभिलेख यह दर्शाते हैं कि व्यक्तिगत प्रतिशोध, संपत्ति विवाद, और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को निपटाने के लिए सामान्य वर्ग (General Category) के निर्दोष व्यक्तियों के विरुद्ध इस अधिनियम का 'हथियार' के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।
यह प्रतिवेदन इसी दुरुपयोग की व्यापक समीक्षा करता है। इस दस्तावेज का उद्देश्य उन झूठे मामलों की एक विस्तृत सूची और विश्लेषण प्रस्तुत करना है जो सामान्य वर्ग के खिलाफ दर्ज किए गए, जिन्हें बाद में न्यायपालिका द्वारा निराधार, द्वेषपूर्ण या कानून का दुरुपयोग घोषित किया गया।
इस शोध रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक और हालिया निर्णयों (2024-2025), और विशिष्ट केस स्टडीज का गहन विश्लेषण किया गया है। यह विश्लेषण न केवल उन व्यक्तियों की पीड़ा को उजागर करता है जिन्हें झूठे आरोपों के कारण वर्षों तक कारावास और सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा, बल्कि उन कानूनी खामियों को भी रेखांकित करता है जो इस दुरुपयोग को संभव बनाती हैं।
2. दुरुपयोग का सांख्यिकीय परिदृश्यः एनसीआरबी और राज्यों के आंकड़े
झूठे मामलों की व्यापकता को समझने के लिए अनुभवजन्य आंकड़ों (Empirical Data) का विश्लेषण अनिवार्य है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वार्षिक रिपोर्ट इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती हैं, विशेष रूप से 'अंतिम रिपोर्ट' (Final Report - FR) के माध्यम से, जो पुलिस द्वारा तब दाखिल की जाती है जब जांच में आरोप झूठे या तथ्य की गलती (Mistake of Fact) पाए जाते हैं।
2.1 'झूठे मामलों' (Final Report - False) का विश्लेषण
वर्ष 2022 के एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार, एससी/एसटी अधिनियम के तहत दर्ज मामलों का एक महत्वपूर्ण अनुपात पुलिस जांच के स्तर पर ही झूठा पाया गया।
| श्रेणी | कुल दर्ज मामले (अनुमानित) | चार्जशीट दायर (%) | झूठे मामले / अंतिम रिपोर्ट (%) | निष्कर्ष |
|---|---|---|---|---|
| अनुसूचित जाति (SC) | 57,582+ | 60.38% | 14.78% | लगभग 15% मामले पुलिस जांच में ही झूठे पाए गए। |
| अनुसूचित जनजाति (ST) | 10,064+ | 63.32% | 14.71% | एसटी मामलों में भी लगभग 15% मामले निराधार साबित हुए। |
ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि 2022 में दर्ज 67,000 से अधिक मामलों में से लगभग 10,000 मामले ऐसे थे जिनमें जांच एजेंसियों ने स्वयं पाया कि आरोप झूठे थे। यह संख्या केवल उन मामलों को दर्शाती है जो पुलिस स्तर पर बंद हो गए; इसमें वे मामले शामिल नहीं हैं जो न्यायालय में विचारण (Trial) के दौरान गवाहों के मुकरने या साक्ष्यों के अभाव में बरी (Acquittal) हुए।
2022 में अधिनियम के तहत दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) घटकर मात्र 32.4% रह गई है, जो 2020 में 39.2% थी। यद्यपि बरी होने का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि मामला झूठा था, किंतु गिरती हुई दोषसिद्धि दर और उच्च संख्या में अंतिम रिपोर्ट (FR) यह संकेत देती हैं कि बड़ी संख्या में सामान्य वर्ग के लोगों को बिना किसी ठोस आधार के कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ रहा है।
2.2 क्षेत्रीय रुझान और दुरुपयोग के केंद्र
विभिन्न राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि दुरुपयोग की प्रवृत्ति उन क्षेत्रों में अधिक है जहां जातीय समीकरण जटिल हैं या भूमि विवादों की बहुलता है।
- उत्तर प्रदेश और बिहार: ये राज्य एससी/एसटी अत्याचार के मामलों में शीर्ष पर हैं। 2016 के आंकड़ों के अनुसार, कुल मामलों में यूपी का हिस्सा 25.6% और बिहार का 14.0% था। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हालिया निर्णयों (जिनका विस्तृत विवरण आगे दिया गया है) से पता चलता है कि यहां भूमि और व्यक्तिगत रंजिश के मामलों को 'एट्रोसिटी' का रूप देने की प्रवृत्ति प्रबल है।
- राजस्थान: राजस्थान में भी झूठे मामलों का प्रतिशत ऐतिहासिक रूप से उच्च रहा है, जिसे स्थानीय प्रशासन और पुलिस रिपोर्टों में अक्सर रेखांकित किया गया है।
2.3 न्यायपालिका पर बढ़ता बोझ
संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, एससी/एसटी अधिनियम के तहत 3,07,355 से अधिक मामले न्यायालयों में लंबित हैं। यह विशाल पेंडेंसी यह सुनिश्चित करती है कि यदि किसी सामान्य वर्ग के व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाया जाता है, तो उसे अपनी निर्दोषता साबित करने में एक दशक तक का समय लग सकता है, जैसा कि विष्णु तिवारी के मामले में देखा गया।
3. सामान्य वर्ग के विरुद्ध झूठे मामलों की विस्तृत सूची (केस स्टडीज)
यह खंड उन विशिष्ट और प्रमाणित मामलों का विवरण प्रस्तुत करता है जहां न्यायालयों ने स्पष्ट रूप से माना कि सामान्य वर्ग के अभियुक्तों को झूठा फंसाया गया था। ये मामले केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन त्रासदियों की कहानियां हैं जो कानून के दुरुपयोग से उत्पन्न हुई।
3.1 विष्णु तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021): 20 साल का काला पानी
भारतीय न्यायिक इतिहास में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग का सबसे हृदयविदारक उदाहरण विष्णु तिवारी का मामला है।
- घटना और आरोप: सितंबर 2000 में, ललितपुर (उत्तर प्रदेश) के निवासी विष्णु तिवारी पर उनके ही गांव की एक अनुसूचित जाति की महिला ने बलात्कार और एससी/एसटी एक्ट के तहत अत्याचार का आरोप लगाया। यह आरोप एक मामूली भूमि विवाद और पशुओं को खेत में चराने को लेकर हुए झगड़े के बाद लगाया गया था।
- सजा और कारावास: ट्रायल कोर्ट ने केवल पीड़िता के बयान के आधार पर विष्णु को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण विष्णु उच्च न्यायालय में तत्काल अपील या अच्छे वकील की सेवाएं नहीं ले सके।
- झेलना पड़ा नर्क: विष्णु तिवारी ने जेल में 20 वर्ष बिताए। इस दौरान उनके माता-पिता और दो भाइयों की मृत्यु हो गई, लेकिन वे उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सके। उनके परिवार की सारी जमीन मुकदमे की पैरवी में बिक गई और उनका घर खंडहर बन गया।
- दोषमुक्ति (Acquittal): जनवरी 2021 में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ (न्यायमूर्ति कौशल जयेंद्र ठाकर और न्यायमूर्ति गौतम चौधरी) ने मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर चोट या जबरदस्ती का कोई निशान नहीं था। इसके अलावा, एफआईआर दर्ज करने में देरी और पूर्व भूमि विवाद के ठोस सबूत थे। न्यायालय ने माना कि विष्णु को झूठा फंसाया गया था और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।
- प्रभाव: 43 वर्ष की आयु में जब विष्णु जेल से बाहर आए, तो उनका पूरा जीवन नष्ट हो चुका था। यह मामला इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे एक झूठा केस किसी व्यक्ति और उसके पूरे परिवार के अस्तित्व को मिटा सकता है।
3.2 रोहतक सिस्टर्स केस (हरियाणा, 2014-2017): मीडिया ट्रायल और वायरल झूठ
यह मामला इस बात का प्रमाण है कि कैसे सोशल मीडिया और जनभावनाओं का दुरुपयोग करके सामान्य वर्ग के युवाओं को अपराधी घोषित कर दिया जाता है।
- घटना: 2014 में, रोहतक (हरियाणा) में एक चलती बस में दो बहनों ने तीन युवकों (कुलदीप, दीपक और मोहित) पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया। लड़कियों द्वारा लड़कों की पिटाई का एक वीडियो वायरल हो गया। मीडिया ने तुरंत लड़कियों को 'वीरांगना' और लड़कों को 'दरिंदा' घोषित कर दिया।
- आरोप: लड़कों पर धारा 354 (छेड़छाड़) और एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया। वे सेना और पुलिस में भर्ती की तैयारी कर रहे थे, लेकिन इस केस ने उनके करियर को खतरे में डाल दिया।
- सच्चाई: जांच के दौरान बस के कंडक्टर और अन्य यात्रियों ने गवाही दी कि विवाद सीट को लेकर हुआ था, न कि छेड़छाड़ को लेकर। यह भी सामने आया कि उन बहनों का पहले भी इसी तरह के आरोप लगाने का इतिहास रहा है।
- निर्णय: मार्च 2017 में, रोहतक की अदालत ने तीनों युवकों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि मामला झूठा था और साक्ष्य लड़कों के पक्ष में थे। हालांकि, तब तक तीनों युवक तीन साल तक सामाजिक अपमान झेल चुके थे।
3.3 इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों का मामला (2024): संस्थागत दुरुपयोग
कार्यस्थलों पर वरिष्ठ अधिकारियों या सहकर्मियों को ब्लैकमेल करने के लिए एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग का यह एक क्लासिक उदाहरण है।
- संदर्भ: इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक महिला असिस्टेंट प्रोफेसर ने अपने तीन वरिष्ठ सहयोगियों-प्रोफेसर प्रहलाद कुमार, प्रोफेसर मनमोहन कृष्णा और प्रोफेसर जावेद अख्तर- के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज कराईं।
- आरोप: महिला ने उन पर यौन उत्पीड़न (धारा 354C ताक-झांक), आपराधिक धमकी और एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक गालियां देने का आरोप लगाया। यह आरोप तब लगाए गए जब वरिष्ठ प्रोफेसरों ने उन्हें ठीक से कक्षाएं न लेने और अनुशासनहीनता के लिए डांटा था।
- न्यायिक निष्कर्ष: फरवरी 2024 में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने इन कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह "कानून के दुरुपयोग का एक चौंकाने वाला मामला" है, जहां एक जूनियर कर्मचारी ने अपनी गलतियों को छिपाने के लिए वरिष्ठों को फंसाया।
- जुर्माना: न्यायालय ने न केवल एफआईआर रद्द की, बल्कि शिकायतकर्ता असिस्टेंट प्रोफेसर पर प्रति केस 5 लाख रुपये (कुल 15 लाख रुपये) का भारी जुर्माना भी लगाया। न्यायालय ने नोट किया कि प्रोफेसरों की "बेदाग छवि" को धूमिल किया गया और उन्हें आठ साल तक मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
3.4 रेखा देवी बनाम राज्य (लखनऊ, 2025): झूठे केस की सजा
प्रायः यह देखा जाता है कि झूठे केस करने वालों को कोई सजा नहीं मिलती, लेकिन यह मामला एक अपवाद और नजीर है।
- घटना: लखनऊ की 29 वर्षीय महिला, रेखा देवी, ने दो पुरुषों पर गैंगरेप और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया।
- जांच: पुलिस जांच और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (जैसे मोबाइल लोकेशन) से यह साबित हुआ कि घटना के समय आरोपी वहां मौजूद ही नहीं थे। एक आरोपी तो घटना के कथित समय पर कनाडा में था।
- निर्णय: एक ऐतिहासिक फैसले में, लखनऊ की अदालत ने शिकायतकर्ता रेखा देवी को झूठा मुकदमा दर्ज कराने और निर्दोषों को फंसाने के लिए 7.5 साल के कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यह सार्वजनिक धन और न्यायिक समय की बर्बादी थी।
3.5 सोहनवीर धामा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट, 2025)
यह मामला 'सार्वजनिक दृष्टि' (Public View) के सिद्धांत को स्पष्ट करता है, जिसका उपयोग अक्सर झूठे मामलों को तकनीकी रूप से रद्द करने के लिए किया जाता है।
- तथ्य: अपीलकर्ता सोहनवीर और अन्य पर आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता के घर के अंदर उसे जातिसूचक गालियां दीं। उन पर धारा 323, 504 आईपीसी और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(s) के तहत मामला दर्ज था।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एससी/एसटी एक्ट के आरोपों को रद्द कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 3(1) (s) के तहत अपराध तभी बनता है जब अपमान "सार्वजनिक दृष्टि के भीतर किसी स्थान" (Place within public view) पर किया गया हो। चूंकि कथित घटना घर के अंदर हुई थी, इसलिए यह एक्ट लागू नहीं होता। आईपीसी की धाराओं के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई।
- महत्व: यह निर्णय उन हजारों मामलों के लिए राहत का काम करता है जहां निजी विवादों को 'सार्वजनिक अपमान' बताकर एक्ट लगाया जाता है।
3.6 राहुल गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025): मुआवजे की वापसी
झूठे मामलों के पीछे एक बड़ा कारण सरकार द्वारा दिया जाने वाला मुआवजा भी होता है। यह मामला इस प्रवृत्ति पर प्रहार करता है।
- मामला: राहुल गुप्ता और 6 अन्य लोगों पर मेरठ में एससी/एसटी एक्ट और आईपीसी की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया। बाद में, दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया और न्यायालय को बताया कि विवाद निजी प्रकृति का था।
- निर्णय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया, लेकिन एक महत्वपूर्ण आदेश दिया। न्यायालय ने शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह सरकार से प्राप्त मुआवजे की राशि को एक सप्ताह के भीतर लौटाए।
- निहितार्थ: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि यदि कोई व्यक्ति स्वीकार करता है कि मामला निजी विवाद था या समझौता हो गया है, तो वह 'अत्याचार' के नाम पर लिया गया सरकारी धन अपने पास नहीं रख सकता।
4. दुरुपयोग के तंत्र और प्रकार (Typology of Misuse)
उपरोक्त मामलों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग यादृच्छिक (random) नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुछ निश्चित पैटर्न और उद्देश्य होते हैं।
4.1 संपत्ति और भूमि विवाद (Land Disputes)
अधिनियम के दुरुपयोग का सबसे बड़ा कारण भूमि विवाद है।
- तन्त्र: जब सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग के व्यक्ति के बीच कोई दीवानी (Civil) विवाद होता है, तो आरक्षित वर्ग का व्यक्ति (अक्सर स्थानीय वकीलों या दलालों की सलाह पर) दबाव बनाने के लिए एससी/एसटी एक्ट की धाराएं लगवा देता है।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य विपक्षी को तुरंत गिरफ्तार करवाना या समझौते के लिए बाध्य करना होता है। विष्णु तिवारी और केशव महतो (2025) के मामले इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। केशव महतो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपों में जातिगत अपमान का कोई विशिष्ट उल्लेख नहीं था, बल्कि यह एक दीवानी विवाद था जिसे आपराधिक रूप दिया गया था।
4.2 व्यक्तिगत प्रतिशोध और 'काउंटर ब्लास्ट' (Counter-Blast)
- तन्त्र: इसे 'क्रॉस-एफआईआर' रणनीति भी कहा जाता है। यदि सामान्य वर्ग का व्यक्ति किसी एससी/एसटी व्यक्ति के खिलाफ चोरी, मारपीट या अन्य अपराध की एफआईआर दर्ज कराता है, तो बचाव में एससी/एसटी व्यक्ति तुरंत एक जवाबी एफआईआर दर्ज करा देता है जिसमें जातिसूचक गाली और मारपीट का आरोप होता है।
- न्यायिक टिप्पणी: अलका सेठी बनाम यूपी राज्य (2024) में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ऐसी ही एक प्रतिशोधात्मक कार्यवाही को रद्द करते हुए इसे "कानून का दुरुपयोग" और "व्यक्तिगत प्रतिशोध" (Personal Vendetta) करार दिया।
4.3 सरकारी नौकरी और पदोन्नति (Employment & Promotions)
- तन्त्र: सरकारी कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की गई प्रतिकूल प्रविष्टियों (Adverse Remarks) या अनुशासनात्मक कार्यवाही को रोकने के लिए उन पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हैं।
- केस: इलाहाबाद विश्वविद्यालय का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसके अलावा, पदोन्नति में आरक्षण और वरिष्ठता को लेकर भी ऐसे मामले देखे गए हैं जहां कनिष्ठ कर्मचारियों ने वरिष्ठों पर मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया ताकि उनकी पदोन्नति रोकी जा सके।
4.4 ब्लैकमेल और जबरन वसूली (Extortion)
- प्रलोभन: अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज होते ही पीड़ित को मुआवजे की एक किश्त (जो 2 लाख से 8 लाख रुपये तक हो सकती है) मिलने का प्रावधान है।
- दुरुपयोग: कुछ तत्व केवल मुआवजा राशि प्राप्त करने के लिए झूठी एफआईआर दर्ज कराते हैं। राहुल गुप्ता (2025) के फैसले में उच्च न्यायालय ने इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए मुआवजा वापसी का आदेश दिया।
5. न्यायिक दृष्टिकोण का विकास (2018-2025)
न्यायपालिका ने अधिनियम की पवित्रता और दुरुपयोग की रोकथाम के बीच संतुलन बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए हैं।
5.1 डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन निर्णय (2018)
2018 में, सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की पीठ ने डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में माना कि अधिनियम का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। न्यायालय ने "निर्दोष नागरिकों को ब्लैकमेल करने" से रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए, जिसमें तत्काल गिरफ्तारी पर रोक और प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) की अनिवार्यता शामिल थी। हालांकि, भारी विरोध और राजनीतिक दबाव के बाद, संसद ने 2018 में संशोधन करके धारा 18A जोड़ी, जिसने इस फैसले को पलट दिया और गिरफ्तारी के पुराने प्रावधानों को बहाल कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले को वापस ले लिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत मामलों में न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं।
5.2 वर्तमान स्थिति (2024-2025)
वर्तमान में, यद्यपि अधिनियम कठोर है, लेकिन उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय धारा 482 सीआरपीसी (CrPC) और अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उन मामलों को रद्द कर रहे हैं जो स्पष्ट रूप से झूठे हैं।
- सार्वजनिक दृष्टि (Public View): सोहनवीर धामा (2025) और हितेश वर्मा (2020) जैसे निर्णयों के माध्यम से, न्यायालयों ने 'सार्वजनिक दृष्टि' की व्याख्या को कड़ा कर दिया है। यदि गाली-गलौज चारदीवारी के भीतर हुई है और कोई स्वतंत्र गवाह नहीं है, तो उसे एससी/एसटी एक्ट का अपराध नहीं माना जाता।
- इरादा (Intent): केशव महतो (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि केवल गाली देना काफी नहीं है; यह साबित होना चाहिए कि अपमान "जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे" से किया गया था।
6. तालिका: हाल के वर्षों में रद्द किए गए प्रमुख झूठे मामले
नीचे दी गई तालिका उन प्रमुख मामलों का सारांश है जिन्हें 2021 से 2025 के बीच न्यायालयों द्वारा झूठा या कानून का दुरुपयोग घोषित किया गया:
| क्र.स. | मामले का नाम | न्यायालय | वर्ष | आरोप और वास्तविकता | परिणाम |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | विष्णु तिवारी बनाम उप्र राज्य | इलाहाबाद हाईकोर्ट | 2021 | भूमि विवाद को बलात्कार और अत्याचार बताया। | 20 साल बाद निर्दोष बरी। |
| 2. | प्रो. प्रहलाद कुमार बनाम उप्र राज्य | इलाहाबाद हाईकोर्ट | 2024 | कामचोरी छिपाने के लिए एचओडी पर उत्पीड़न का आरोप। | कार्यवाही रद्द; 15 लाख रु. जुर्माना। |
| 3. | राहुल गुप्ता बनाम उप्र राज्य | इलाहाबाद हाईकोर्ट | 2025 | निजी विवाद, बाद में समझौता। | कार्यवाही रद्द; मुआवजा वापसी का आदेश। |
| 4. | सोहनवीर धामा बनाम उप्र राज्य | सुप्रीम कोर्ट | 2025 | घर के अंदर गाली-गलौज। | एससी/एसटी एक्ट की धाराएं रद्द। |
| 5. | केशव महतो बनाम बिहार राज्य | सुप्रीम कोर्ट | 2025 | आंगनवाड़ी केंद्र पर विवाद; आरोप अस्पष्ट थे। | आपराधिक मुकदमा रद्द। |
| 6. | मनमोहन कृष्णा बनाम उप्र राज्य | इलाहाबाद हाईकोर्ट | 2024 | विश्वविद्यालय में वरिष्ठों के खिलाफ झूठी शिकायत। | 5 लाख रु. जुर्माना। |
| 7. | रेखा देवी मामला | लखनऊ सेशन कोर्ट | 2025 | कनाडा में मौजूद व्यक्ति पर गैंगरेप का आरोप। | शिकायतकर्ता को 7.5 साल की जेल। |
| 8. | दीपक शर्मा बनाम मप्र राज्य | मप्र हाईकोर्ट | 2025 | आत्महत्या के लिए उकसाने को अत्याचार बताया। | अपील स्वीकार; झूठे फंसाने की जांच। |
| 9. | अलका सेठी बनाम उप्र राज्य | इलाहाबाद हाईकोर्ट | 2024 | प्रतिशोध (Counter-blast) के लिए एफआईआर। | कार्यवाही 'कानून का दुरुपयोग' मानकर रद्द। |
| 10. | रोहतक सिस्टर्स केस | रोहतक कोर्ट | 2017 | बस में छेड़छाड़ (वायरल वीडियो)। | आरोपी बरी; मामला झूठा पाया गया। |
7. झूठे मामलों का सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव
इन झूठे मामलों का प्रभाव केवल आरोपी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे समाज और प्रशासन को प्रभावित करता है।
- सामाजिक कलंक और मानसिक आघात: विष्णु तिवारी जैसे मामलों में, व्यक्ति अपना परिवार, जमीन और सम्मान सब कुछ खो देता है। झूठे रेप और एट्रोसिटी के आरोपों से समाज में जो बदनामी होती है, उसका कोई उपाय (Remedy) कानून में आसानी से उपलब्ध नहीं है।
- प्रशासनिक शिथिलता (Chilling Effect): जब वरिष्ठ अधिकारियों (जैसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर) को अनुशासनात्मक कार्रवाई करने पर जेल जाने का डर होता है, तो प्रशासन पंगु हो जाता है। अधिकारी एससी/एसटी अधीनस्थों की गलतियों को नजरअंदाज करने लगते हैं, जिससे कार्यकुशलता प्रभावित होती है।
- वास्तविक पीड़ितों का नुकसान: झूठे मामलों की बाढ़ के कारण पुलिस और न्यायपालिका में एक तरह का अविश्वास (Cynicism) पैदा होता है। इसका खमियाजा उन वास्तविक दलित पीड़ितों को भुगतना पड़ता है जिनके साथ सचमुच अत्याचार हुआ है, क्योंकि उनकी शिकायतों को भी शक की निगाह से देखा जाने लगता है।
8. बचाव और कानूनी उपचार (Legal Remedies)
सामान्य वर्ग के वे लोग जो ऐसे झूठे मामलों का शिकार होते हैं, उनके पास भारतीय कानून में निम्नलिखित उपचार उपलब्ध हैं, जिनका प्रयोग हाल के निर्णयों में भी देखा गया है:
- आईपीसी की धारा 182 और 211 (या बीएनएस की संगत धाराएं): यदि कोई व्यक्ति पुलिस को झूठी सूचना देता है या झूठा आरोप लगाता है, तो उसके खिलाफ इन धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। रेखा देवी को इसी आधार पर सजा मिली।
- सीआरपीसी की धारा 482 (या बीएनएसएस की धारा 528): उच्च न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह उन एफआईआर को रद्द कर दे जो प्रथम दृष्टया (Prima Facie) झूठी या द्वेषपूर्ण लगती हैं। भजन लाल मामले के दिशानिर्देशों का उपयोग करके मनमोहन कृष्णा और राहुल गुप्ता जैसे मामलों में राहत दी गई।
- मानहानि (Defamation): बरी होने के बाद, पीड़ित व्यक्ति झूठे शिकायतकर्ता के खिलाफ दीवानी और आपराधिक मानहानि का दावा कर सकता है।
9. निष्कर्ष
उपलब्ध शोध सामग्री और न्यायिक अभिलेखों का विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि यद्यपि एससी/एसटी एक्ट सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण उपकरण है, लेकिन इसका दुरुपयोग एक गंभीर वास्तविकता बन चुका है। विष्णु तिवारी के 20 साल बर्बाद होना, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों का आठ साल तक उत्पीड़न झेलना, और रोहतक के युवकों का मीडिया ट्रायल - ये केवल "मामले" नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं।
2024 और 2025 के न्यायिक रुझान आशाजनक हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स अब 'पब्लिक व्यू' और 'इंटेंट' (इरादे) की कड़ाई से जांच कर रहे हैं और झूठे शिकायतकर्ताओं पर भारी जुर्माना लगा रहे हैं। यह संतुलन बनाए रखना आवश्यक है ताकि यह कानून "शोषितों की ढाल" बना रहे, न कि "निर्दोषों के दमन की तलवार"।
उद्धरण और स्रोत
नोट: इस रिपोर्ट में उपयोग किए गए तथ्य और आंकड़े शोध स्निपेट्स पर आधारित हैं जो न्यायालय के निर्णयों और आधिकारिक रिपोर्टों से लिए गए हैं।
- Controversies Around Sc/St Act: Its Impact Use And Misuse - Law Colloquy
- The Double Edged Sword: The Sc/st Atrocities Act - LAWyersclubindia
- Report on Atrocities Against SCs and STs - Drishti IAS
- FALSE CASES UNDER SC/ST - NJA
- Vishnu Tiwari - Wikipedia
- Family Ostracized, Died, Land Sold: NHRC Demands Justice for Vishnu Tiwari - B&B Associates LLP
- "My Body Is Broken...": UP Man Acquitted Of Rape After 20 Years In Prison - YouTube
- Rohtak sisters' award on hold as versions of events collide - YouTube
- Rohtak sisters viral video controversy - Wikipedia
- Allahabad High Court Imposes Rs 15 Lakh Fine on Female Assistant Professor - Lawbeat
- Manmohan Krishna v. State of UP 2024 - Verdictum
- Lucknow Court Sentences Woman to 7 Years Imprisonment For Filing False Rape and SC/ST Case - Ekam Nyaay
- Sohanvir @ Sohanvir Dhama and Others v. State of U.P. - Supreme Court Cases
- Keshaw Mahto Verdict: Mere Abuse Not An Atrocity - Lawful Talks
- Shocking Misuse & Abuse Of SC/ST Act For Personal Vendetta - Verdictum
- Subhash Kashinath Mahajan vs. The State of Maharashtra (2018) - CLPR

