दूसरों की गुलामी vs खुद की तपस्या | Sheetavataatapakleshan Shloka Meaning

Sooraj Krishna Shastri
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दूसरों की गुलामी vs खुद की तपस्या | Sheetavataatapakleshan Shloka Meaning

दूसरों के लिए कष्ट, अपने लिए बहाने?

शीतवातातपक्लेशान्
सहंते ये पराश्रिताः ।
तदंशेनापि मेधावी
तपस्तप्त्वा सुखी भवेत् ॥
Śītavātātapaklēśān
sahantē yē parāśritāḥ |
Tadaṁśēnāpi mēdhāvī
tapastaptvā sukhī bhavēt ||
हिन्दी अनुवाद:
"जो लोग दूसरों पर आश्रित (नौकरी/गुलामी में) हैं, वे सर्दी, तेज हवा और धूप के भयंकर कष्टों को सहन करते हैं। यदि कोई बुद्धिमान व्यक्ति उस कष्ट के एक अंश (थोड़े से हिस्से) के बराबर भी तपस्या (स्वयं के लिए परिश्रम) कर ले, तो वह सुखी और स्वतंत्र हो सकता है।"

📖 शब्दार्थ (Word Analysis)

शब्द (Sanskrit) अर्थ (Hindi) English Meaning
शीत-वात-आतप सर्दी, हवा और धूप Cold, wind, and heat
क्लेशान् कष्टों/दुखों को Miseries/Sufferings
सहंते ये जो सहन करते हैं Those who endure
पराश्रिताः दूसरों पर आश्रित/गुलाम Dependent on others
तदंशेन अपि उसके एक अंश से भी Even by a fraction of it
मेधावी बुद्धिमान व्यक्ति The wise person
तपः तप्त्वा तप (मेहनत) करके Performing penance/effort
सुखी भवेत् सुखी हो सकता है Can become happy

(↔ तालिका को खिसका कर देखें)

🧠 व्याकरणात्मक विश्लेषण

1. द्वन्द्व समास (Dvandva Compound):
'शीतवातातप' में द्वन्द्व समास है (शीत च वात च आतप च)। यह दर्शाता है कि पराधीन व्यक्ति को मौसम की हर मार झेलनी पड़ती है।
2. विरोधाभास (Contrast):
श्लोक में 'पराश्रित' (गुलाम/सेवक) और 'मेधावी' (बुद्धिमान/स्वतंत्र) के बीच तुलना है। एक मजबूरी में कष्ट सहता है, दूसरा स्वेच्छा से तप करता है।

🏙️ आधुनिक सन्दर्भ

यह श्लोक आज के 'Corporate Life' और 'Startups' के लिए आँखें खोलने वाला है:

  • The Rat Race (पराश्रित): हम ऑफिस जाने के लिए 2-2 घंटे ट्रैफिक में धक्के खाते हैं, बॉस की डांट सुनते हैं, बीमार होने पर भी काम करते हैं। यह सब 'पराश्रित' होकर पैसे कमाने के लिए है।
  • Self-Development (तपस्या): अगर हम वही मेहनत (traffic में समय बर्बाद करने के बजाय) जिम जाने में, कोई नई स्किल सीखने में, या अपना बिज़नेस खड़ा करने में लगा दें (तदंशेन अपि - केवल उसका कुछ हिस्सा), तो हम जीवन भर के लिए सुखी हो सकते हैं।

🐢 संवादात्मक नीति कथा

🐴 पालतू घोड़ा और जंगली सांड

एक बार एक पालतू घोड़ा, जिस पर भारी सामान लदा था, जंगल से गुजर रहा था। वह पसीने में लथपथ था और उसका मालिक उसे चाबुक मार रहा था।

उसे एक जंगली सांड (Bull) मिला जो मजे से घास चर रहा था। घोड़े ने कहा, "भाई, तुम कितने किस्मत वाले हो। मुझे देखो, मुझे खाने के लिए भी मालिक पर निर्भर रहना पड़ता है और बदले में मार खानी पड़ती है।"

सांड ने पूछा, "तुम इतना वजन क्यों उठा रहे हो?"
घोड़ा बोला, "पेट भरने के लिए।"

बुद्धिमानी की बात: सांड हंसा और बोला, "मित्र! जितना पसीना तुम इस मालिक के लिए बहा रहे हो, अगर उसका आधा भी खुद भोजन ढूंढने में लगाते, तो आज तुम राजा होते, गुलाम नहीं।"

निष्कर्ष: हम दूसरों के सपनों को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं, लेकिन अपने सपनों के लिए आलस करते हैं।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

दूसरों की सेवा में जो 'कष्ट' है, उसे मजबूरी कहते हैं।
अपने विकास के लिए जो 'कष्ट' है, उसे 'तपस्या' कहते हैं।
बुद्धिमान बनिए, मजबूरी नहीं, तपस्या चुनिए।

© BhagwatDarshan.com | ॥ इति शुभम् ॥

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