।। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा ।।
सीता स्वयंवर में जिस धनुष को उठाना, खैंचना और तोड़ना था, उस धनुष को भगवान शिव त्रिपुरासुर का वध करके जनकजी को सौंप देते हैं। सीताजी उसको उठा कर हल्का कर देती हैं। धनुष को केवल तोड़ना ही नहीं था, बल्कि उठाना और खैंचना भी था। भगवान श्रीराम धनुष को उठाकर, खैंचकर और तोड़कर जनकजी की प्रतिज्ञा को पूर्ण कर देते हैं। इस लीला में पूरा का पूरा तत्त्वज्ञान (कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग) भरा पड़ा है। यदि इस प्रसंग में शिवजी द्वारा छोड़ने, सीताजी द्वारा हल्का करने तथा श्रीरामजी के द्वारा उठाने, खैंचने और तोड़ने के संदर्भ में लिखें तो लेख लम्बा हो जाता है। कथा के उल्लेख में, व्याख्या में, विस्तार की आवश्यकता होती है। विस्तार में नाम अपराध का मुझे भय बना रहता है।
मेरी अपनी शैली सरल और साधारण शब्दों की है। अस्तु!!
जनक की प्रतिज्ञा और नगरवासियों की व्याकुलता
प्रथम तो समस्त अयोध्या के नर, नारी और समस्त नागरिक प्रभु श्रीराम के दर्शन से आनन्दातिरेक और प्रसन्नता से भर जाते हैं। लेकिन रंगशाला में महाराज श्रीजनक की प्रतिज्ञा को याद करके सभी जनों के चेहरे उदासी से मुरझा जाते हैं, मन में निराशा व्याप्त हो जाती है। सीताजी की सखियाँ ज्ञानी महाराज जनक के लिये 'जड़' शब्द का सम्बोधन करती हैं। और ये जड़ शब्द जनकजी के लिये धनुष-भंग के पश्चात् परशुरामजी भी करते हैं। पूछते हैं - कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।
भगवान राम, विश्वामित्रजी और लक्ष्मणजी के साथ रंगभूमि (धनुष-यज्ञ स्थल) में विराजमान हैं। सीताजी के करकमलों में जयमाला सुशोभित है। वहाँ उपस्थित स्त्री-पुरुष रामजी के रूप और सीताजी की छबि एकटक देखते रह जाते हैं। ये सब तो चाहते हैं कि इन दोनों का विवाह कितना सुखदायी होगा, लेकिन बीच में जनकजी की प्रतिज्ञा व्यवधान है। सब मन ही मन प्रार्थना कर रहे हैं - हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। हे विधाता ! जनक की मूढ़ता को शीघ्र हर लीजिये और उन्हें ऐसी सद्बुद्धि दीजिये - जिससे बिना विचार किये:
सीय राम कर करै बिबाहू।।
अर्थात् राजा अपना प्रण छोड़कर सीताजी का विवाह रामजी से कर दें। जब स्वयंवर का कोई भी राजा धनुष को हिला भी नहीं पाता तो अब जनकजी सभी राजाओं को घर लौट जाने के लिये कहते हैं और बड़े भारी मन से कहते हैं - "यदि अपना प्रण तोड़ता हूँ तो पुण्य चला जाता है। इसलिये अब मैं क्या करूँ, कन्या कुँवारी ही रह जायेगी।"
लक्ष्मण की गर्जना और विश्वामित्र की आज्ञा
जनकजी के इस कथन को सुनकर कि "पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है", जनकजी के वचन लक्ष्मणजी को बाण से लगे। देखिये ! भगवान राम मानो किसी सुषुप्त सिंह की भाँति हैं। उन्हें सक्रिय बनाने के लिये, जगाने के लिये लक्ष्मणजी की गर्जना नितान्त आवशयक है। अभी तक के घटना क्रम में भगवान राम जहाँ बैठे हैं, वहीं बैठे रहे। जनकजी हैं ब्रह्मवादी और वेदान्त का ब्रह्म निष्क्रिय है। यहाँ मानो प्रभु श्रीराम ब्रह्मवादी जनकजी के मत का ही समर्थन कर रहे हों।
लक्ष्मणजी की गर्जना से सारा ब्रह्माण्ड डगमगा चुका था। और दो जो नहीं हिले थे, वे एक तो प्रभु श्रीराम थे और दूसरा था धनुष। शुभ समय (काल-विशेष) जानकर विश्वामित्रजी बोले -
मेटहु तात जनक परितापा।।
हे राम ! उठो, शिवजी का धनुष तोड़ो और हे तात ! जनक का संताप मिटाओ।। विश्वामित्रजी के कथन का क्या अभिप्राय है? - ये कि जनकजी के दु:ख को मिटाने के लिये धनुष को तोड़ो। अर्थात् धनुष के टूटने या न टूटने से विवाह का कुछ भी लेना-देना नहीं है। भगवान उठे और बड़े ही शान्त भाव के बिना किसी हर्ष-विषाद से चले।
धनुष: अहंकार का प्रतीक
अब उस घटना का वर्णन करते हैं, जो आज का विषय है। भगवान को धनुष की ओर धीरे-धीरे बढ़ते देख नगर के सभी स्त्री-पुरुष अपने-अपने पितर और देवताओं की वन्दना करके पुण्यों के बदले में चाहते हैं -
तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं।।
हे गणेश गोसाईं ! रामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को कमल की डंडी की भाँति तोड़ डालें। सीताजी मन-ही-मन भगवान शंकर और माता भवानी से विनती कर रही हैं। यहाँ दो जगह गोस्वामीजी धनुष के भारीपन की बात लिखते हैं। धनुष है अहंकार का प्रतीक। प्रथम सीताजी महेश-भवानी से प्रार्थना करती है़ - करि हितु हरहु चाप गरुआई।। (मुझपर स्नेह करके धनुष के भारीपन को हर लीजिये)। फिर गणेशजी से विनती कर रही हैं - करहु चाप गुरुता अति थोरी।। (मेरी विनती सुनकर भारीपन बहुत ही कम कर दीजिये)।
यदि हर क्षण ईश्वर के ऐश्वर्य का ही ज्ञान बने रहे तो जो स्वाभाविक भावनाएँ हैं, उनका निर्वहन कैसे होगा? पुष्टवाटिका में उन्हें माता पार्वती का वरदान मिल चुका है। वे अपने निज प्रियतम के दर्शन को इस रूप में छिपाती हैं कि प्रीति पुरातन लखइ न कोई। रंगभूमि में भगवान की सुकुमारता और धनुष की कठोरता से, भगवान द्वारा उसके तोड़े जाने से सबका मन संशकित है।
सीता की शक्ति और परशुराम का संदेह
जनकजी प्रतिदिन इस धनुष की पूजा किया करते थे। एक दिन उन्हें धनुष के नीचे की धरती जब स्वच्छ मिली तो उन्होंने सेवकों से पूछा - "आज लिपाई किसने की है?" बताया गया कि जानकी ने। जनकजी ने बालिका को बुला कर पूछा - "तुमने धनुष के नीचे की लिपाई कैसे की?" सीताजी बायें हाथ में धनुष को उठाकर और दायें हाथ से सफाई करके दिखा देती हैं। जिस धनुष को शिवजी अपने दोनों हाथों से उठाया करते थे, सीताजी बड़ी आसानी से उसे एक हाथ से उठा लेती हैं। उसी समय जनकजी समझ जाते हैं कि ये कोई साधारण कन्या नहीं है। जनकजी के धनुष तोड़ने के प्रण के पीछे यही भाव था कि जिनकी ये शक्ति हैं, वे धनुष को तोड़कर (प्रमाण देकर) अपनी शक्ति को स्वीकार करें।
देखिये ! शिवजी द्वारा छोड़ने, सीताजी द्वारा हल्का बनाने और भगवान द्वारा तोड़ने के इस प्रसंग में अहंकार के विसर्जन की प्रक्रिया का पूरा वर्णन है। अहंकार को भगवान के सिवा और कोई नहीं तोड़ सकता। परशुरामजी को लगा था, जिसने धनुष तोड़ा होगा, वह तो गर्व से अकड़ कर खड़ा होगा। लेकिन रंगभूमि में उन्हें ऐसा कोई नहीं दिखा। परशुरामजी जानना चाहते थे कि ये धनुष टूट कैसे गया? लक्ष्मणजी के साथ एक लम्बे तकरार के बाद उन्हें कुछ-कुछ शंका होने लगी कहीं भगवान तो नहीं आ गये हैं। उनके पास भगवान विष्णु का धनुष था, जिसे खैंच कर जाँचने के लिये परशुरामजी बोले -
खैचहूँ चाप मिटे मोर संदेहू।।
इतना बोलते ही उनके कंधे का धनुष उतर कर प्रभु श्रीराम के हाथों में पहुँच जाता है। परशुरामजी के इस प्रश्न का ये जबाव था कि धनुष टूट कैसे गया। मानो भगवान बताना चाह रहे हों कि जैसे ये धनुष स्वयं खींच गया, वैसे ही वो भी टूट गया।

