Ghagh Ki Kahawat: Agriculture
खेती, बोआई, बीज और सिंचाई (सम्पूर्ण संग्रह: 89-136)
आये अद्रा, धान की बोनी ॥ ८९ ॥
अर्थ: किसान को चाहिये कि रोहिणी नक्षत्र में खटिया की बिनाई, मृगशिरा में छप्पर की छवाई कर ले। आद्रा नक्षत्र चढ़ने पर धान की बोवाई का काम करे।
जेतो बोवे, तेतो लवा ॥ ९० ॥
अर्थ: सावन के महीने में साँवाँ और अगहन में जौ की बोआई करने से उपज अच्छी नहीं होती अर्थात् जितना बीज बोया जाता है उतना ही रह जाता है (मुनाफा नहीं होता)।
असलेषा में, जोन्हरी मान ॥ ९१ ॥
अर्थ: पुष्य और पुनर्वसु नक्षत्र में धान तथा आश्लेषा में जोन्हरी (मक्का/ज्वार) की बोआई करनी उचित है।
फिर मन में होवे नहिं सुख ॥ ९२ ॥
अर्थ: पुष्य नक्षत्र में बाजरे की बोआई करने वाला किसान सुखी नहीं हो सकता अर्थात् इस नक्षत्र में बाजरा नहीं बोना चाहिये।
विधि का लिखा, झूठ नहिं जान ॥ ९३ ॥
अर्थ: चित्रा नक्षत्र के आधा बीत जाने पर धान की बालें अवश्य फूट जायेंगी। ऐसा सत्य समझना चाहिये।
अर्थ: कन्या राशि की संक्रान्ति आने पर धान तथा मीन की संक्रान्ति पर जौ की कटाई करनी चाहिये।
मृगसिर जो कोई बोवै चेना । जमीदार को कुछ नहीं देना ॥
बजरा बोवै आये पुख । फिर मन करें कभी नहीं सुख ॥ ९५ ॥
अर्थ: रोहिणी और मृगशिरा में मक्का, मडुवा, उड़द बोने से एक पैसा भी नहीं मिलेगा। मृगशिरा में चेना बोने से लगान भी नहीं निकलेगा। पुष्य में बाजरा बोने से कभी सुख नहीं मिलता।
रवि मंगल बोनी करें, घर नहि आवै धान ॥ ९६ ॥
अर्थ: धान की बोआई में बुधवार और वृहस्पतिवार शुभ होते हैं, शुक्रवार अच्छा नहीं। रविवार और मंगलवार को धान बोने से घर में एक दाना भी नहीं आता।
अर्थ: चित्रा में गेहूँ और आद्रा नक्षत्र में धान की खेती करने से गेहूँ में गेरुई रोग नहीं लगता और धान को धूप का असर नहीं होता।
अब का होये, बोये मास ॥ ९८ ॥
अर्थ: हस्ती (हस्त) तारा उगने और कास के फूल जाने पर उड़द (मास) की बोआई करने से कोई फायदा नहीं होता।
अर्थ: पूर्वा नक्षत्र में धान की रोपाई करने से ज्यादातर खाली धान (पैया/बिना चावल का) ही पैदा होगा।
अर्थ: शुक्रवार को कटाई (लडनी) और बुधवार के दिन बोआई (बउनी) का काम अच्छा होता है।
उरदो बो हथिया की आस ॥ १०१ ॥
अर्थ: हस्ती तारा और कास की परवाह किये बिना ही हथिया नक्षत्र के भरोसे पर उड़द की बोआई कर लेनी चाहिये।
अर्थ: जो किसान मघा नक्षत्र में जड़हन धान बोकर, पूर्वा में देख-रेख करे तो उत्तरा में खेत हरा-भरा रहेगा।
अर्थ: चित्रा में चना और स्वाती में गेहूँ की बोआई करने से चौगुनी उपज होती है।
आधे हथिया तीसी राई ॥ १०४ ॥
अर्थ: हस्त नक्षत्र के आधा बीत जाने पर मूली और आखीर में तीसी, राई आदि की खेती करनी चाहिये।
होन न पाये, खावै कौवा ॥ १०५ ॥
अर्थ: अगहन के महीने में बोये हुए जौ को कौवे ही खा जायेंगे अर्थात् उसकी पैदावार नहीं हो सकती।
रोवै किसान जो बोवै चिरैया ॥ १०६ ॥
अर्थ: आर्द्रा में धान बोने से अच्छा फल मिलता है। पुनर्वसु में बोने से बिना चावल का धान होता है और पुष्य (चिरैया) में बोने वाला किसान रोता है।
लगे चिरैया दिया न बाती ॥ १०७ ॥
अर्थ: आर्द्रा में बोने से डंठल कड़े, पुनर्वसु में पत्तियाँ ही पत्तियाँ और पुष्य की बुआई से अंधकार (नाममात्र उपज) होता है।
सुखी होन का जगत में, यही एक है ढंग ॥ १०८ ॥
अर्थ: फसल के पौधों को अलग-अलग (दूर) रखना चाहिये, और मनुष्यों को साथ में (एकता में)। यही सुखी होने का ढंग है।
तब सुतरी की आशा होवै ॥ १०९ ॥
अर्थ: सनई को नजदीक (घना) बोने से ही अच्छी सुतरी की आशा होती है।
वे घर यों ही जायेंगे, गहैं पराई सीख ॥ ११० ॥
अर्थ: जो कपास के खेत में दोबारा कपास और ईख में दोबारा ईख बोते हैं, और दूसरों की (गलत) सीख मानते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं।
अर्थ: गाजर, शकरकन्द और मूली की बोआई दूर-दूर पर करनी चाहिये।
घर कीजै, व्यवहरिया पास ॥ ११२ ॥
अर्थ: खेती ईख और कपास की करनी चाहिए और घर कर्ज देने वाले महाजन (व्यवहरिया) के पास बनाना चाहिए।
फिर तो ऊख बहुत सुख पावै ॥ ११३ ॥
अर्थ: ऊख की गोड़ाई करने के बाद उस पर मिट्टी डाल देनी चाहिये, ऐसा करने से पैदावार अच्छी होती है।
पैर पैर पर बाजरा, दुखको देखे टार ॥ ११४ ॥
अर्थ: सन घना, कपास दूर (बीड़र), ज्वार मेंढक की छलाँग की दूरी पर और बाजरा पग-पग पर बोना चाहिए। इससे दुख दूर होता है।
अर्थ: बाजरा, मक्का और जोन्हरी को कुछ दूरी के फासले पर बोना चाहिये।
ऐसे बोवें जो कोई, कस कस भरै कोठार ॥ ११६ ॥
अर्थ: कदम की दूरी पर बाजरा और मेंढ़क की कुदान की दूरी पर ज्वार बोने से कोठार (भंडार) ठूँस-ठूँस कर भर जाता है।
सोई चतुर किसान कहाये ॥ ११७ ॥
अर्थ: जो फगुआ (होली) तक ईख को रूँधकर बाँध रखते हैं, वे ही चतुर किसान कहे जाते हैं।
फिर चिचरा को लेय बहार ॥ ११८ ॥
अर्थ: खोदी हुई जमीन में भदई का धान बोने से अच्छी तरह जिउड़ा खाने में आता है।
जाकर कहो किसान से, बोवै घनी ऊख ॥ ११९ ॥
अर्थ: हिरन की छलाँग की दूरी पर ककड़ी, पग-पग पर कपास, और ईख खूब घनी बोनी चाहिए।
कहिये उसको पूर किसान ॥ १२० ॥
अर्थ: पहले ककड़ी बोकर फिर उसी खेत में धान की बोआई करने वाला ही पक्का किसान समझा जाता है।
अर्थ: पोस्त (दाना) और तीसी (अरसी) की बोआई के लिए नम (सरस) भूमि की आवश्यकता होती है।
अर्थ: यदि उड़द बोने की जानकारी हो तो बोए, नहीं तो उसकी बरी (कोहड़ौरी) बनाकर खा लेना ही अच्छा है।
अर्थ: जौ-चना अलग-अलग ठीक हैं, कपास दूर ठीक है, लेकिन छीछी (विरली/दूर-दूर) ईख बोने वाले की कोई आशा नहीं (फसल खराब होगी)।
कोदो बरें, सेर बोआओ । डेढ़ सेर बीघा, तीसी नाधो ॥ १२४ ॥
अर्थ: प्रति बीघा: साँवाँ सवा सेर; तिल-सरसों एक अंजलि; कोदो-कुसुम एक सेर; तीसी डेढ़ सेर।
बोवै चना पसेरी तीन, तीन सेर बीघा जोन्हरी लीन ॥ १२५ ॥
अर्थ: प्रति बीघा: गेहूँ-जौ 5 पसेरी; मटर 30 सेर; चना 3 पसेरी; जोन्हरी (मक्का) 3 सेर बोना चाहिये।
इसी रीति से बोवै किसान, दूने लाभ की खेती जान ॥ १२६ ॥
अर्थ: बजरी, बाजरा, साँवाँ डेढ़ सेर; काकुन, कोदो सवा सेर - इस मात्रा से बोने पर दुगुना लाभ होता है।
पाँच पसेरी बिगहे धान, तीन पसेरी जड़हन जान ॥ १२७ ॥
अर्थ: प्रति बीघा: कपास डेढ़ सेर; मोथी, अरहर, उड़द दो सेर; धान 5 पसेरी; जड़हन 3 पसेरी।
अर्थ: धान, पान और केला - ये तीनों पानी के भक्त (चेला) हैं। इन्हें अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है।
अर्थ: यदि लगातार वर्षा होती रहे तो साँवाँ और साठी धान साठ दिन (दो महीने) में पककर तैयार हो जाते हैं।
अर्थ: तरकारी (सब्जियों) को पानी की बड़ी जरूरत होती है। इन्हें हमेशा 'तर' (गीला) रखना चाहिये।
अर्थ: साठी धान 60 दिन में तब तैयार होता है जब उसे हर आठवें दिन पानी मिलता रहे।
अर्थ: सभी सिंचाई एक तरफ और अगहन (मार्गशीर्ष) मास की सिंचाई एक तरफ। यह फसलों के लिए सबसे श्रेष्ठ (जेठा) होती है।
अर्थ: धान के फूल के काला होते समय यदि पानी नहीं मिला, तो वह अधखिली जवानी में ही मर जाता है।
हाथ में रोटी, बगल में पैना । एक बार बहै पुरवाई, लेना है न देना ॥ १३४ ॥
अर्थ: चेना बहुत मेहनती फसल है, 16 बार सिंचाई चाहिए। बैल और आदमी थक जाते हैं। इतनी मेहनत के बाद भी अगर एक बार पुरवाई हवा बह जाए, तो सब चौपट हो जाता है।
अर्थ: (दोहा 133 की पुनरावृत्ति) धान के फूलते समय पानी अत्यंत आवश्यक है।
अर्थ: धान, पान और खीरा - ये सब पानी के कीड़े हैं (पानी के बिना जीवित नहीं रह सकते)।

