Ghagh Ki Kahawat Niti Vishayak (Complete) - घाघ की नीति बातें

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
Ghagh Ki Kahawat Niti Vishayak (Complete) - घाघ की नीति बातें

Ghagh Ki Kahawat: Niti

नीति-विषयक बातें (सम्पूर्ण संग्रह: 1-88)

#1
अगसर खेती अगसर मार ।
घाघ कहें ये कबहुँ न हार ॥ १ ॥

अर्थ: घाघ कवि का कहना है कि जो व्यक्ति खेती और युद्ध में सबसे पहले डट जाता है वह कभी असफल नहीं होता।

#2
नित्तै खेती दूसरे गाय ।
जे नहिं देखै तेकर जाय ॥ २ ॥

अर्थ: जो लोग प्रतिदिन खेती और दूसरे दिन गाय की रखवाली नहीं करते, उनकी ये दोनों चीजें नष्ट हो जाती हैं।

#3
प्रातःकाल खटिया से उठिके, पिये जो ठण्ढा पानी ।
ता घर कबहुँ बैद न जइहैं, बात घाघ का जानी ॥ ३ ॥

अर्थ: जो व्यक्ति सबेरै सोकर उठते ही ठण्ढा पानी पी लेता है, वह सदैव स्वस्थ रहता है। घाघ की इस बात को सत्य मानना चाहिये।

#4
सावन घोड़ी भादों गाय । माघ मास में भैंस विआय ॥
घाघ कहें यह साँची बात । आप मरे या मलिकै खात ॥ ४ ॥

अर्थ: घाघ कहते हैं कि अगर सावन के महीने में घोड़ी, भादों में गाय तथा माघ में भैंस बियाय तो वह मर जायगी अन्यथा अपने मालिक को ही नष्ट कर डालेगी।

#5
भुइयाँ खेड़े, हर है चार। घर होय गिद्धिन, गऊ दुधार ॥
रहर की दाल, जड़हने क भात । पाकल नीबू, औ घिव तात ।।
दही खाड़ जौ, घर में होय । तिरछे नैन, परोसे जोय ॥
घाघ कहें, सबही है झूठा । उहाँ छाँड़ि, इहवें बैकुण्ठा ॥ ५ ॥

अर्थ: यदि खेत घर के पास हो, चार हल की खेती हो, कुशल स्त्री हो, दुधारू गाय हो, अरहर की दाल, जड़हन चावल का भात, पका नीबू और घी हो... तो स्वर्ग-सुख सब झूठ है, असली बैकुण्ठ (स्वर्ग) यहीं है।

#6
पर हथ बनिन संदेशे खेती । बिन देखे नर ब्याहे बेटी ॥
द्वार पराये गाड़े थाती। ये चारों मिल पीटे छाती ॥ ६ ॥

अर्थ: दूसरे के भरोसे व्यापार, संदेश से खेती, बिना देखे बेटी का ब्याह और पराये घर में धन गाड़ना - ये चारों अंत में छाती पीटकर पछताते हैं।

#7
जिसकी छाती पर नहिं बार ।
उसकी मत कीजै इतबार ॥ ७ ॥

अर्थ: जिसकी छाती के ऊपर बाल न हों, उस मनुष्य की बातों में न फँसना चाहिये (विश्वास नहीं करना चाहिए)।

#8
घर में नारी आँगन सोवै । रन में जाकर क्षत्री रोवै ॥
रात को सतुआ करे बियारी । घाघ मरै तिनकी महतारी ॥ ८ ॥

अर्थ: घर में स्त्री के रहते आँगन में सोना, युद्ध में जाकर रोना और रात में सतुआ खाना - इन कार्यों को करने वालों की माताओं को अपार शोक होता है।

#9
खेती बारी कामिनी अरु घोड़े की तंग ।
अपने हाथ सँवारिये, बड़े लाख हों संग ॥ ९ ॥

अर्थ: खेती, बागवानी, स्त्री और घोड़े की तंग - इन्हें अपने ही हाथ से सँवारना चाहिये, चाहे साथ में लाखों सेवक क्यों न हों।

#10
बाढ़े पूत पिता के धर्मा ।
खेती होवै अपने कर्मा ॥ १० ॥

अर्थ: पिता के धर्मात्मा होने पर पुत्र की बढ़ती होती है, परन्तु खेती अपनी ही मेहनत और तकदीर से होती है।

#11
काँटा बुरा करील का, औ बदरी का घाम ।
सौत बुरी है चून की, अरु साझे का काम ॥ ११ ॥

अर्थ: करील का काँटा, बदली की धूप, आटे की सौत और साझेदारी का काम बहुत ही खराब होता है।

#12
चैते गुड़ बैसाखे तेल । जेठ में पेठा असाढ़े बेल ।।
सावन साग न भादों मही । क्वार करेला कातिक दही ॥
अगहन जीरा पूसे धना । माहे मिश्री फागुन चना ।।
इन बारह से बचे ओ भाई। ता घर सपनेहुँ बैद न जाई ॥ १२ ॥

अर्थ: (परहेज) चैत्र में गुड़, वैशाख में तेल, ज्येष्ठ में पेठा, आषाढ़ में बेल, सावन में साग, भादों में मठा, क्वार में करेला, कार्तिक में दही, अगहन में जीरा, पूस में धनिया, माघ में मिश्री और फागुन में चना नहीं खाना चाहिए। जो इनसे बचता है, वह सदैव निरोग रहता है।

#13
सधुबै दासी चोरवै खाँसी, प्रेम बिगारै हाँसी ।
घग्घा उनकी बुद्धि बिगारै, खाय जो रोटी बासी ॥ १३ ॥

अर्थ: साधु को दासी, चोर को खाँसी और प्रेम को हँसी नष्ट कर देती है। उसी प्रकार जो बासी रोटी खाता है, उसकी बुद्धि बिगड़ जाती है।

#14
गया पेड़ जब बकुला बैठा । गया गेह जब जोगिया पैठा ॥
गया राज जहँ राजा लोभी । गया खेत जइँ जामी गोभी ॥ १४ ॥

अर्थ: बगुला बैठने से पेड़, जोगियों के आने से घर, लालची होने से राजा का राज्य और गोभी (घास) उगने से खेत नष्ट हो जाता है।

#15
बगड़ बिराने जो रहे, सुनै त्रिया की सीख ।
तीनों यों ही जायेंगे, पाही बोवे ईख ॥ १५ ॥

अर्थ: दूसरे के घर में रहने वाले, केवल स्त्री की सीख पर चलने वाले और घर से बहुत दूर ईख बोने वाले - ये तीनों शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

#16
एक तो बसो सड़क पर गाँव । दूजे बड़े बड़ेन में नाँव ॥
तीजे रहे दरब से हीन। ये हैं विपता तीन ॥ १६ ॥

अर्थ: सड़क के पास गाँव, बड़े लोगों में नाम (दिखावा) और धन का अभाव - ये तीनों बड़ी विपत्तियाँ हैं।

#17
आलस नींद किसानै नासै, चोरवै नासै खाँसी ।
अखियाँ मैली वेश्या नासै, बाबै नासै दासी ॥ १७ ॥

अर्थ: आलस्य और नींद किसान को, खाँसी चोर को, मैली आँखें वेश्या को और दासी साधुओं को नष्ट कर देती है।

#18
ओछा मंत्री राजा नासै, तालै नासै काई ।
मान साहिबी फूट विनासै, घग्घा पैर बेबाई ॥ १८ ॥

अर्थ: तुच्छ मंत्री राजा को, काई तालाब को, फूट प्रतिष्ठा को और बेबाई (बिवाई) पैर को नष्ट कर देती है।

#19
सावन हर्र भादों चीत । क्वार मास गुड़ खाय न मीत ।।
कातिक मूली अगहन तेल । पूस में करो दूध से मेल ॥
माघ मास घिव खिचड़ी खाय । फागुन नित उठि प्रात नहाय ॥
चैत मास में नीम बेसहती । बैसाखे में खाय जवहती ॥
जेठ मास जो दिन में सोवै । तेकर जर अषाढ़ में रोवै ॥ १९ ॥

अर्थ: (स्वास्थ्य नियम) सावन में हर्र, भादों में चीता, क्वार में गुड़, कार्तिक में मूली, अगहन में तेल, पूस में दूध, माघ में खिचड़ी, फागुन में प्रात: स्नान, चैत में नीम, बैसाख में भात खाना और जेठ में दिन में सोना - जो यह करता है वह निरोग रहता है।

#20
बैल चौंकना जोत में, अरु चटकीली नार ।
ये बैरी हैं प्रान के, कुशल करे करतार ॥ २० ॥

अर्थ: जोतते समय भड़कने वाला बैल और भड़कीली (चटकीली) औरत - ये दोनों प्राणों के शत्रु हैं।

#21
बैल बगौधा, निरधिन जोय ।
तेहि घर ओरहन, कबहुँ न होय ॥ २१ ॥

अर्थ: जिस घर में सीधा (बगौधा) बैल और सादे वेश में रहने वाली स्त्री हो, वहाँ कभी किसी का उलहना नहीं आता।

#22
साँझ समय पर रहतो खाट, पड़ी भँडेहर बारह बाट ।
घर आँगन सब घिन घिन होय, घग्घा उनको देव डुबोय ॥ २२ ॥

अर्थ: जो स्त्री शाम होते ही सो जाए, बर्तन बिखरे रहें और घर गंदा रहे, उसका होना न होना बराबर है।

#23
निहपछ राजा मन हो हाथ । साधु परोसी नीमन साथ ॥
हुक्मी पूत धिया सत्तवार । तिरिया भाई करे विचार ॥
घाघ कहें हम करत विचार । बड़े भाग्य से दे करतार ॥ २३ ॥

अर्थ: निष्पक्ष राजा, वश में मन, अच्छा पड़ोसी, आज्ञाकारी पुत्र, सती पुत्री और विचारशील भाई - ये बड़े भाग्य से मिलते हैं।

#24
बूढ़ा बैल बिसाई, झीना कपड़ा लेय ।
आपहिं करै नसौनी, दूषन देवै देय ॥ २४ ॥

अर्थ: जो बूढ़ा बैल और झीना (पतला) कपड़ा खरीदता है, वह अपना नुकसान खुद करता है और दोष ईश्वर को देता है।

#25
ढीठ पतोहु धिया गरियार । खसम बेपीर न करै विचार ।।
घरे अलावन अन्न न होय । कहते घाघ अभागी जोय ॥ २५ ॥

अर्थ: ढीठ बहू, सुस्त बेटी, क्रूर पति और अन्न-ईंधन से खाली घर वाली स्त्री बहुत अभागिन होती है।

#26
विप्र टहलुआ चोरु धन, अरु बेटी की बाढ़ ।
यतनेहु पर धन ना घटे, करहु बदन से राढ़ ॥ २६ ॥

अर्थ: ब्राह्मण से सेवा कराने, चोरी का धन रखने और बेटियों की संख्या बढ़ने पर भी यदि धन न घटे, तो बड़ों से झगड़ा कर लो - धन अवश्य नष्ट हो जाएगा। (यह व्यंग्य है)।

#27
जेहि घर साला सारथी, नारी की हो सीख ।
सावन में बिन हल रहे, तीनों माँगै भीख ॥ २७ ॥

अर्थ: जिस घर का मालिक साला हो, जहाँ स्त्री की ही चलती हो, और सावन में जिसके पास हल न हो - ये तीनों भीख माँगते हैं।

#28
खाय के मूतै सूते बाउँ ।
काहे बैद बुलावै गाउँ ॥ २८ ॥

अर्थ: जो खाने के बाद पेशाब करता है और बायीं करवट सोता है, उसे वैद्य बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती।

#29
भेदिया सेवक, सुन्दरि नारि ।
जीरन पट कुराज, दुख चारि ॥ २९ ॥

अर्थ: भेदिया नौकर, (अत्यधिक) रूपवती स्त्री, फटे-पुराने कपड़े और दुष्ट राजा - ये चारों दुखदायी हैं।

#30
रहै निरोगी, जो कम खाय ।
काम न बिगरै, जो गम खाय ॥ ३० ॥

अर्थ: कम खाने वाला निरोगी रहता है और गम खाने वाला (सहनशील) व्यक्ति का काम कभी नहीं बिगड़ता।

#31
ना अति बरखा, ना अति धूप ।
ना अति बकता, ना अति चूप ॥ ३१ ॥

अर्थ: अति सर्वत्र वर्जित है - न बहुत बारिश, न बहुत धूप; न बहुत बोलना, न बहुत चुप रहना अच्छा है।

#32
नसकट पनही, बत्तकट जोय । पहले पहल जो, बिटिया होय ॥
पातर कृषी, बौरहा भाय । कहें घाघ दुःख, कहाँ समाय ॥ ३२ ॥

अर्थ: काटने वाला जूता, बात काटने वाली पत्नी, पहली संतान बेटी, कमजोर खेती और पागल भाई - इनसे बहुत दुख मिलता है।

#33
भैंस खुशी जब, मॅड़िया परै ।
रॉड खुशी जब, सबका मरै ॥ ३३ ॥

अर्थ: भैंस कीचड़ में बैठकर खुश होती है और ईर्ष्यालु (राँड़) स्त्री दूसरों के नुकसान पर खुश होती है।

#34
खेती करै बनिज को धावै ।
ऐसा बूड़े थाह न पावै ॥ ३४ ॥

अर्थ: जो खेती और व्यापार दोनों एक साथ करना चाहता है, वह ऐसा डूबता है कि उसे थाह नहीं मिलती (बर्बाद हो जाता है)।

#35
भूरे हथिनी, चंदुती जोय ।
पूस की बरखा, बिरलै होय ॥ ३५ ॥

अर्थ: भूरी हथिनी, गंजी स्त्री और पूस (जनवरी) की बारिश - ये बहुत कम देखने को मिलते हैं।

#36
धवले नीके कापड़े, धवल न नीके बार।
आछी काली कामरी, आछी न काली नार ॥ ३६ ॥

अर्थ: सफेद कपड़े अच्छे लगते हैं पर सफेद बाल नहीं। काली कम्बल अच्छी होती है पर काली (स्वभाव से मैली) स्त्री नहीं।

#37
बैल मरकहा, चमक्कुल जोय ।
तेहि घर ओरहन, नित उठि होय ॥ ३७ ॥

अर्थ: जिसके घर मारने वाला बैल और नखरे वाली स्त्री हो, उसे रोज शिकायतें सुननी पड़ती हैं।

#38
घर घोड़ा पैदल चले, तीर चलावे बीन ।
थाती रखै दमाद घर, जग में भकुआ तीन ॥ ३८ ॥

अर्थ: घोड़ा होते हुए पैदल चलना, बीन-बीन कर तीर चलाना और दामाद के घर धन रखना - ये तीन महामूर्ख के लक्षण हैं।

#39
घर की कलह, औ जर की भूख । छोट दमाद, बराहे-ऊख ।।
पातर खेती, भकुआ भाय । कहें घाघ दुःख, कहाँ समाय ॥ ३९ ॥

अर्थ: घर का झगड़ा, बुखार के बाद की भूख, छोटा दामाद, सूखती ईख, कमजोर खेती और मूर्ख भाई - ये सब बहुत दुखदायी हैं।

#40
परसुख देखि अपन मुँह गोवै । चूरी, कंगन, बेसरि ढोवै ॥
आँचर टारि के पेट दिखावै । कहु छिनार का ढोल बजावै ॥ ४० ॥

अर्थ: जो स्त्री पराए पुरुष को देख मुँह छिपाने का नाटक करे, गहने दिखावे और आँचल हटाकर पेट दिखाए - वह कुलटा है (उसके चरित्र पर संदेह है)।

#41
बिन बैलन खेती करें, बिन भाइन के रार।
बिन मेहरारू घर करै, चौदह साख लबार ॥ ४१ ॥

अर्थ: बिना बैल के खेती, बिना भाइयों के लड़ाई और बिना पत्नी के घर चलाना - ऐसा सोचने वाला महाझूठा है।

#42
खाय के पर आय, मार के टर आय ॥ ४२ ॥

अर्थ: खाने के बाद लेट जाना चाहिए और मारने के बाद (झगड़ा करके) वहाँ से हट जाना चाहिए।

#43
नसकट खटिया दुलकन घोर ।
कहें घाघ यह, विपति क ठोर ॥ ४३ ॥

अर्थ: चुभने वाली खटिया और दुलकी (उछलने वाली) चाल का घोड़ा - ये दोनों मुसीबत की जड़ हैं।

#44
फूटे से बनि जात हैं, ढोल, गवाँर, अँगार ।
फूटे से बनि जातु हैं, फूट, कपास, अनार ॥ ४४ ॥

अर्थ: ढोल, गँवार और अंगारा फूटने पर बिगड़ जाते हैं; लेकिन फूट (ककड़ी), कपास और अनार फूटने पर अच्छे हो जाते हैं।

#45
ओछे बैठक, ओछा काम । ओछी बातें, आठों जाम ॥
घाघ कहैं ये, तीन निकाम । मति लीजै, इनको नाम ॥ ४५ ॥

अर्थ: नीच लोगों के साथ बैठना, नीच काम करना और हर वक्त नीच बातें करना - ये तीनों बहुत बुरे हैं।

#46
नारि करकसा, कटहा घोर, हाकिम होइके लेय अँकोर ।
कपटी मित्र, पुत्र है चोर, घग्घा इन सबको दे बोर ॥ ४६ ॥

अर्थ: झगड़ालू स्त्री, काटने वाला घोड़ा, घूसखोर हाकिम, कपटी मित्र और चोर बेटा - इन सबको छोड़ देना ही बेहतर है।

#47
रूठे दैव, मेघ ना होय । खेती सूखति, नैहर जोय ॥
पूत विदेश, खाट पर कंत । घाघ कहें ई विपति क अंत ॥ ४७ ॥

अर्थ: बारिश न हो, खेती सूख रही हो, पत्नी मायके चली जाए, बेटा विदेश में हो और पति बीमार पड़ा हो - यह विपत्ति की हद है।

#48
चाकर चोर, राय बेपीर ।
घाघ कहें को राखै धीर ॥ ४८ ॥

अर्थ: यदि नौकर चोर हो और राजा निर्दयी हो, तो कोई कब तक धैर्य रख सकता है?

#49
पूत न मानै, अपना डाँट । भाई लड़े चहै, नित बाँट ॥
तिरिया कलही, करकस होई । नियरे रहै, दुष्ट सब कोई ॥
मालिक नाहिन, करै विचार । कहें घाघ ये विपति अपार ॥ ४९ ॥

अर्थ: बेटा बात न माने, भाई बँटवारे के लिए लड़ें, पत्नी झगड़ालू हो, पड़ोसी दुष्ट हों और मालिक विचारहीन हो - यह अपार विपत्ति है।

#50
जेकर ऊंचा बैठना, जेकर खेत निचान ।
तेकर वैरी का करें, जेकर मीत दिवान ॥ ५० ॥

अर्थ: जिसकी ऊँची पहुँच हो, जिसका खेत नीचे (पानी वाली जगह) हो और जिसका मित्र दीवान (मंत्री) हो, उसका दुश्मन कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

#51
छते की बैठक बुरी, परिछाई की छाँह ।
नियरे का प्रेमी बुरा, नित उठि पकरै बाँह ॥ ५१ ॥

अर्थ: छज्जे पर बैठना और परछाई की छाया बुरी है। पास का प्रेमी भी बुरा है जो बात-बात पर टोकता या अधिकार जमाता है।

#52
बिना माघ घी खिचड़ी खाय । बिना गौना ससुरारी जाय ॥
बिना समय के, पहिरै पौवा । कहें घाघ ये, तीनों कौवा ॥ ५२ ॥

अर्थ: बिना माघ के खिचड़ी खाना, बिना गौना ससुराल जाना और बिना मौसम जूते पहनना - ये तीनों मूर्खता के लक्षण हैं।

#53
राँड़ मेहरिया, अनाथ भैंसा ।
जब बिगड़े, तब होवै कैसा ॥ ५३ ॥

अर्थ: विधवा स्त्री और बिना नकेल का भैंसा - ये जब बिगड़ते हैं तो इन्हें संभालना बहुत मुश्किल होता है।

#54
नीचन से व्योहार बिहासा, हँसि के माँगत दामा ।
आलस नींद निगोड़ी घेरे, ये तीन निकामा ॥ ५४ ॥

अर्थ: नीच से हँसी-मजाक, अपना पैसा हँसकर माँगना और आलस्य-नींद में पड़े रहना - ये तीनों निकम्मेपन की निशानी हैं।

#55
अहिर मिताई, बदर छाहीं ।
होवे होवे, नाहीं नाहीं ॥ ५५ ॥

अर्थ: मूर्ख की दोस्ती और बादल की छाया का कोई भरोसा नहीं, कभी होती है कभी नहीं।

#56
चोर जुधारी गिरहकट, जार और नार छिनार ।
सौ सौगंधे खायें जो, घाघ न कर इतबार ॥ ५६ ॥

अर्थ: चोर, जुआरी, जेबकतरा और व्यभिचारी स्त्री - ये सौ कसमें भी खाएँ तो भी इन पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

#57
ऊँचा कोठा, मधुर बतास ।
कहें घाघ घर में कैलास ॥ ५७ ॥

अर्थ: ऊँचा पक्का मकान हो और ठंडी हवा चल रही हो, तो समझो घर में ही स्वर्ग (कैलास) है।

#58
खेत न जोते राड़ी, न भैंस बिसाहे पाड़ी ।
न मेहरी मरद क छाड़ी, क्यों लावे विपदा गाढ़ी ॥ ५८ ॥

अर्थ: पथरीला खेत जोतना, भैंस की पाड़ी (बच्चिया) खरीदना और छोड़ी हुई औरत को रखना - ये मुसीबत मोल लेने जैसा है।

#59
रीन काढ़ि व्योपार चलावे, छप्पर डारै तारो ।
सारे के सँग भगिनी पठवै, तीनों का मुँह कारो ॥ ५९ ॥

अर्थ: कर्ज लेकर व्यापार करना, फूस के छप्पर में ताला लगाना और साले के साथ बहन को विदा करना - ये तीनों काम मूर्खतापूर्ण हैं।

#60
अँतरे खोतरे कसरत करें । ताल नहाय ओसमाँ परै ॥
दैव न मारै आपुहिं मरै ॥ ६० ॥

अर्थ: अनियमित कसरत करना और तालाब में नहाकर ओस में सो जाना - ऐसे लोग अपनी मौत खुद बुलाते हैं।

#61
मुये चाम से चाम कटावै, मुझ सँकरी माँ सोवै ।
कहें घाघ ये तीनों भकुआ, निकरी गये पर रोवै ॥ ६१ ॥

अर्थ: तंग जूता पहनना, संकरी जगह में सोना और स्त्री के चले जाने पर रोना - ये तीनों मूर्खता हैं।

#62
माघ माँह की जाड़ी, और कुआरा घाम ।
जो कोइ यह दोनों सहै, करै पराया काम ॥ ६२ ॥

अर्थ: माघ की ठंड और क्वार की धूप जो सह सकता है, वही कठिन परिश्रम (गुलामी/नौकरी) कर सकता है।

#63
बाछा बैल, बहुरिया जोय ।
घर ना रहै, न खेती होय ॥ ६३ ॥

अर्थ: बछड़ा (अधपका) बैल और नई नवेली बहू - इनसे न खेती होती है और न घर का काम।

#64
आपन आपन सब कोइ होई । दुख माँ साथी नाहीं कोई ॥
अन्न वस्त्र खातिर झगड़न्त । कहें घाघ ये विपत्ति के अन्त ॥ ६४ ॥

अर्थ: सुख में सब अपने होते हैं, दुख में कोई नहीं। जब अपने ही अन्न-वस्त्र के लिए झगड़ने लगें, तो यह विपत्ति की हद है।

#65
सावन सोवै ससुर घर, भादों खाये पूआ ।
खेत खेत में घूमत पूछे, तोहरे केतिक हुआ ॥ ६५ ॥

अर्थ: जो सावन में ससुराल में सोता है और भादों में मालपुआ खाता है (काम नहीं करता), वह बाद में दूसरों के खेत देखकर पूछता है कि 'तुम्हारी फसल कैसी हुई?'

#66
कुतवा मूतनि, मरकनी, सरबलील, कुचकाट ।
घग्घा चारो परिहरौ, तब तुम सोओ खाट ॥ ६६ ॥

अर्थ: जिस खाट पर कुत्ते मूतते हों, जो चरमराती हो, जो ढीली हो और जो चुभती हो - ऐसी खाट पर कभी नहीं सोना चाहिए।

#67
टूटी-फूटी नाव, झिलँगा खटिया, बातल देह ।
तिरिया लम्पट, हाटे गेह ॥
भाय बिगरि के मुदई मिलन्त । कहें घाघ ये विपति के अन्त ॥ ६७ ॥

अर्थ: टूटी नाव, टूटी खाट, रोगी शरीर, कुलटा स्त्री, बाजार में घर और भाई का दुश्मन से मिल जाना - ये सब भारी विपत्तियाँ हैं।

#68
हँसुआ ठाकुर, खँखुआ चोर ।
इन्हें ससुर पन, देओ बोर ॥ ६८ ॥

अर्थ: हँसने वाला (मजाकिया) ठाकुर और खाँसने वाला चोर - ये दोनों अपने काम में असफल होते हैं।

#69
जाको मारा चाहिये, बिन मारे बिन घाव ।
ताको यही बताइये, घुइयाँ पूरी खाव ॥ ६९ ॥

अर्थ: जिसे बिना घाव के मारना हो, उसे रोज घुइयाँ (अरबी) और पूरी खाने की सलाह दो (वह बीमार होकर मर जाएगा)।

#70
हलकन बेंट कुदारी, हो गोहरावै नारी ।
भैया कहिके माँगै दामा, ये तीनों हैं काम निकामा ॥ ७० ॥

अर्थ: ढीली कुदाल, 'हो' कहकर बुलाने वाली स्त्री और भैया कहकर (गिड़गिड़ाकर) पैसा माँगना - ये तीनों काम बेकार हैं।

#71
ताका भैंसा गादर बैल । नारि कुलच्छिन बालक छैल ॥
बाँचै इनसे चातुर लोग । राज छाँड़ि के साधै जोग ॥ ७१ ॥

अर्थ: घूरने वाला भैंसा, सुस्त बैल, कुलच्छनी नारी और शौकीन बेटा - चतुर लोग इनसे दूर रहते हैं, भले ही इसके लिए राज-पाठ छोड़ना पड़े।

#72
सुथना पहिरे हर जोते, औ पौला पहिर निरावै ।
घाघ कहें ये तीनों भकुआ, रखे बोझ सिर गावै ॥ ७२ ॥

अर्थ: पाजामा पहनकर हल जोतना, खड़ाऊँ पहनकर निराई करना और सिर पर बोझ रखकर गाना - ये तीनों मूर्खता हैं।

#73
अम्बा नीबू बानियाँ, दाबे पर रस देयँ ।
कायथ कौवा करहटा, मुर्दैन से भी लेयँ ॥ ७३ ॥

अर्थ: आम, नीबू और बनिया दबाने पर ही रस देते हैं। कायस्थ, कौवा और गिद्ध मुर्दे से भी अपना हिस्सा ले लेते हैं।

#74
घग्घा अपने मन में गुनहीं ।
ठाकुर भगत न मूसर धनुहीं ॥ ७४ ॥

अर्थ: जैसे मूसल धनुष नहीं बन सकता, वैसे ही ठाकुर (क्षत्रिय) कभी शांत भगत (भक्त) नहीं हो सकता (उसका स्वभाव उग्र होता है)।

#75
जोइगर बसँगर बुझगर भाइ । तिरिया सतवन्ती, नीक सुभाइ ॥
धन सुत हो मन रहे विचार । कहें घाघ यह, सुक्ख अपार ॥ ७५ ॥

अर्थ: जिसके पास बड़ा परिवार, समझदार भाई, सती स्त्री, धन, पुत्र और अच्छे विचार हों - उसे अपार सुख मिलता है।

#76
जहाँ चारि काछी, वहाँ बात आछी । जहाँ चारि कोरी, वहाँ बात बोरी ॥
जहाँ चारि भूंजी, वहाँ बात डंझी ॥ ७६ ॥

अर्थ: (जाति स्वभाव) काछियों में अच्छी बातें होती हैं, कोरी (जुलाहे) बेमतलब की बातें करते हैं और भड़भूंजे आपस में लड़ते रहते हैं।

#77
माँ से पूत पिता से घोड़ा ।
अधिक नहीं तो थोड़ा थोड़ा ॥ ७७ ॥

अर्थ: बेटे में माँ के गुण और घोड़े में पिता (नर घोड़े) के गुण जरूर आते हैं, थोड़े या ज्यादा।

#78
हरहट नारी, बास एक लाइ । परुवा बरद, सुहुत हरवाइ ॥
रोगी होइ रहे इकलन्त । घाघ कहें ई विपत्ति क अन्त ॥ ७८ ॥

अर्थ: कर्कश पत्नी, अकेले रहना, पराया बैल, आलसी हलवाहा और बीमारी में अकेले पड़े रहना - यह विपत्ति की हद है।

#79
आठ कठौती मट्ठा पीवे, सोरह मकुनी खाय ।
तिसके मुये न रोइये, घर का दरिद्दर जाय ॥ ७९ ॥

अर्थ: जो आदमी पेटू हो (बहुत मठा और रोटी खाए), उसके मरने पर रोना नहीं चाहिए, क्योंकि घर की दरिद्रता चली जाती है।

#80
मडुवा कोदो अन्न नहीं । जोलहा धुनिया जन नहीं ॥ ८० ॥

अर्थ: मडुआ और कोदो को अच्छा अन्न नहीं माना जाता, वैसे ही जुलाहे और धुनिया को (उस समय) सभ्य नहीं माना जाता था।

#81
बालक ठाकुर, बूढ़ दिवान ।
ममिला बिगरै साँझ बिहान ॥ ८१ ॥

अर्थ: यदि मालिक बच्चा हो और मंत्री बूढ़ा हो, तो राज-काज और मामला बिगड़ते देर नहीं लगती।

#82
बनिये क सखरच, ठाकुर क हीन । बैद क पूत, रोग नहिं चीन ॥
पंडित चुपचुप, बेसवा मैल । कहें घाघ, पाँचों गइल ॥ ८२ ॥

अर्थ: खर्चीला बनिया, कमजोर ठाकुर, नाकाबिल वैद्य, चुप रहने वाला पंडित और मैली वेश्या - ये पाँचों बर्बाद हैं।

#83
बाँध बाँस बिगहा बिया, बारी बेटा छैल ।
व्योहर बढ़ई बन बबुर, बात सुनो यह छैल ॥
जामे बकार बारह बसें, सो पूरन गिरहस्त ।
औरन को सुख है सदा, आप रहे अलमस्त ॥ ८३ ॥

अर्थ: जिसके पास 12 'ब' हों - बाँध, बाँस, बीघा (खेत), बीज, बारी (बगीचा), बेटा, बैल, व्यवहार, बढ़ई, बन, बबूल और बुद्धि - वही पूर्ण गृहस्थ है और सुखी रहता है।

#84
तीन बैल दो मेही, बैठ काल तेहि डेहरी ॥ ८४ ॥

अर्थ: जिसके पास तीन बैल (विषम संख्या) और दो स्त्रियाँ (कलह) हों, उसके घर काल (मृत्यु/विनाश) का डेरा होता है।

#85
सबको कर, हर को डर ॥ ८५ ॥

अर्थ: सबके साथ भलाई करो और ईश्वर (हर) से डरो।

#86
चार छावें छः निरावें, तीन खाट दो बाट ॥ ८६ ॥

अर्थ: छप्पर छाने के लिए 4, निराई के लिए 6, खाट बुनने के लिए 3 और रास्ता चलने के लिए 2 लोगों का साथ अच्छा होता है।

#87
कलियुग में दो भगत हैं, बैरागी अरु ऊँट ।
वे तुलसी वन काटहीं, ये पीपल करते ठूंठ ॥ ८७ ॥

अर्थ: कलियुग के दो ही भक्त हैं - बैरागी जो तुलसी की माला के लिए वन काटते हैं, और ऊँट जो पीपल को ठूँठ कर देते हैं।

#88
कीरी संचै तीतर खाय ।
लोभी को धन पर ले जाय ॥ ८८ ॥

अर्थ: जैसे चींटी का जमा किया हुआ तीतर खा जाता है, वैसे ही लोभी का धन दूसरे लोग खा जाते हैं (वह खुद उपभोग नहीं कर पाता)।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!